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EPFO पर मोदी सरकार का बड़ा फैसला, मिनिमम सैलरी लिमिट हुई ₹25,000
देश के लाखों नौकरीपेशा लोगों के लिए बुधवार का दिन बड़ी खबर लेकर आया। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब तक जिन कर्मचारियों के लिए यह सीमा 15 हजार रुपये प्रति माह थी, उसे बढ़ाकर 25 हजार रुपये कर दिया गया है। यानी अब 25 हजार रुपये तक मासिक वेतन पाने वाले ज्यादा कर्मचारी ईपीएफओ के अनिवार्य दायरे में आ सकेंगे।
सरकार के इस फैसले का सीधा असर बड़ी संख्या में कर्मचारियों पर पड़ेगा। अनुमान के मुताबिक, इस बदलाव के बाद 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी ईपीएफओ के अनिवार्य कवरेज के दायरे में आ जाएंगे। सरकार का कहना है कि इस फैसले का मकसद देश में बढ़ती आय, लगातार हो रही वेतन वृद्धि और औपचारिक रोजगार के विस्तार को ध्यान में रखते हुए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना है।
इस महत्वपूर्ण फैसले की जानकारी सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस वार्ता के दौरान दी। उन्होंने बताया कि ईपीएफओ की वेतन सीमा में यह बदलाव करीब 12 साल बा* किया जा रहा है। इससे पहले सितंबर 2014 में वेतन सीमा को बढ़ाकर 15 हजार रुपये प्रति माह किया गया था।
अगर इससे पहले के इतिहास पर नजर डालें तो ईपीएफओ की वेतन सीमा लंबे समय तक नहीं बदली थी। साल 2004 से 2014 के बीच यह सीमा अपरिवर्तित रही। 2014 में इसे 15 हजार रुपये किया गया और अब एक दशक से ज्यादा समय बाद सरकार ने इसमें एक और बड़ा बदलाव किया है।
अब सवाल है कि आखिर सरकार ने वेतन सीमा बढ़ाने का फैसला क्यों किया?
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था के साथ कर्मचारियों की आय में भी बदलाव आया है। वेतन में बढ़ोतरी हुई है और औपचारिक रोजगार का दायरा भी बढ़ा है। ऐसे में 15 हजार रुपये की पुरानी सीमा के कारण बड़ी संख्या में कर्मचारी ईपीएफओ के अनिवार्य कवरेज से बाहर रह जाते थे। नई सीमा के जरिए सरकार ऐसे कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना चाहती है।
ईपीएफओ में शामिल होने का मतलब सिर्फ भविष्य के लिए बचत नहीं है। इसके तहत कर्मचारियों को भविष्य निधि से जुड़े लाभ मिलते हैं और पात्रता के अनुसार पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं का भी फायदा मिलता है। ऐसे में वेतन सीमा बढ़ने से 25 हजार रुपये तक मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा का कवरेज व्यापक होगा।
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू सरकार पर पड़ने वाला वित्तीय भार भी है। मौजूदा समय में वार्षिक बजट सहायता करीब 10,250 करोड़ रुपये बताई गई है। नई व्यवस्था के बाद अनुमानित वार्षिक सरकारी खर्च करीब 11,339 करोड़ रुपये हो जाएगा। यानी सरकार पर हर साल लगभग 1,089 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा।
वहीं, अगले पांच वर्षों की बात करें तो अनुमानित कुल व्यय करीब 56,696 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। सरकार इस अतिरिक्त खर्च को कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा कवरेज को मजबूत करने की दिशा में निवेश के तौर पर देख रही है।
कुल मिलाकर, ईपीएफओ की वेतन सीमा में यह बदलाव देश के औपचारिक रोजगार क्षेत्र के लिए एक अहम कदम है। 15 हजार से 25 हजार रुपये की सीमा बढ़ने से 51 लाख से ज्यादा अतिरिक्त कर्मचारी कवरेज में आएंगे, जबकि सरकार को भी इसके लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। अब इस फैसले का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि नए दायरे में आने वाले कर्मचारियों को ईपीएफओ की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था से किस तरह जोड़ा जाता है।
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