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अफगानिस्तान की सबसे खतरनाक जेल का वो हिस्सा, जहां कैद हैं 2000 तालिबानी लड़ाके

Tue, 19 Nov 2019 04:53 PM IST
आसिम खान वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: आसिम खान Updated Tue, 19 Nov 2019 04:53 PM IST
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2000 Taliban fighters imprisoned in Kabul most dangerous Pul-e-Charkhi jail in Afghanistan
तालिबान लड़ाके - फोटो : BBC

पुल-ए-चरखी जेल अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के बाहरी इलाके में है। विशाल भूरे पत्थरों वाली दीवारें इसकी पहरेदार हैं, जिनके ऊपर कंटीली तारें भी लगी हुई हैं। इस दीवार में थोड़ी-थोड़ी दूर पर निगरानी टॉवर भी लगे हुए हैं, जिन से कैदियों पर निगाह रखी जाती है। इस जेल में आने-जाने के लिए इस्पात के विशाल फाटक बने हुए हैं। पुल-ए-चरखी जेल में करीब दस हजार लोग कैद हैं। इन में से करीब दो हजार कैदी अफगानिस्तान के चरमपंथी इस्लामी संगठन तालिबान से ताल्लुक रखते हैं।

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तालिबानी कैदी मौलवी फजल बारी कहते हैं कि वो लड़ने के लिए नहीं पैदा हुआ थे। लेकिन, जेल में पांच बरस बिताने के बाद अब उन्हें शिद्दत से इस बात का एहसास होता है कि वो लड़ते-लड़ते जान दे दें। मौलवी फजल बारी कहते हैं, "मैं इस कदर उकता गया हूं कि जो मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि मैं खुदकश बॉम्बर बनूंगा, लेकिन, अल्लाह पाक की कसम अब मैं वो भी कर गुजरने को तैयार हूं।"
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हालांकि, फिलहाल तो मौलवी फजल बारी इस बेहद सख्त सुरक्षा इंतजाम वाली जेल में ही कैद रहेंगे। लेकिन, काबुल की पुल-ए-चरखी जेल, अफगानिस्तान की उन जेलों में से एक है, जहां से तालिबानी चरमपंथियों को धीरे-धीरे बड़ी तादाद में रिहा किया जा रहा है। अफगानिस्तान की हुकूमत, तालिबान से बंद पड़ी शांति वार्ता की बहाली से पहले सद्धभावना के तौर पर तालिबानी लड़ाकों को रिहा कर रही है।
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तालिबान ने लंबे समय से एलान किया हुआ है कि उनका अंतिम लक्ष्य अफगानिस्तान में दार-उल-इस्लाम यानी इस्लामी कानूनों पर चलने वाली अमीरत या हुकूमत कायम करनी है। जब 1996 से 2001 के बीच अफगानिस्तान पर तालिबान का राज था, तो उन्होंने इसी तरीके से सरकार चलाई थी। उस वक्त की तालिबानी सरकार ने अफगानिस्तान में शरीयत कानून लागू किया था।

और, उनकी हुकूमत बेहद सख्त थी। महिलाओं का सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया था। साथ ही तमाम जुर्म के लिए पत्थर से पीट कर मारने, हाथ-पैर काटने जैसी सजाएं दी जाती थीं। अभी ये साफ नहीं है कि अगर भविष्य में अफगानिस्तान पर तालिबान का राज कायम हुआ, तो वो किस तरह की सरकार चलाएंगे।

2001 में अमेरिका ने 9/11 के आतंकवादी हमलों के बाद तालिबान की हुकूमत का खात्मा कर दिया था। तब से अब तक अफगानिस्तान में हजारों लोग मारे जा चुके हैं। इन में बड़ी तादाद में मारे गए बेगुनाह शहरी शामिल हैं। जब हम पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी चरमपंथियों से मिले, तो उन्होंने हम से खुल कर बातें कीं। अपनी जिंदगी के मकसद बताए। अपनी शिकायतें बयां कीं। हालांकि उन्होंने अपनी गतिविधियों के बारे में बहुत बारीकी से जानकारी नहीं दी।

लेकिन, हमें ये जरूर पता है कि मौलवी फजल बारी ने 15 साल पहले तालिबान का दामन थामा था। वो अफगानिस्तान के हेलमंद सूबे में तालिबान के कमांडर थे और वहां अंतरराष्ट्रीय सेना से जंग में शामिल थे। पुल-ए-चरखी जेल में फजल बारी की छोटी सी कोठरी में तालिबानी लड़ाके ठुंसे पड़े हैं। बाहर राहदारी में लंबी कतार लगी हुई है। कई लोग आवाज देते हुए आते-जाते हैं। वहीं, कई लोग अपनी तीन मंजिला चारपाइयों से झांकते दिखते हैं। एक बुजुर्ग कैदी जमीन पर बैठा हुआ है और हाथ में तस्बीह लिए हुए कुछ वजीफे पढ़ रहा है।

जमीन पर कालीन और गद्दियों का लंबा-चौड़ा विस्तार दिखता है। कोठरी की चारों दीवारों पर पोस्टर लगे हुए हैं। कुछ इस्लाम की पवित्र जगहों जैसे मक्का और मदीना के हैं। तो, कई तस्वीरें खूबसूरत नजारों वाली हैं। गुलदस्तों, झरनों और आइसक्रीम के कोन की तस्वीरें भी दीवारों पर नजर आती हैं। असल में इस कोठरी को इस तरह सजाया गया है कि जन्नत का दीदार हो। इस के जरिए इन कैदियों का वो बुनियादी यकीन जाहिर होता है कि अगर वो जंग में मारे गए, तो वो सीधे जन्नत तशरीफ ले जाएंगे।

दीवारों से लगी हुई अल्मारी में इस्लामिक साहित्य की भारी भरकम किताबें और पवित्र पुस्तक कुरान रखे हुए हैं। जैसे ही फजल बारी खुत्बा पढ़ना शुरू करते हैं, तो सारे कैदियों की निगाहें उन पर टिक जाती हैं। असल में मौलवी फजल बारी पहले इस्लाम के वरिष्ठ विद्वान थे। इसीलिए जेल में उनके साथी उन्हें सम्मान की नजर से देखते हैं। फजल बारी कहते हैं, "मैं आप को बता रहा हूं। जब तक हमारे मुल्क में एक भी विदेशी फौजी रहेगा, अफगानिस्तान में अमन आ ही नहीं सकता।"

2000 Taliban fighters imprisoned in Kabul most dangerous Pul-e-Charkhi jail in Afghanistan
तालिबान लड़ाके - फोटो : BBC

तालिबान पर आरोप है कि अफगानिस्तान में अपनी हुकूमत के दौरान उसने ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा के दूसरे आतंकवादियों को पनाह दी। इन पर इल्जाम है कि इन्होंने अमरीका पर सितंबर 2001 में 9/11 का आतंकवादी हमला किया था। तालिबान और अमरीका की अगुवाई वाली सेनाओं के बीच अफगानिस्तान में पिछले 19 वर्षों से जंग चल रही है, जो अमरीका के इतिहास का सबसे लंबा युद्ध है।

इस साल सितंबर में ऐसा लग रहा था कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तालिबान के बीच समझौता होने वाला है। लेकिन, जब काबुल में एक बम धमाके में एक अमरीकी सैनिक समेत 12 लोग मारे गए, और तालिबान ने इस धमाके की जिम्मेदारी ली, तो, ट्रंप ने अचानक ही शांति वार्ता को रद्द कर दिया। अमरीका का कहना है कि अभी भी अफगानिस्तान में उसके कम से कम 13 हजार सैनिक तैनात हैं। तालिबान से चल रही शांति वार्ता के प्रस्तावित समझौते के तहत, अमरीका ने समझौता लागू होने के पांच महीने के भीतर, अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या घटाकर 8 हजार 600 करने का वादा किया था। लेकिन, फिलहाल तो ये समझौता विचाराधीन भी नहीं है।

2016 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने ये वादा किया था कि वो राष्ट्रपति चुने गए तो अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला लेंगे। काबुल की जेल के ब्लॉक 6 में चलते हुए आप को महसूस होता है कि आप तालिबान के इलाके में आ गए हैं। कैदखाने के लंबे गलियारे तालिबानी चरमपंथियों से भरे हुए हैं, जो वहां आराम से घूमते-बतियाते, हजामत बनाते, नहाते और खाना पकाते दिखते हैं।

मौलवी फजल बारी के ये कैदी साथी अफगानी समाज के हर तबके से आते हैं। वो पूर्व अध्यापक हैं, किसान हैं, कारोबारी हैं और ड्राइवर हैं, जिन्हें तालिबान से ताल्लुक रखने के जुर्म में मुकदमा चला कर सजा सुनाई गई है। इन में से किसी पर तालिबान के लिए वसूली करने का इल्जाम है, तो किसी पर हथियार उठाने का और किसी पर बम लगाने का आरोप है। फजल बारी जैसे पुराने कैदी, जेल की दिनचर्या तय करते हैं। इस दौरान दिन के कई घंटे इस्लामी किताबें पढ़ने और इबादत का काम चलता है। खाने और कैदियों के बाहर निकलने के तय वक्त के दौरान बातचीत का मुख्य मुद्दा सियासत ही होता है।

बहुत से कैदी कहते हैं कि वो शुरुआत में बदला लेने की नीयत से तालिबान के साथ जुड़े थे। अक्सर वो हवाई हमलों का बदला लेने के इरादे से तालिबान से जुड़े। फजल बारी कहते हैं, "जब आज से 15 साल पहले अमरीकी सेनाओं ने मेरे गांव पर हवाई हमला किया था, तब मेरे पड़ोसी और उसकी दो बीवियों की मौत हो गई थी। लेकिन, उनका सबसे छोटा बेटा, रहमतउल्लाह बच गया था। मैंने उस बच्चे को अपना लिया और पढ़ाई करने में उसकी मदद करने लगा। लेकिन, जब भी कोई हेलीकॉप्टर हमारे गांव के ऊपर से गुजरता था, तो वो बच्चा घबरा जाता था। चीखते हुए मेरी तरफ भागता था और कहता था कि वो मुझे मारने आए हैं।"

2000 Taliban fighters imprisoned in Kabul most dangerous Pul-e-Charkhi jail in Afghanistan
तालिबान लड़ाके - फोटो : BBC

फजल बारी कहते हैं कि जब उन्होंने देखा कि उनके मुल्क में विदेशी आकर बहुत सी मस्जिदें तबाह कर रहे हैं। बच्चों और महिलाओं को मार रहे हैं, तो उन्होंने विदेशी ताकतों के खिलाफ जंग लड़ने का फैसला किया। पुल-ए-चरखी के एक और बुजुर्ग कैदी हैं मुल्ला सुल्तान। सुल्तान का भी कहना है कि वो विदेशी फौज के जुल्मों के खिलाफ खड़े होना चाहते थे। सुल्तान कहते हैं, "एक अफगान नागरिक के तौर पर ये मेरा फर्ज है कि मैं इन विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ आवाज बुलंद करूं। मैं कभी भी अपने मुल्क में इनका रहना मंजूर नहीं कर सकता।"

पिछले एक दशक में अमरीका की अगुवाई वाले विदेशी सैनिकों को धीरे-धीरे वापस बुलाया जा रहा है। इसके बदले में हवाई हमले तेज हो रहे हैं। ये हमले अक्सर गलत ठिकानों पर होते हैं, जिससे बड़ी तादाद में बेगुनाह नागरिक मारे जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, साल 2019 के पहले छह महीनों में, अमरीकी और अफगानी सुरक्षा बलों के हाथों तालिबान के मुकाबले ज्यादा आम लोग मारे गए। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र का ये भी कहना है कि पिछले एक दशक में तालिबान और दूसरे चरमपंथी संगठनों ने अफगानिस्तान में ज्यादा आम नागरिकों को मारा है।

अगर तालिबानी कैदी ये कहते हैं कि जंग के मोर्चे पर हो रही हलचलों की वजह से ही अफगानी युवा तालिबान का दामन थाम रहे हैं। तो, ये भी एक हकीकत है कि तालिबानी लड़ाके जेल में भी लोगों को भड़काते रहते हैं। मौलवी फजल बारी जैसे तजुर्बेकार लड़ाके अपने आकाओं से हुक्म पाते हैं। कई बार तो ये फरमान सीधे तालिबान के अमीर उल मोमिनीन शेख हिबातुल्लाह अखुंदजादा की तरफ से आते हैं। फिर वो इन आदेशों और सीधे कैदियों तक पहुंचाते हैं।

जब तालिबान और अमरीका में शांति वार्ता चल रही थी, तब इससे जुड़ी खबरों में भी कैदी खूब दिलचस्पी लेते थे। मुल्ला सुल्तान कहते हैं, "हमें पता है कि विदेशी थक गए हैं। हमें पता है कि वो अपने घुटनों पर हैं और जल्द ही वो अपने वतन लौट जाएंगे। तब हम सारे अफगानी शरीयत की हुक्मरानी और इस्लामिक निजाम के झंडे तले मिल कर रहेंगे।" पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी कैदियों को दूसरे कैदियों के मुकाबले ज्यादा सुविधाएं हासिल हैं। वो अपनी दिनचर्या का वक्त खुद तय करते हैं। जेल में वो अपना मदरसा चलाते हैं। उनकी सेहत और कानूनी मदद का भी बेहतर इंतजाम है।

तालिबानी कैदियों के बीच एकता और उनके अनुशासन की वजह से भी जेल में उनका दबदबा है। इसके नतीजे में कई बार वो सभी कैदियों की नुमाइंदगी करते हुए, जेल में ज्यादा सुविधाओं की मांग उठाते हैं और उन्हें हासिल भी करते हैं। जेल के सुरक्षाकर्मी भी मानते हैं कि तालिबानी कैदियों का मोर्चा बहुत मजबूत है। और जैसा कि एक और तालिबानी लड़ाके, मौलवी मामूर कहते हैं कि वो एक-दूसरे के लिए जान भी देने को तैयार होते हैं। सुरक्षाकर्मी कहते हैं कि तालिबानी चरमपंथी कैदियों के साथ उनका संबंध आपसी सहयोग वाला है।

28 बरस के गार्ड रहमुद्दीन, जो ब्लॉक 6 के कमांडर भी हैं, कहते हैं, "हमारे गार्डों और तालिबानी कैदियों के बीच में सहयोग की भावना जबरदस्त है। यहां करीब दो हजार तालिबानी चरमपंथी कैद हैं। ऐसे में तमाम समस्याओं के समाधान के लिए उनका सहयोग जरूरी होता है।" लेकिन, पुल-ए-चरखी जेल में तालिबानी चरमपंथियों की आए दिनों होने वाली हड़ताल से साफ है कि सुरक्षाकर्मियों से उनका ताल्लुक हमेशा दोस्ताना ही नहीं होता।

कैदियों ने बीबीसी को बताया कि वो अक्सर अपने होंठ सिल कर या साइकिल के पहियों की तीलियां होंठों में लगाकर जेल की बुरी हालत के खिलाफ भूख हड़ताल करते हैं। क्योंकि कैदियों को अक्सर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलतीं। उनके मुकदमों की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है। और सुरक्षा कर्मी अक्सर कैदियों से बदसलूकी करते हैं। कई बार ऐसी खबरें भी आई हैं कि तालिबानी कैदियों ने सुरक्षा कर्मियों पर हमला कर दिया या उन्होंने जेल के एक हिस्से पर कब्जा कर लिया।

जब बीबीसी ने इन खबरों की तस्दीक के लिए अफगानिस्तान के आंतरिक मंत्रालय से संपर्क किया, तो उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। जबकि हर महीने अफगान सरकार के आंतरिक मंत्रालय को जेल में हड़ताल की तस्वीरें भेजी जाती हैं और उनसे मदद की गुहार लगाई जाती है। इस साल की शुरुआत में कैदियों और जेल के सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प में चार कैदी मारे गए थे। जबकि 33 लोग जख्मी हो गए थे। इन में 20 पुलिसकर्मी भी शामिल थे। अपुष्ट खबरों के मुताबिक, पुल-ए-चरखी जेल के कैदी खराब सेहत और स्वास्थ सुविधाओं की कमी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, जब ये झड़प हुई।

लेकिन, आंतरिक मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि उस वक्त जेल में ड्रग के इस्तेमाल को रोकने के लिए जांच चल रही थी। तभी ड्रग तस्करों ने कैदियों को सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ भड़काया था। ऐसे मुश्किल हालात में कई साल गुजारने की वजह से कैदियों का रवैया और भी सख्त हो चला है। इन में से कई को जेल से रिहा किया गया है, तो कुछ की रिहाई का जल्द ही नंबर आने वाला है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने इस साल जून में कहा था कि पुल-ए-चरखी और देश की दूसरी जेलों से 887 तालिबानी लड़ाकों को रिहा किया जाएगा।

ईद के मौके पर अक्सर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति कैदियों की रिहाई का ऐलान करते हैं। लेकिन, जानकारों का कहना है कि इतनी बड़ी तादाद में तालिबानी चरमपंथियों को जेल से रिहा करने की घोषणा अभूतपूर्व है। शायद अफगानिस्तान की सरकार ने खुद को अमरीका और तालिबान के बीच शांति वार्ता से अलग रखे जाने पर अपनी ताकत दिखाने के लिए ऐसा किया। तालिबान ने अफगानिस्तान की सरकार से सीधे शांति वार्ता के लिए साफ इनकार कर दिया था। क्योंकि तालिबान इसे अवैध सरकार मानते हैं।

मौलवी फजल बारी की सजा पूरी होने में अभी दो साल और बाकी हैं। लेकिन, वो इस बात पर अड़े हुए हैं कि जेल से रिहा होने के बाद वो दोबारा जिहाद जारी रखेंगे। फजल बारी कहते हैं, "जब मुझे यहां से रिहा किया जाएगा, तो मैं फिर से अपने साथियों के पास जाऊंगा। पहले में जंग के प्रति केवल 20 फीसद ही प्रतिबद्ध था। लेकिन अब में पूरी तरह से जिहाद के प्रति समर्पित हूं, ताकि अपने मुल्क की हिफाजत कर सकूं।" पुल-ए-चरखी जेल से रिहा किए गए तालिबानी चरमपंथियों में से एक मौलवी फजल बारी के कैदी साथी कारी सैयद मुहम्मद हैं, जो तालिबान के कब्जे वाले इलाके में रहते हैं।

32 बरस के कारी सैयद मुहम्मद उत्तरी अफगानिस्तान के बल्ख सूबे में रहते हैं, जो तालिबान के कब्जे वाला इलाका है। कारी सैयद ने पुल-ए-चरखी जेल में छह साल गुजारे हैं। आज अपने परिवार के वो इकलौते मर्द हैं, जो जिंदा हैं। उनके अब्बा और दो भाई उस वक्त मारे गए थे, जब कारी जेल में थे। अब अपने परिवार का बसर करने के लिए कारी सैयद को अपने गांव में रहकर खेती करनी जरूरी है। कारी सैयद मुहम्मद का मानना है कि हाल ही में जेल से जो कैदी रिहा किए गए हैं, उन में से गिनती के ही जिंदा बचे हैं।

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि हाल में जिन मुजाहिदीन को रिहा किया गया था, उनमें से ज्यादातर दोबारा तालिबान की तरफ से जिहाद में शरीक हो गए थे, और ज्यादातर मारे जा चुके हैं।" कारी के दोस्त फजल बारी तो बदले के लिए तालिबान के साथ जुड़े थे। लेकिन खुद कारी ने पुलिस के जुल्म से बचने के लिए तालिबान का दामन थामा था। उस वक्त उनकी उम्र केवल 18 बरस थी। वो कहते हैं, "पुलिस के सितम, गांव की जिंदगी का अटूट हिस्सा हैं। अक्सर होता ये है कि किसी ने भी पुलिस को हमारे बारे में झूठ भी बोल दिया तो, वो हमें परेशान करते हैं। इसलिए हम ने सोचा कि अगर पुलिस हमें गिरफ्तार ही कर लेगी, तो क्यों न हम अपनी किस्मत का फैसला खुद से करें।"

2000 Taliban fighters imprisoned in Kabul most dangerous Pul-e-Charkhi jail in Afghanistan
तालिबान लड़ाके - फोटो : BBC

अफगानिस्तान की पुलिस के हिंसक बर्ताव और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के बारे में कई बार मानवाधिकार संगठनों ने आवाज उठाई है। हालांकि अफगानिस्तान के युवाओं के तालिबान से जुड़ने की कई वजहें होती हैं। गलत ठिकानों पर हवाई हमले, विदेशी सैनिकों की अंधाधुंध फायरिंग, बेरोजगारी, जंग में लूट के माल का लालच, जैसे कि हथियार, गाड़ियां और गोला-बारूद भी तालिबान से जुड़ने की वजह बनती हैं। इन सामानों को वो बेच कर कुछ पैसे कमा लेते हैं कई बार दोस्तों और साथियों के दबाव में भी लोग तालिबान के जिहाद का हिस्सा बन जाते हैं।

कारी मुहम्मद जब तालिबान से जुड़े थे, तो शुरू में उनका काम पैसे वसूलना होता था। मोटरसाइकिल पर सवार होकर छह लोगों की टोली गांवों की तरफ निकलती थी और अफीम की खेती करने वाले हर किसान से वसूली करती थी। तालिबान के इलाके में अफीम की खेती कानूनन वैध है। कारी के ऊपर अफगानिस्तान के चार जिलों में वसूली की जिम्मेदारी थी। कारी कहते हैं कि इस काम के लिए उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिलती थी। लेकिन, उनका सारा खर्च निकल आता था। उन्हें हथियारों, ईंधन और मोबाइल के लिए पैसे मिल जाते थे। कारी कहते हैं कि तीन साल बाद जब पूरे मुल्क में जंग तेज हो गई, तब उनका इरादा बदल गया और वो विदेशी फौजों के खिलाफ तालिबान के जिहाद में शामिल हो गए।

कारी बताते हैं, "जब मैंने पहली बार अपने कंधे पर बंदूक टांगी थी तब मेरी उम्र 21 बरस थी। मुझे आज भी याद है कि मैं ये सोचते हुए जंग के मोर्चे की तरफ चला था कि मैं काफिरों के खिलाफ जिहाद करने जा रहा हूं, ताकि इस्लाम की हिफाजत कर सकूं। वो खयाल आज भी मेरे जेहन में है और मरते दम तक रहेगा।" एक जिहादी विचारधारा का पालन करने वाले कारी कहते हैं कि उन्हें जब भी अपनी मौत को लेकर दिल में डर उठता है, और परिवार की फिक्र होती है, तो वो ये कह कर दिल को समझाते हैं कि वो अल्लाह की खिदमत करते हुए मारे जाएंगे। कारी सैयद एक मोर्चे पर जाने का किस्सा बताते हैं। जब उनकी टुकड़ी को एक गांव में घेर लिया गया था और रूसी मशीनगन से उन पर लगातार गोलियां बरसाई जा रही थीं।

कारी बताते हैं, "ऐसे मौकों पर आप का जहन बहुत तेजी से चलने लगता है। आप सोचने लगते हैं कि अगर आप की जान चली गई तो आप के परिवार का क्या होगा? मेरे बच्चों का क्या होगा? मेरी बीवी क्या करेगी? ये वो मौका होता है, जब शैतान आप को दीन के रास्ते से भटकाने की कोशिश करता है, ताकि आप अपने परिवार के बारे में सोचने लगें। लेकिन, मैंने अपना सारा दिमाग इस बात पर लगाया कि मैं तो बस अल्लाह की खिदमत कर रहा हूं।"कारी सैयद मुहम्मद को 2013 में अफगानिस्तान की खुफिया एजेंसी ने गिरफ्तार किया था। फिर उन्हें पुल-ए-चरखी जेल भेज दिया गया। कारी मानते हैं कि जिन 15 लोगों के साथ वो पहली बार अपना गांव छोड़ कर तालिबान के जिहाद में शामिल होने निकले थे, उन में से केवल दो लोग ही अब जिंदा बचे हैं।

कई दशकों से चले आ रहे युद्ध की वजह से आज अफगानिस्तान अलग-अलग ताकतों के कब्जे में है। फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के लॉन्ग वॉर जर्नल में छपे शोध के मुताबिक मुल्क का केवल 20-30 फीसद इलाके पर ही अफगान सरकार का निजाम चलता है। आज तालिबान का कब्जा 2001 में उनकी हुकूमत के दौर से ज्यादा बड़े इलाके में है। ऐसे में युवाओं के लिए बहुत ही कम मौके उपलब्ध हैं। ऐसे में बहुत से लोगों के लिए जंग में शामिल होने के सिवा कोई और रास्ता नहीं होता। कोई व्यक्ति लड़ाई में किस की तरफ से शामिल होगा, ये बात अक्सर उसकी पैदाइश के ठिकाने से तय होती है। पूर्वी अफगानिस्तान के कुनार सूबे के रहने वाले नेमतउल्लाह केवल 24 साल के थे, जब उन्होंने अफगानिस्तान की सेना में शामिल होने का फैसला किया।

नेमतउल्लाह की कहानी, अफगानिस्तान में फैली अराजकता की सटीक मिसाल है। करीब तीन साल तक पूरे अफगानिस्तान में सफर करते और जंग लड़ते हुए, नेमतउल्लाह और उनकी टुकड़ी को उरुजगान सूबे के पहाड़ी इलाके चिनार्तू की अलग-थलग पड़ी चौकी की निगरानी के लिए भेजा गया। नेमतउल्लाह की चौकी पर अक्सर तालिबान की छोटी टुकड़ियां हमला कर देती थीं। तब वो और उनके साथी सैनिक पलटवार में गोलीबारी करते थे और फिर तालिबानी टुकड़ी पीछे हट जाती थी। ये रोजमर्रा की बात हो गई थी। लेकिन, एक दिन तालिबानी चरमपंथियों ने बड़ी तादाद में नेमतउल्लाह की चौकी पर हमला कर दिया। लंबी लड़ाई चली। सुबह होने तक नेमतउल्लाह और उनके साथियों की गोलियां खत्म हो गई थीं।

तब तालिबानी लड़ाकों ने उन्हें पकड़ लिया और उनकी आंखों पर पट्टी बांध कर बंदूकों के बट से बुरी तरह पीटा, नेमतउल्लाह बताते हैं, "तालिबानी लड़ाके हमें काफिर कह कर गाली दे रहे थे। फिर वो हमें बांध कर वहां से ले गए। हर अगले कदम पर मुझे लगता था कि मैं अपनी मौत की तरफ बढ़ रहा हूं।"कई दिनों बाद अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने नेमतउल्लाह के परिवार से संपर्क किया और बताया कि उनका बेटा जंग में शहीद हो गया है। वो आकर उसका शव मुर्दाघर से ले जाएं। जब नेमतउल्लाह के परिवार को बंद ताबूत मिला, तो उसके कुछ घंटों बाद ही उनका जनाजा निकाल कर ताबूत को दफन कर दिया गया। अधिकारियों ने नेमतउल्लाह के परिवार वालों को ताबूत खोलने से मना कर दिया और कहा कि उनके बेटे का शव पहचाने जाने की हालत में नहीं है।

18 महीनों तक नेमतउल्लाह का परिवार और उनकी मंगेतर रोज उनकी कब्र पर जा कर फूल चढ़ाते और फातिहा पढ़ते रहे। उधर, उरुजगन में नेमतउल्लाह को पहाड़ियों के बीच गुफाओं से भरे एक इलाके में ले जाया गया था। उनके साथ 54 और लोगों को भी तालिबान ने पकड़ रखा था। उन्हें चट्टान को काट कर अपनी कोठरी खुद ही बनानी पड़ी। करीब डेढ़ साल तक खुद की बनाई इस कोठरी में नेमतउल्लाह, 11 और लोगों के साथ रहे। ये सभी बंधक अफगान सेना और पुलिस से ताल्लुक रखते थे। उनके हाथ और पैर हमेशा बंधे रहते थे। उन दिनों को याद करते हुए नेमतउल्लाह बताते हैं कि तालिबान उन्हें खाने के लिए बहुत कम रोटियां देते थे। रोज की ये कैद उनके लिए भूख जैसी परेशानी बन गई थी।

तभी एक रात को नेमतउल्लाह और उनके साथियों की नींद तेज धमाकों की आवाज से खुली। उनके पास ही हवाई हमला हुआ था। इससे हुई तबाही से नेमतउल्लाह और बाकी कैदियों को वहां से छूट कर भागने का मौका मिल गया। तालिबान की कैद से निकलने के बाद नेमतउल्लाह ने सब से पहले अपने पिता को फोन किया। नेमतउल्लाह बताते हैं कि जब फोन पर उन्होंने अपने अब्बा से कहा, "मैं नेमत बोल रहा हूं, तो मेरे पिता ने कहा कौन नेमत? मैंने कहा-आपका फरजंद (बेटा)। लेकिन उन्हें मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ।" इसके बाद उन्होंने अपनी कई सेल्फी अब्बा को भेजीं, तब जाकर उन्हें यकीन हुआ कि उनका बेटा अभी जिंदा है।

2000 Taliban fighters imprisoned in Kabul most dangerous Pul-e-Charkhi jail in Afghanistan
नेमतउल्लाह - फोटो : BBC

नेमतउल्लाह, रमजान के पहले दिन कुनार स्थित अपने घर पहुंचे थे। पूरे गांव में उनके जिंदा होने की खबर पहले ही फैल चुकी थी। जश्न मनाया जा रहा था। लेकिन, उस में शरीक होने से पहले नेमतउल्लाह को एक अहम काम करना था। उन्होंने जाकर उस अनजान फौजी की कब्र पर फूल चढ़ाए और फातिहा पढ़ा, जिसे अपना बेटा समझ कर उनके परिजनों ने दफनाया था। घर वापसी के बाद नेमतउल्लाह ने निकाह किया। वो और उनकी नई-नवेली दुल्हन अब भी उस अनजान फौजी की कब्र पर नियमित रूप से जाते हैं। वो कहते हैं कि शहीद जवान अब उनका भाई है और उनकी जिम्मेदारी है कि वो उसकी कब्र की देख-रेख करें।

अफगानिस्तान में शहीद जवानों की गलत शिनाख्त की ऐसी घटनाएं आम हैं। बीबीसी को ऐसी कई घटनाओं के बारे में पता चला। जब अगवा अफगानी सैनिक अपने घर पहुंचे, तो पता चला कि उनके परिवार ने किसी और की लाश को उनकी समझ कर दफना दिया है। सरकार अक्सर ऐसे मामलों में सीलबंद ताबूत देती है। इस बारे में पूछे जाने पर अफगान सरकार ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। कई दशकों के युद्ध और हिंसा ने बहुत से आम लोगों की जिंदगी को नरक बना दिया है। जिन लोगों के पास सबसे कम ताकत है, वो ही आज अफगानिस्तान में सब से कम महफूज हैं। इन में महिलाओं और बच्चों की तादाद सब से ज्यादा है।

जो महिलाएं सरकार के कब्जे वाले बड़े शहरों और कस्बों में रहती हैं, उनकी जिंदगी तालिबान की हुकूमत के दौर से काफी बदल गई है। अफगानिस्तान में एक चुनी हुई सरकार के गठन के बाद और मित्र देशों की सेनाओं की मौजूदगी की वजह से इन शहरों में, देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले जिंदगी ज्यादा महफूज है, बेहतर है। आज ज्यादा संख्या में लड़कियां स्कूल जाती हैं। और कामकाजी महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। तालिबान के राज में पढ़ाई के लिए स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या कमोबेश सिफर थी। तब से लड़कियों के स्कूल जाने का औसत बढ़ कर 37 फीसद हो गया है। हालांकि ये अब भी लड़कियों के तालीम हासिल करने के मामले में दुनिया का सबसे कम औसत है।

हालांकि, जो महिलाएं अभी भी तालिबान के कब्जे वाले इलाके में रह रही हैं, उन्हें तालीम हासिल करने और काम करने के मौके बहुत ही कम मिलते हैं। बहुत सी महिलाओं को डर है कि अगर, देश में दोबारा तालिबान का राज हो गया, तो उनकी आजादी पर और भी सख्त पहरा होगा। काबुल की रहने वाली नर्गिस स्कूल टीचर हैं और छह बच्चों की मां हैं। नर्गिस कहती हैं, "तालिबान हमें न पढ़ने देंगे और न ही काम करने देंगे। हमारे सारे हक छिन जाएंगे।" हालांकि तालिबानी चरमपंथी कहते हैं कि वो अब महिलाओं को अधिकार देने को प्रतिबद्ध हैं। लेकिन, बहुत से आलोचकों को इस बात पर संदेह है। नर्गिस भी इनमें से एक हैं, जो ये मानती हैं कि तालिबानी चरमपंथियों का बदलाव का दावा सही नहीं है।

वो कहती हैं, "मुझे इस बात पर शक है कि उनकी सोच बदल गई है। चूंकि वो अमन की बात कर रहे हैं, फिर भी धमाके होते रहते हैं। वो अपने मुस्लिम भाइयों और माताओं को मारते रहते हैं। ये किस किस्म का बदलाव है?" नर्गिस बताती हैं कि जब देश में तालिबान की हुकूमत कायम हुई, और उसके बाद देश में अराजकता फैली, तो उनकी पढ़ाई छूट गई थी। उन दिनों को याद कर के वो बताती हैं, "मैं उस वक्त कक्षा चार में पढ़ रही थी, जब तालिबान, सत्ता पर काबिज हुए। जब लड़ाई शुरू हुई, तो स्कूल बंद कर दिए गए। लड़कियों को घर से निकलने से मना कर दिया गया। मैं उस वक्त केवल दस साल की थी, जब मुझे बुर्का पहना कर घर पर बिठा दिया गया। मैं डर के मारे कभी घर से बाहर नहीं निकलती थी। फिर हम पाकिस्तान चले गए। स्कूल पीछे छूट गया। घर लौटने के बाद मुझे अपने पढ़ाई वाले दिनों की बहुत याद आती है।"

नर्गिस ने खुद से वादा किया है कि उनकी सबसे छोटी बेटी, आठ बरस की सोला को किस्मत की वैसी मार नहीं झेलनी पड़ेगी। सोला अभी स्कूल जाती है। अब तक उसने जो पढ़ा है, वो जंग और हिंसा का तजुर्बा ही रहा है। सोला ने हाल ही में एक तालिबानी आत्मघाती हमलावर को धमाके में खुद को उड़ाते देखा था। वो बताती हैं, "मैं ने देखा कि एक बम फट गया है। मैंने देखा कि जवान लोग मारे गए। मैं बहुत डर गई थी। मैं रोने लगी और अपनी अम्मी से लिपट गई। वो मुझे एक टैक्सी में बैठा कर घर ले आई थीं।" पूरे अफगानिस्तान में हिंसा रोज की बात है। ऐसे में शांति वार्ता से ही अमन की एक उम्मीद जगती है। लेकिन, अब सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि अमरीका और तालिबान दोबारा बातचीत की टेबल पर आएं। फिर इस शांति वार्ता में अफगानिस्तान की सरकार को भी शामिल किया जाए। फिलहाल तो ये बहुत बड़ी चुनौती लग रही है।

अफगानिस्तान की सरकार का कहना है कि वो तालिबान से तभी बात करेंगे, जब सभी पक्ष एक महीने के लिए युद्ध विराम का एलान करें। इसके जवाब में तालिबान का कहना है कि वो सरकार के साथ बातचीत तभी करेंगे, जब अफगानिस्तान से सभी विदेशी सैनिक वापस चले जाएं। तो, शायद यही वजह है कि नर्गिस जैसे आम लोग अपने देश में अमन और तब्दीली को लेकर नाउम्मीद हैं। नर्गिस कहती हैं, "मुझे नहीं लगता है कि मेरे मुल्क में कभी शांति बहाल होगी। अफगानिस्तान ऐसा कपड़ा बन गया है जिसे हर कोई अलग-अलग सिम्त खींच रहा है। ऐसे में दोस्त और दुश्मन में फर्क करना बेहद मुश्किल हो गया है। वो अमरीकी हों, तालिबान हों या फिर हमारी सरकार हो। राज चाहे जिसका भी हो। हम केवल अमन चाहते हैं।"

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