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अफगानिस्तान: तालिबान लड़ाकों के सामने काबुल में महिलाओं की आवाज बन गई हैं 24 साल की क्रिस्टल बायत, दिल्ली विश्वविद्यालय की रह चुकी हैं छात्रा
Tue, 24 Aug 2021 04:30 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Tue, 24 Aug 2021 04:30 PM IST
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क्रिस्टल बायत
- फोटो :
Twitter : @BayatCrystal37
विस्तार
तालिबान के डर के आगे घुटने टेकने के बजाए अफगानिस्तान की कुछ महिलाएं अपनी आजादी के लिए लगातार आवाज बुलंद कर रही हैं। बेशक विरोध करने वाली महिलाओं की संख्या कम है लेकिन वे लाखों अफगान महिलाओं की आवाज हैं। 17 अगस्त को, चार महिलाओं ने काबुल की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया था। जबकि सात महिलाओं ने 19 अगस्त को शहर के वजीर अकबर खान इलाके में अफगान के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अफगानी झंडा लहराया और तालिबान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। तालिबान के बंदूक और उनके खौफ के बीच जो एक आवाज निडर बन गई है वह है क्रिस्टल बायत की। वह कई उन बहादुर महिलाओं में शामिल हैं, जिन्होंने तालिबान की खुलकर खिलाफत की है। न्यूयॉर्क टाइम्स इस बहादुर महिला की कहानी दुनिया के सामने ले कर आया है।
तालिबान का खुलकर कर रहीं विरोध
बायत एक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। वे महिलाओं को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग करने के लिए आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। बायत उन सात महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने अफगानिस्तान में स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित तालिबान के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। इस विरोध प्रदर्शन में लगभग 1500 पुरुष थे, जिसमें केवल सात महिलाएं थीं।
बताया जाता है कि इस विरोध के दौरान तालिबान ने कई बार बायत को धमकी दी और कहा कि आवाज उठाने वाली महिलाओं को इस्लाम में 'हराम' (निषिद्ध) माना जाता है, इसलिए वे इससे बाज आएं। अफगान का राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए बायत और उनके साथियों ने वजीर मोहम्मद अकबर खान पहाड़ी को चुना, जहां सबसे बड़ा झंडा लगाया गया था। जबकि तालिबान ने घोषणा की थी कि राष्ट्रीय ध्वज को फहराने की अनुमति नहीं है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बायत ने अपने एक बयान में कहा कि अगर हम तालिबान को जीतने देते हैं तो पिछले 20 सालों में यहां की महिलाओं ने जो हासिल किया है वह सब बर्बाद हो जाएगा। सब पहले की तरह हो जाएगा। महिलाओं को आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा मैं अपने देश की महिलाओं की आवाज हूं। इसके लिए मुझे धमकियां दी जा रही है। मुझे पीछे हटने के लिए कहा जा रहा है। तालिबान नहीं बदला है, वे अभी भी नागरिकों की स्वतंत्रता और मांगों में विश्वास नहीं करते हैं।
क्रिस्टल बायत ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की है।
- फोटो :
Twitter : @BayatCrystal37
मुझे सुरक्षित रहना चाहिए
तालिबान के कट्टर शासन और उसके आतंक के बीच बायत लाखों महिलाओं की उम्मीद बन गई हैं लेकिन उनके जीवन पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने ट्वीटर पर भी एक जवाब में लिखा है- मेरी आवाज बुलंद करने के लिए या दुनिया को हजारों आवाजें सुनाने में सक्षम होने के लिए मुझे सुरक्षित रहना चाहिए और जीवित रहना चाहिए। जहां हमें खतरा महसूस होता है वहां हमारी आवाज घर की दीवारों से नहीं निकलती। बायत ने अपने अनुभव मीडिया को साझा करते हुए कहा है यह "कड़वा और दर्दनाक" है। वह "सभी महिला कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, और विशेष रूप से महिलाओं" के भविष्य को लेकर बहुत भय में है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं बायत
बायत दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज की छात्रा रहीं हैं। उन्होंने राजनीति विज्ञान में यहां से स्नातक की डिग्री ली है। दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र संस्थान से मास्टर डिग्री ले चुकी हैं। उनकी मां डॉक्टर हैं जबकि उनके पिता अफगानिस्तान सरकार के गृह मंत्रालय में काम करते हैं। वह 2019 में अपने देश लौट गई थीं। महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए वे अपने फोन और व्हाट्सअप का इस्तेमाल कररही हैं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ध्यान दे वरना नहीं बचेगी स्वतंत्रता
वे लगातार अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश रही हैं। उनका कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और संगठनों को अफगानिस्तान की महिलाओं की मांगों पर ध्यान देने की जरूरत है। ये तालिबान हमारे सपने छीन लेना चाहते हैं इसलिए दुनिया को अफगानी महिलाओं और युवाओं की आवाज सुननी चाहिए। वरना हम अपने अधिकारों को खो देंगे, और अपने घरों की चार दीवारों तक सीमित हो जाएंगे। यहां कोई जीवन नहीं बचेगा, कोई स्वतंत्रता नहीं बचेगी।
तालिबान के कट्टर शासन और उसके आतंक के बीच बायत लाखों महिलाओं की उम्मीद बन गई हैं लेकिन उनके जीवन पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने ट्वीटर पर भी एक जवाब में लिखा है- मेरी आवाज बुलंद करने के लिए या दुनिया को हजारों आवाजें सुनाने में सक्षम होने के लिए मुझे सुरक्षित रहना चाहिए और जीवित रहना चाहिए। जहां हमें खतरा महसूस होता है वहां हमारी आवाज घर की दीवारों से नहीं निकलती। बायत ने अपने अनुभव मीडिया को साझा करते हुए कहा है यह "कड़वा और दर्दनाक" है। वह "सभी महिला कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, और विशेष रूप से महिलाओं" के भविष्य को लेकर बहुत भय में है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं बायत
बायत दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज की छात्रा रहीं हैं। उन्होंने राजनीति विज्ञान में यहां से स्नातक की डिग्री ली है। दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र संस्थान से मास्टर डिग्री ले चुकी हैं। उनकी मां डॉक्टर हैं जबकि उनके पिता अफगानिस्तान सरकार के गृह मंत्रालय में काम करते हैं। वह 2019 में अपने देश लौट गई थीं। महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए वे अपने फोन और व्हाट्सअप का इस्तेमाल कररही हैं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ध्यान दे वरना नहीं बचेगी स्वतंत्रता
वे लगातार अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश रही हैं। उनका कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और संगठनों को अफगानिस्तान की महिलाओं की मांगों पर ध्यान देने की जरूरत है। ये तालिबान हमारे सपने छीन लेना चाहते हैं इसलिए दुनिया को अफगानी महिलाओं और युवाओं की आवाज सुननी चाहिए। वरना हम अपने अधिकारों को खो देंगे, और अपने घरों की चार दीवारों तक सीमित हो जाएंगे। यहां कोई जीवन नहीं बचेगा, कोई स्वतंत्रता नहीं बचेगी।