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भ्रष्टाचार मामले में फैसला: एफआईआर होगी दर्ज पर कार्रवाई पर रहेगी रोक, पंजाब सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत
Mon, 12 Oct 2026 01:34 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: अस्मिता त्रिपाठी
Updated Mon, 12 Oct 2026 01:34 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि सीबीआई राज्य सरकार से जुड़े लोगों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न करे। हालांकि, कोर्ट ने एफआईआर पर रोक नहीं लगाई है। आइए जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने किस मामले में मान सरकार को दी राहत?
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निर्देश दिया कि सीबीआई पंजाब सरकार से जुड़े लोगों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न करे। सीबीआई राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही है।
याचिका में क्या मांग की गई?
यह आदेश पंजाब सरकार की उस याचिका पर आया है जिसमें हाई कोर्ट के उस निर्देश पर रोक लगाने की मांग की गई थी, जिसमें सीबीआई को राज्य सरकार से जुड़े लोगों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने और दो महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था।
बेंच ने क्या कहा?
जस्टिस एमएम सुंदेश और पीबी वराले की बेंच ने केंद्र, सीबीआई, ईडी और अन्य को नोटिस जारी किया। बेंच ने कहा, 'हम एफआईआर पर रोक नहीं लगा रहे हैं। हम कह रहे हैं कि कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।'
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पंजाब सरकार की ओर से सीनियर वकील विकास सिंह और सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए। पिछले सोमवार को, राज्य सरकार ने वकील निखिल सराफ की याचिका पर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के निर्देश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। आरोपों में ट्रांसफर के लिए पैसे और मनमुताबिक नीतियां बनवाने के लिए पैसे का लेन-देन शामिल है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से आम आदमी पार्टी (आप) सरकार को सूचना भेजे जाने के बावजूद अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। यह तर्क दिया गया कि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए क्योंकि इनसे राज्य सरकार के कामकाज पर गंभीर सवाल उठते हैं। हाई कोर्ट ने पंजाब पुलिस और सरकार को यह भी निर्देश दिया कि इस मामले से जुड़े सभी दस्तावेज सीबीआई को सौंप दिए जाएं।
पंजाब सरकार ने कोर्ट के फैसले पर क्या कहा?
हाई कोर्ट के फैसले को कई आधारों पर चुनौती देते हुए पंजाब सरकार ने कहा कि फैसले में कई कमियां हैं। सरकार का कहना है कि कोर्ट ने 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA) की धारा 66(2) के तहत दी गई जानकारी को एक ऐसे निर्देश के तौर पर लिया जिससे केस दर्ज करना अनिवार्य हो जाता है, जो कि विजय मदनलाल चौधरी मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले के खिलाफ है।
याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट का फैसला सरकारी कर्मचारियों की ओर से ट्रांसफर, टेंडर और पॉलिसी से जुड़े फैसलों पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देता है, जबकि 'प्रिवेंशन ऑफ करप्शन (PC) एक्ट' की धारा 17A के तहत इसके लिए पहले से मंजूरी लेना जरूरी है। साथ ही, कोर्ट ने ब्यूरो को इस बात के लिए भी दोषी ठहराया है कि उसने किसी मौजूदा अधिकारी को जांच में शामिल नहीं किया, जबकि ऐसी मंजूरी के बिना वे कानूनी तौर पर उस अधिकारी से पूछताछ नहीं कर सकते थे।
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याचिका में क्या मांग की गई?
यह आदेश पंजाब सरकार की उस याचिका पर आया है जिसमें हाई कोर्ट के उस निर्देश पर रोक लगाने की मांग की गई थी, जिसमें सीबीआई को राज्य सरकार से जुड़े लोगों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने और दो महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था।
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बेंच ने क्या कहा?
जस्टिस एमएम सुंदेश और पीबी वराले की बेंच ने केंद्र, सीबीआई, ईडी और अन्य को नोटिस जारी किया। बेंच ने कहा, 'हम एफआईआर पर रोक नहीं लगा रहे हैं। हम कह रहे हैं कि कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।'
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पंजाब सरकार की ओर से सीनियर वकील विकास सिंह और सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए। पिछले सोमवार को, राज्य सरकार ने वकील निखिल सराफ की याचिका पर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के निर्देश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। आरोपों में ट्रांसफर के लिए पैसे और मनमुताबिक नीतियां बनवाने के लिए पैसे का लेन-देन शामिल है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से आम आदमी पार्टी (आप) सरकार को सूचना भेजे जाने के बावजूद अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। यह तर्क दिया गया कि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए क्योंकि इनसे राज्य सरकार के कामकाज पर गंभीर सवाल उठते हैं। हाई कोर्ट ने पंजाब पुलिस और सरकार को यह भी निर्देश दिया कि इस मामले से जुड़े सभी दस्तावेज सीबीआई को सौंप दिए जाएं।
पंजाब सरकार ने कोर्ट के फैसले पर क्या कहा?
हाई कोर्ट के फैसले को कई आधारों पर चुनौती देते हुए पंजाब सरकार ने कहा कि फैसले में कई कमियां हैं। सरकार का कहना है कि कोर्ट ने 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA) की धारा 66(2) के तहत दी गई जानकारी को एक ऐसे निर्देश के तौर पर लिया जिससे केस दर्ज करना अनिवार्य हो जाता है, जो कि विजय मदनलाल चौधरी मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले के खिलाफ है।
याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट का फैसला सरकारी कर्मचारियों की ओर से ट्रांसफर, टेंडर और पॉलिसी से जुड़े फैसलों पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देता है, जबकि 'प्रिवेंशन ऑफ करप्शन (PC) एक्ट' की धारा 17A के तहत इसके लिए पहले से मंजूरी लेना जरूरी है। साथ ही, कोर्ट ने ब्यूरो को इस बात के लिए भी दोषी ठहराया है कि उसने किसी मौजूदा अधिकारी को जांच में शामिल नहीं किया, जबकि ऐसी मंजूरी के बिना वे कानूनी तौर पर उस अधिकारी से पूछताछ नहीं कर सकते थे।