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अफगानिस्तान के खजाने पर किसकी नजर: देश में 74 लाख करोड़ रुपये के खनिज संसाधन, अब तक कोई नहीं उठा पाया फायदा
Fri, 20 Aug 2021 04:32 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्रा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्रा
Updated Fri, 20 Aug 2021 04:32 PM IST
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अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद अरबों के खनिज भंडार पर दुनिया की नजर।
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
अमेरिकी सेना की वापसी के एलान के बाद से ही पूरी दुनिया की नजरें अफगानिस्तान के अंदरुनी हालात पर टिक गईं। मौजूदा हालात के चलते भले ही तालिबान के कट्टरपंथी शासन से लोग डरे हुए हैं, लेकिन कई देश हालात पर काबू पाने की कोशिश में जुटे हैं। इस बीच कुछ देश ऐसे भी हैं, जिनकी नजरें अफगानिस्तान के संसाधनों और उसके कूटनीतिक महत्व पर भी हैं। इनमें सबसे आगे चीन का नाम है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इन खनिज संपदाओं को अब तक कोई भी देश छू नहीं पाया। इस रिपोर्ट में जानते हैं कि इसकी असल वजह क्या है?अफगानिस्तान में कितना प्राकृतिक खजाना
अमेरिका के सैन्य अफसरों और भूवैज्ञानिकों ने कुछ साल पहले सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से अफगानिस्तान के भूभाग का विश्लेषण किया था। जांच के बाद अनुमान लगाया कि यहां करीब 1 ट्रिलियन डॉलर यानी करीब 74 लाख करोड़ रुपये की खनिज संपदा मौजूद है। इनमें ज्यादातर प्राकृतिक संसाधन कूटनीतिक रूप से काफी अहम भी बताए गए।
अफगानिस्तान में कौन-सी खनिज संपदाएं मौजूद?
अफगानिस्तान का नाम दुनिया के सबसे गरीब देशों में शुमार है। इसके बावजूद मध्य और दक्षिण एशिया के बीच मौजूद इस देश में 74 लाख करोड़ रुपये की खनिज संपदा मौजूद है, जिससे पूरे देश की अर्थव्यवस्था के हालात बदल सकते हैं। जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक, अफगानिस्तान के अलग-अलग प्रांतों में लौह अयस्क, तांबे, सोने और चांदी के भंडार मौजूद हैं। इसके अलावा कुछ अहम दुर्लभ खनिज पदार्थ (रेयर अर्थ मिनरल्स) भी मौजूद हैं। इनमें सबसे बड़ा भंडार लिथियम का है। आज दुनिया की सभी रिचार्जेबल बैटरियों और अन्य तकनीकी चीजों में लिथियम की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है। इसके अलावा सीरियम, नियोडायमियम, लैंथेनम जैसे दुर्लभ पदार्थों के भंडार अफगानिस्तान में छिपे होने की संभावना है।
दुनिया को अफगानिस्तान की कितनी जरूरत?
वैज्ञानिकों की मानें तो अफगानिस्तान पारंपरिक रूप से मूल्यवान धातुओं का गढ़ रहा है। दरअसल, यहां ऐसी धातुएं भी मौजूद हैं, जिनसे पूरी दुनिया को तरक्की हासिल करने में मदद मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने मई 2021 के दौरान कहा था कि लिथियम, तांबा, निकेल, कोबाल्ट और दुर्लभ खनिज पदार्थों की आने वाले समय में भारी जरूरत पड़ सकती है। ये पदार्थ मोबाइल तकनीक से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों, सुपर कंप्यूटर्स और संचार के उपकरणों के लिए बेहद अहम हैं। फिलहाल चीन, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो और ऑस्ट्रेलिया इन पदार्थों की आपूर्ति का 75 फीसदी हिस्सा पूरा करते हैं।
आईईए की मानें तो भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलने के बाद इलेक्ट्रिक कारों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होगा। एक औसत इलेक्ट्रिक कार पारंपरिक कारों के मुकाबले छह गुना ज्यादा खनिजों का इस्तेमाल करती है। इसके अलावा लिथियम, निकेल, कोबाल्ट बैट्रियों के लिए अहम पदार्थ हैं। दुनियाभर के बिजली से जुड़े नेटवर्क भी तांबे और एल्युमिनियम के प्रयोग पर निर्भर हैं। वहीं, दुर्लभ खनिज पदार्थों के जरिए ही मोटर का निर्माण किया जाता है। अमेरिकी सरकार का अनुमान है कि अगर अफगानिस्तान में आने वाले समय में शांति स्थापित होती है तो लिथियम खनन के मामले में यह देश बोलिविया (सबसे बड़ा उत्पादक) के मुकाबले में खड़ा हो सकता है।
आईईए की मानें तो भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलने के बाद इलेक्ट्रिक कारों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होगा। एक औसत इलेक्ट्रिक कार पारंपरिक कारों के मुकाबले छह गुना ज्यादा खनिजों का इस्तेमाल करती है। इसके अलावा लिथियम, निकेल, कोबाल्ट बैट्रियों के लिए अहम पदार्थ हैं। दुनियाभर के बिजली से जुड़े नेटवर्क भी तांबे और एल्युमिनियम के प्रयोग पर निर्भर हैं। वहीं, दुर्लभ खनिज पदार्थों के जरिए ही मोटर का निर्माण किया जाता है। अमेरिकी सरकार का अनुमान है कि अगर अफगानिस्तान में आने वाले समय में शांति स्थापित होती है तो लिथियम खनन के मामले में यह देश बोलिविया (सबसे बड़ा उत्पादक) के मुकाबले में खड़ा हो सकता है।
खनन में किसी देश को क्यों नहीं मिली सफलता?
अफगानिस्तान में विदेशी ताकतों द्वारा अपने-अपने मिशन चलाने का लंबा इतिहास रहा है। 1919 में आजादी मिलने के बाद से ही गृह युद्ध से जूझ रहे अफगानिस्तान में 1979 के दौरान सोवियत संघ ने सेना भेजकर अपना प्रभाव कायम किया। हालांकि, सोवियत सेनाओं को अमेरिका और पाकिस्तान के समर्थन वाले मुजाहिद्दीनों से कड़ी चुनौती मिली। यह वह दौर था, जब अफगानिस्तान में पहले के सारे विकास कार्य तबाह कर दिए गए और मोहम्मद दाऊद खान की सरकार में कराए गए निर्माणों को भी ध्वस्त किया जाने लगा। बताया जाता है कि उस दौरान 28 लाख अफगान विस्थापित हो गए और पूरे देश में युद्ध की स्थिति बनी रही।
1989 में सोवियत सेनाओं के वापस लौटने के बाद अफगानिस्तान गृह युद्धों के चलते लगातार पिछड़ता रहा। 1994 में तालिबान बनने से लेकर 2001 में अमेरिका के आने तक इस देश में हालात तनावपूर्ण ही रहे। अमेरिकी सेनाओं ने अल-कायदा आतंकियों की मदद करने के लिए तालिबान के खिलाफ युद्ध छेड़ा, जिससे अफगानिस्तान की स्थिति लगातार बदतर होती गई। काबुल, हेरात और कुछ अन्य प्रांतों को छोड़कर ज्यादातर प्रांतों में तो सड़क, बिजली और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो सकीं। वहीं, अमेरिकी सेना का लक्ष्य भी इस दौरान आतंकियों के खात्मे पर केंद्रित रहा।
1989 में सोवियत सेनाओं के वापस लौटने के बाद अफगानिस्तान गृह युद्धों के चलते लगातार पिछड़ता रहा। 1994 में तालिबान बनने से लेकर 2001 में अमेरिका के आने तक इस देश में हालात तनावपूर्ण ही रहे। अमेरिकी सेनाओं ने अल-कायदा आतंकियों की मदद करने के लिए तालिबान के खिलाफ युद्ध छेड़ा, जिससे अफगानिस्तान की स्थिति लगातार बदतर होती गई। काबुल, हेरात और कुछ अन्य प्रांतों को छोड़कर ज्यादातर प्रांतों में तो सड़क, बिजली और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो सकीं। वहीं, अमेरिकी सेना का लक्ष्य भी इस दौरान आतंकियों के खात्मे पर केंद्रित रहा।
भ्रष्टाचार, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और असुरक्षा
अमेरिकी कांग्रेस रिसर्च की 2020 की रिपोर्ट में कहा गया था कि अफगानिस्तान की 90 फीसदी जनता गरीबी रेखा के नीचे रह रही है। यानी यहां लोग 2 डॉलर प्रतिदिन भी नहीं कमा पाते। वहीं, वर्ल्ड बैंक ने इसी साल मार्च में कहा था कि अफगानिस्तान का निजी क्षेत्र विकास कार्यों में असुरक्षा, राजनीतिक स्थायित्व में कमी, कमजोर सरकारी संस्थान, अपर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर, भ्रष्टाचार और व्यापार के कठिन माहौल की वजह से पूरी तरह पनप नहीं पाया। इसी के चलते अफगानिस्तान से मौजूदा समय में महज 1 अरब डॉलर (करीब 7437 करोड़ रुपए) का ही खनन संभव हो पाता है।
कूटनीतिक फायदों के लिए ही तालिबान से संबंध बढ़ा रहा चीन?
तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के बाद से ही चीन लगातार इस उग्रवादी संगठन से संपर्क में बना हुआ है। दरअसल, अमेरिका की मौजूदगी और देश के बिगड़े हालात की वजह से अब तक चीन ने अफगानिस्तान में कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू नहीं किया है। हालांकि, अमेरिकी सेना की विदाई के बाद चीन की निगाहें तालिबान से संबंध बेहतर करने में लगी हैं। जानकारों का कहना है कि चीन पहले ही अफ्रीका और अन्य देशों में दुर्लभ पदार्थों का खनन करने में आगे रहा है। साथ ही अफगानिस्तान से उसकी सीमा लगने का उसे सीधा फायदा मिलेगा।