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हवाई सफर नहीं होगा और महंगा, जेट फ्यूल के बढ़ते दामों के बीच सरकार का धांसू प्लान
वीडियो डेस्क अमर उजाला डॉट कॉम
Published by: Bhaskar Tiwari
Updated Wed, 07 Oct 2026 04:45 AM IST
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फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (FIA) ने एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी एटीएफ की मौजूदा कीमत तय करने की व्यवस्था की समीक्षा करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि घरेलू एयरलाइंस के लिए एटीएफ की कीमत अंतरराष्ट्रीय मानकों के बजाय वास्तविक लागत और उचित मार्जिन को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए। एफआईए के मुताबिक, हाल के महीनों में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और रुपये की कमजोरी ने एयरलाइन कंपनियों की ईंधन लागत पर काफी दबाव बढ़ाया है। संगठन ने नागर विमानन मंत्रालय को भेजे पत्र में कहा है कि अगर समय रहते राहत नहीं मिली तो एयरलाइंस को कुछ ऐसे मार्गों पर सेवाएं बंद करने का फैसला लेना पड़ सकता है, जहां परिचालन आर्थिक रूप से मुश्किल हो रहा है। एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट एफआईए के सदस्य हैं। संगठन के अनुसार, एयरलाइंस की कुल परिचालन लागत में ईंधन का हिस्सा पहले के मुकाबले काफी बढ़ गया है और एटीएफ अभी भी विमानन कंपनियों के सबसे बड़े खर्चों में शामिल है। एफआईए का दावा है कि मौजूदा परिस्थितियों में एयरलाइन कंपनियों की परिचालन लागत का दबाव करीब 55 से 60 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि पहले यह लगभग 30 से 40 प्रतिशत के स्तर पर था।
पश्चिम एशिया में बढ़े संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर भी विमानन क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है। एफआईए द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड की कीमत 72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 118 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची, जिसका सीधा असर जेट फ्यूल की कीमतों पर पड़ा। संगठन के अनुसार, एटीएफ की कीमत 87.24 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर एक समय 260.24 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई थी, यानी इसमें करीब 295 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि, बाद में कीमत घटकर लगभग 175.33 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आई, लेकिन यह अभी भी मार्च 2025 के मुकाबले काफी अधिक बताई जा रही है। एयरलाइंस का कहना है कि ईंधन की कीमतों में इतनी बड़ी वृद्धि का असर उनके कैश फ्लो और संचालन पर पड़ रहा है। इसका प्रभाव किराए, नए रूट शुरू करने की क्षमता और कम मांग वाले मार्गों पर सेवाओं की निरंतरता पर भी पड़ सकता है। एफआईए चाहती है कि सरकार एटीएफ के मूल्य निर्धारण मॉडल पर दोबारा विचार करे और ऐसी व्यवस्था तैयार की जाए जिससे घरेलू विमानन कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव से कुछ राहत मिल सके। दूसरी ओर, यात्रियों के लिए भी एटीएफ की कीमतें महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि एयरलाइंस की ईंधन लागत बढ़ने पर उसका असर टिकट किराए पर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले समय में सरकार और एयरलाइन उद्योग के बीच एटीएफ की कीमतों को लेकर बातचीत अहम रहने वाली है।
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