कैरीबियाई द्वीप समूह में ड्रैगन: बारबेडोस को गणतंत्र बनने के लिए चीन ने उकसाया?
जानकारों का कहना है कि चीन ने पिछले दो दशक में कैरीबियाई देशों में बड़ा निवेश किया है। उससे वहां उसका गहरा प्रभाव बन गया है। इसको लेकर न सिर्फ ब्रिटेन, बल्कि अमेरिका भी चिंतित रहा है...
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क्या कैरीबियाई देश बारबेडोस को खुद को गणतंत्र घोषित करने के लिए चीन ने भड़काया? ब्रिटेन में इस बारे में हुई प्रतिक्रियाओं पर गौर करने पर ऐसी ही धारणा बनती है। वेस्ट इंडीज के तहत आने वाले द्वीप बारबेडोस ने इस हफ्ते अपने को पूर्ण गणतंत्र घोषित कर दिया। इसके पहले वह ब्रिटेन का अधिराज्य था। इसके तहत ब्रिटेन की महारानी बारबेडोस की संवैधानिक प्रमुख थीं। लेकिन अब बारबेडोस में राष्ट्रपति निर्वाचित होगा, जो वहां का संवैधानिक प्रमुख होगा।
बारबेडोस की स्थापना ब्रिटेन ने 17वीं सदी में की थी। तब वहां अफ्रीका गुलामों को लाकर बसाया गया था। बीसवीं सदी में वहां बसे लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम चलाया। 1966 में बारबेडोस ब्रिटेन से आजाद हो गया, लेकिन तब वह अपना दर्जा ब्रिटेन के अधिराज्य के रूप में बनाए रखने पर सहमत हो गया था।
चीन ब्रिटिश कॉमनवेल्थ को ‘खरीदने’ में जुटा
बारबेडोस के ताजा फैसले से ब्रिटेन में गहरी बेचैनी देखने को मिली है। यहां के जनमत के एक तबके ने बारबेडोस के इस फैसले के लिए चीन को दोषी ठहराया है। सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी के सांसद टॉम टुगेनढेट ने दावा किया है कि चीन कैरीबियाई द्वीप समूह में ब्रिटेन का दर्जा घटाने की कोशिश कर रहा है। इसी लाइन पर ब्रिटिश अखबार टेलीग्राफ में भी एक लेख छपा है। उस लेख में आरोप लगाया गया है कि चीन ब्रिटिश कॉमनवेल्थ को ‘खरीद’ लेने की कोशिश में जुटा हुआ है।
इस बीच ब्रिटिश विदेश मंत्री लिज ट्रस ने कैरीबियाई देशों के लिए एक विशेष कोष बनाने का एलान किया है। इसकी घोषणा करते हुए उन्होंने संकल्प जताया कि ब्रिटिश सरकार उस क्षेत्र के देशों को फिर से मुक्त बाजार आधारित लोकतांत्रिक देशों के दायरे में ले आएगी। ब्रिटिश सरकार के इस कदम को भी बारबेडोस के ताजा फैसले से जोड़ कर देखा जा रहा है।
चीन कैरीबियाई देशों में बढ़ा रहा प्रभाव
जानकारों का कहना है कि चीन ने पिछले दो दशक में कैरीबियाई देशों में बड़ा निवेश किया है। उससे वहां उसका गहरा प्रभाव बन गया है। इसको लेकर न सिर्फ ब्रिटेन, बल्कि अमेरिका भी चिंतित रहा है। इसीलिए अब ब्रिटिश सरकार ने नए कोष की स्थापना कर उस क्षेत्र में चीनी प्रभाव का मुकाबला करने का इरादा दिखाया है।
लेकिन कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ब्रिटेन अपने इस इरादे में सफल होगा, इसकी संभावना कम है। ब्रिटिश लेखक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकार टॉम फाउदी ने एक टिप्पणी में लिखा है- ‘यह सोचना अंग्रेजी भाषी पूंजीवादी देशों के लिए भयानक है कि एक गैर अंग्रेजी भाषी कम्युनिस्ट देश अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक बड़ी शक्ति बन जाए। इसके बावजूद हकीकत यह है कि कोष की स्थापना के जरिए चीन का मुकाबला करने की कोशिश कमजोर आधार पर टिकी है। यह हकीकत को स्वीकार कर पाने में विफल रहने का संकेत है।’
ब्रिटेन ने कैरीबियाई कोष में हर साल नौ अरब पाउंड का योगदान करने का इरादा जताया है। लेकिन कुछ जानकारों ने इसे नाकाफी बताया है। वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट से जुड़े विश्लेषक रानिल दिसानायके ने एक ट्विट में सवाल उठाया है कि जब ब्रिटेन लंदन से लीड्स तक हाई स्पीड रेलवे का निर्माण करने में नाकाम रहा है, तो वह चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से प्रतिस्पर्धा कैसे करेगा?