विश्व आर्थिक मंच का दावा- कार्यस्थल पर स्त्री-पुरुष समानता आने में लगेंगे 200 से ज्यादा साल
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महिलाएं लंबे समय से कार्यस्थल पर समान व्यवहार और वेतन की मांग कर रही हैं। हालांकि, स्त्री-पुरुष के बीच समानता के इस लक्ष्य को हासिल करने में अभी सदियां लगेंगी। एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) ने मंगलवार को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2017 के मुकाबले इस साल वेतन समानता के मोर्चे पर कुछ सुधार हुआ है। हालांकि, उसने चेताया कि राजनीति में महिलाओं का घटता प्रतिनिधित्व और शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में असामनता के चलते यह सुधार धूमिल हो गये हैं।
डब्ल्यूईएफ ने पाया कि मौजूदा समय में जिस दर से सुधार किये जा रहे हैं उस हिसाब से दुनिया भर के सभी क्षेत्रों में मौजूद स्त्री-पुरुष असमानता को अगले 108 सालों में दूर नहीं किया जा सकेगा। जबकि कार्यस्थल पर असमानता को खत्म करने में 200 साल लगने की उम्मीद है।
आइसलैंड में सबसे ज्यादा समानता
स्त्री पुरुष समानता के मामले में एक बार नॉर्डियक देश शीर्ष पर है। सबसे ज्यादा समानता आइसलैंड में है। उसके बाद नोर्वे, स्वीडन और फिनलैंड है। सर्वेक्षण में सीरिया, इराक, पाकिस्तान और अंत में यमन सबसे नीचे रहा। डब्ल्यूईएफ ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में 149 देशों में स्त्री-पुरुष के बीच चार क्षेत्रों में मौजूद असमानताओं का जिक्र किया है।
ये क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसर और राजनीतिक सशक्तिकरण हैं। मंच ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक भागीदारी में पिछले वर्षों में सुधार हुआ था। हालांकि, इस साल इन तीनों क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति में गिरावट रही।
सिर्फ आर्थिक अवसरों के क्षेत्र में स्त्री-पुरुष असामनता को कम करने में कुछ प्रयास किये गये हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर वेतन में अंतर मामूली कम होकर करीब 51 प्रतिशत है।
डब्ल्यूईएफ ने कहा कि वैश्विक स्तर पर नेतृत्व की भूमिका में महिलाओं की संख्या बढ़कर 34 प्रतिशत हो गयी है। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि पश्चिमी यूरोपीय देश स्त्री-पुरुष असमानता को 61 वर्षों में पाट सकते है। पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका को इसमें 153 साल लगेंगे।
बेटियों के पिता नहीं करते लैंगिक भेदभाव
लंदन में किए गए एक शोध में निकल कर आया है कि जो पुरुष बेटी के पिता होते हैं उनमें महिलाओं के साथ भेदभाव की पारंपरिक सोच होने की संभावना कम होती है। बेटी के स्कूल जाने की उम्र में पहुंचने तक यह संभावना और कम हो जाती है। ब्रिटेन में 1991 से 2012 के बीच के दो दशकों के एक शोध में कई माता-पिता से बात की गई। इसमें उनसे पूछा गया कि क्या वह पुरुषों के नौकरी करने और महिलाओं के सिर्फ घर संभालने की पारंपरिक सोच का समर्थन करते हैं।
‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस’ (एलएसई) के शोधार्थियों ने संतान के रूप में बेटी के जन्म के बाद महिलाओं और पुरुषों पर इसके प्रभाव का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि संतान के रूप में बेटी के पिता बनने वाले पुरुषों की लैंगिक भूमिका के प्रति पारंपरिक सोच रखने की संभावना कम होती है और उसमें भी, जब बेटी स्कूल जाने की उम्र तक पहुंचती है तो पिता में पारंपरिक सोच की संभावना और कम हो जाती है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि वहीं दूसरी ओर, माताओं के पारंपरिक सोच रखने की संभावना शुरू से ही कम होती है, इसका बेटी होने से संबंध बहुत कम है। उसका कारण यह है कि महिलाएं पहले से ही पारंपरिक सोच का सामना स्वयं कर चुकी होती हैं।