कनाडा में संसदीय चुनाव: अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब हो जाएंगे जस्टिन ट्रुडो?
जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक मध्यावधि चुनाव कराने के ट्रुडो के फैसले को देश के ज्यादातर लोगों ने पसंद नहीं किया है। कोरोना महामारी के बीच उनके इस फैसले को लालची माना गया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इसी वजह से शुरुआत में जनमत सर्वेक्षणों में लिबरल पार्टी पिछड़ी रही। लेकिन ज्यादातर लोग कंजरवेटिव पार्टी की सरकार नहीं चाहते...
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कनाडा में संसदीय चुनाव के लिए मतदान होने में अब सिर्फ चार दिन बचे हैं। इस बीच अब ऐसी संभावना जताई जा रही है कि प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो अपनी कुर्सी बचाने में सफल हो जाएंगे। बीते एक हफ्ते में आए चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक ट्रुडो की लिबरल पार्टी की स्थिति में सुधार हुआ है। पार्टी पहले अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कंजरवेटिव पार्टी से पिछड़ गई थी। अब उसने फिर से मामूली बढ़त हासिल कर ली है।
लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि ट्रुडो ने जिस मकसद से समय से दो साल पहले मध्यावधि चुनाव कराया, उसमें उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। ट्रुडो का मकसद संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में पूर्ण बहुमत हासिल करना था। 2019 के चुनाव में उन्हें पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, जिसकी वजह से उन्हें महत्वपूर्ण फैसलों के लिए वामपंथी न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ता था। अब संकेत हैं कि अगर ट्रुडो फिर से प्रधानमंत्री बने, तब भी उनकी पुरानी मजबूरी अगले सदन में भी बनी रहेगी।
कनाडा ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (सीबीसी) के ताजा जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक लिबरल पार्टी को 31.9 फीसदी वोट मिलने की संभावना है। कंजरवेटिव पार्टी को 31.7 फीसदी वोट मिल सकते हैँ। इसके पहले रविवार को आए नानोस एजेंसी के सर्वे में लिबरल पार्टी को 34 फीसदी और कंजरवेटिव पार्टी को 30.7 फीसदी वोट मिलने की संभावना जताई गई थी। ये दोनों सर्वे चुनाव प्रचार शुरू होने के दो हफ्ते बाद तक दिखे रूझान से उलट हैं। उन दो हफ्तों में जारी हुए तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में कंजरवेटिव पार्टी को आगे बताया गया था।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि प्रमुख पार्टियों के नेताओं के बीच टीवी पर अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं में हुई चुनावी बहसों के बाद जनमत के रूझान में बदलाव आया है। कनाडा के क्यूबेक प्रांत में फ्रेंच भाषा बोली जाती है। इसलिए वहां चुनाव के समय नेताओं के बीच दोनों भाषाओं में आमने-सामने बहस होती है। सीबीसी के एक विश्लेषण में कहा गया है कि अभी जो रूझान सामने हैं, अगर 20 सितंबर को होने वाले मतदान में उसके अनुरूप ही नतीजे आए, तो देश की राजनीतिक सूरत में कोई बदलाव नहीं होगा। एक बार फिर से बाहरी समर्थन से ट्रुडो के नेतृत्व में अगली सरकार बनेगी। सीबीसी के मुताबिक ऐसा होने की संभावना 56 फीसदी है।
जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक मध्यावधि चुनाव कराने के ट्रुडो के फैसले को देश के ज्यादातर लोगों ने पसंद नहीं किया है। कोरोना महामारी के बीच उनके इस फैसले को लालची माना गया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इसी वजह से शुरुआत में जनमत सर्वेक्षणों में लिबरल पार्टी पिछड़ी रही। लेकिन ज्यादातर लोग कंजरवेटिव पार्टी की सरकार नहीं चाहते। इसलिए चुनाव करीब आने के साथ ट्रुडो के लिए समर्थन बढ़ा है।
कनाडा में जन कल्याण संबंधी नीतियों पर लिबरल पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के बीच ज्यादा मतभेद नहीं हैं। उनके बीच मतभेद आव्रजन के मुद्दे पर है। इसमें भी आव्रजकों को कनाडा की नागरिकता देने पर दोनों पार्टियां सहमत हैं। सिर्फ इसकी प्रक्रिया को लेकर उनमें मतभेद है। लिबरल पार्टी इस प्रक्रिया को आसान रखना चाहती है। जबकि कंजरवेटिव पार्टी नागरिकता के लिए इंतजार की अवधि लंबी रखना चाहती है।