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आखिर हाशिए पर क्यूं है गांधी की सरकार...

Sun, 28 Jul 2013 10:01 AM IST
देहरादून/सुधाकर भट्ट
देहरादून/सुधाकर भट्ट Updated Sun, 28 Jul 2013 10:01 AM IST
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Why Gandhi's government has marginalized

राज्य सरकार ने ‘स्थानीय सरकार’ को हाशिए पर डाल रखा है। प्रदेश के 65 हजार से ज्यादा पंचायत प्रतिनिधियों और कर्मियों का इस्तेमाल आपदा प्रबंधन में नहीं किया जा रहा है।

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यह तब है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर बनी आपदा प्रबंधन नीति स्पष्ट रूप से ‘स्थानीय सरकार’ के अधिकतम उपयोग पर जोर दे रही है। ऐसे में कलक्टर साहब के राज में आपदा प्रबंधन प्रदेश में ग्राम स्तर तक पहुंचने की बजाय जिला मुख्यालयों पर सिमट कर रह गया है।
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अब सरकार विकासखंड स्तर पर अधिकारियों को जिम्मा देकर इस आपदा से पार पाने की कोशिश कर रही है पर पंचायतों की भूमिका को बिल्कुल ही नजरअंदाज किया जा रहा है।
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पंचायतों के पास गांव के स्तर पर आपदा से निपटने की पूरी मशीनरी मौजूद है। प्रदेश में 7555 ग्राम प्रधान हैं। ये प्रधान करीब 52 हजार पंचायत प्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। प्रधानों को मनरेगा से लेकर ग्राम्य विकास की तमाम योजनाओं के तहत गांव के विकास केलिए पैसा उपलब्ध कराया जाता है।

पर आपदा के समय एक भी ग्राम प्रधान को यह अधिकार नहीं दिया गया कि वह राहत से लेकर गांव की जरूरतों को सरकार के समाने रख सके। लिहाजा राहत, बचाव और पुनर्निर्माण में स्थानीय स्तर की इकाई पूरी तरह से उपेक्षित है।

यह तब है जबकि आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 में स्पष्ट व्यवस्था है कि आपदा प्रबंधन में पंचायतों और स्थानीय शहरी निकायों को शामिल किया जाए। 2005 में ही होयोगो सहमति पत्र में भी भारत ने सीधे तौर पर आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए पंचायतों को सशक्त करने पर हामी भरी थी। पर सात साल बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है।

सक्रिय रहे तो काम भी हुआ

जहां पंचायत प्रतिनिधि सक्रिय रहे वहां दूसरी तस्वीर भी नजर आई। पर इन पंचायत प्रतिनिधियों को भी आपदा प्रबंधन में सीधी भागीदारी नहीं मिल पाई। इन्हें जिला प्रशासन से ही बात करनी पड़ी।

ऐसे में ये पंचायत प्रतिनिधि जिला प्रशासन के सामने एक दबाव बनाने वाले वर्ग के रूप में ही ज्यादा नजर आए। मसलन जोनपुर के आपदा प्रभावित गांवों में राहत सामग्री समय से पंचायत प्रतिनिधियों की सक्रियता के कारण पहुंच पाई। इन प्रतिनिधियों ने आपदा से हुए नुकसान का आकलन किया और जिला प्रशासन से राहत भिजवाने की मांग की।

होयोगो फ्रेमवर्क में किया गया था वादा
2005 में 18 से 22 जनवरी केबीच जापान, होयोगों में 168 देशों के सम्मेलन में आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने पर एक सहमतिपत्र जारी किया गया था। इस सहमति पत्र को जारी करने वाले देशों में भारत भी शामिल था।

इस सहमति पत्र में साफ कहा गया था कि आपदा प्रबंधन और न्यूनीकरण में पंचायतों और शहरी निकायों की भूमिका स्पष्ष्ट की जाएगी। इसके होयोगो फ्रेमवर्क कहा गया। भारत में इसी के आधार पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति भी तय की गई। इस नीति में भी स्पष्ट रूप से पंचायतों को आपदा प्रबंधन में शामिल करने पर जोर दिया गया।

क्या कहती है राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की गाइड लाइन
-पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों को आपदा के प्रति जागरूक किया जाएगा, उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा और आपदा प्रबंधन की ओर मोड़ा जाएगा।
-प्रत्येक गांव के लिए आपदा प्रबंधन से संबंधित डाटा बेस तैयार किया जाएगा।
-आपदा प्रबंधन के तहत पंचायती राज संस्थाओं को फंड मुहैया कराया जाएगा।
-पंचायती राज संस्थाओं की विकास योजनाओं में आपदा न्यूनीकरण के प्रावधान किए जाएंगे।

प्रदेश में क्या है वर्तमान स्थिति
आपदा प्रबंधन के मूल में जिलाधिकारी है। जिलाधिकारी एक तरह से जिलास्तर पर आपदा प्रबंधन अधिकारी भी है। जिलाधिकारी राजस्व विभाग का हिस्सा है और इसलिए राहत से लेकर बचाव तक के काम में राजस्व विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।

मसलन रेवेन्यू रिकार्ड पहाड़ में पटवारियों के पास हैं और नुकसान का आंकलन से लेकर भरपाई तक का काम इन्ही के जिम्मे है। ऐसे में आपदा प्रबंधन विभाग से लेकर शासन तक का फोकस राजस्व विभाग पर रहता है।

क्या होगा पंचायतों के आने पर

-पंचायतों केपास हर गांव की इनवेंटरी वोटर लिस्ट से लेकर विकास योजनाओं के नाम पर रहती है। ऐसे में राहत और बचाव के काम को ग्राम सभा केस्तर पर संचालित किया जा सकता है।

क्या है अड़चन
-पंचायतों को राष्ट्रीय नीति के अनुरूप फंड उपलब्ध नहीं हो रहेहैं।
-संविधान के 73वें संशोधन केतहत पंचायतों को 29 विषयों में अधिकार दिए जाने थे। इन अधिकारों की बदौलत ही पंचायतों को स्थानीय सरकार कहा गया। पर यह अधिकार प्रदेश में पंचायतों को नहीं दिया गया। लिहाजा पंचायतें इतनी मजबूत ही नही हैं कि आपदा प्रबंधन के काम को बेहतर तरीके से कर भी पाएं।


क्या कहते हैं प्रतिनिधि
'आपदा प्रबंधन में पंचायतों की कोई भूमिका है ही नहीं। हाल यह है कि ग्राम प्रधान से लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष तक को राहत, बचाव और अन्य कार्य में शामिल नहीं किया जा रहा है। पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किया जाता तो आपदा प्रबंधन में वे बेहतर कार्य कर सकते थे।'
जोत सिंह बिष्ट, अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य संगठन

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