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Supreme Court takes a tough stance on the suspension of Metro services in Delhi; notices issued to everyone fr
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दिल्ली में मेट्रो बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, गृह सचिव से लेकर पुलिस तक को नोटिस जारी!
वीडियो डेस्क अमर उजाला डॉट कॉम
Published by: Bhaskar Tiwari
Updated Mon, 12 Oct 2026 02:23 AM IST
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दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के दौरान मेट्रो और ट्रेनों की आवाजाही रोके जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं ने पहली नजर में अपना मामला बना लिया है। इस टिप्पणी का अर्थ है कि अदालत को शुरुआती तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि उसके आदेश का उल्लंघन हुआ हो सकता है। हालांकि, अभी इस मामले में अंतिम निर्णय नहीं आया है और न ही यह साबित हुआ है कि संबंधित अधिकारियों ने अदालत की अवमानना की है। अब इस मामले में अधिकारियों के जवाब और उनके द्वारा दाखिल की जाने वाली रिपोर्ट के आधार पर आगे की सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को रोके जाने और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे पर ध्यान केंद्रित हुआ है।
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। पीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) की अध्यक्ष डी. थारा को नोटिस जारी किए हैं। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को 13 अक्तूबर 2026 तक अपना जवाब दाखिल करने और अदालत के आदेश का पालन किए जाने से संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने से छूट दे दी है। इसका मतलब है कि अधिकारियों को निर्धारित समयसीमा के भीतर अपना पक्ष रखना होगा, लेकिन फिलहाल उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने की आवश्यकता नहीं है। मामले में आगे की कार्रवाई उनके जवाब और अदालत के समक्ष उपलब्ध तथ्यों के आधार पर तय होगी।
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन के दौरान मेट्रो और रेल सेवाओं पर रोक लगाकर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार और दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी की। याचिकाकर्ता का आरोप है कि संबंधित अधिकारियों को अदालत के आदेशों और दिए गए आश्वासनों का पालन करना चाहिए था, लेकिन इसके बावजूद सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर व्यापक प्रतिबंध जारी रहे। याचिका में इस कार्रवाई को जानबूझकर उठाया गया कदम बताते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू नागरिकों के मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन का है। प्रदर्शन के दौरान परिवहन सेवाएं बाधित होने से यात्रियों को परेशानी होने और उनके आवागमन के अधिकार प्रभावित होने का सवाल उठता है। वहीं, संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी और उनके फैसलों के पीछे की परिस्थितियों को समझना भी आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी केवल याचिकाकर्ताओं के मामले को प्रथम दृष्टया विचार योग्य माना है। अब संबंधित अधिकारियों के जवाब और अनुपालन रिपोर्ट के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अदालत के आदेश का उल्लंघन हुआ था या नहीं और आगे किस प्रकार की कार्रवाई की जा सकती है।
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