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उत्तराखंड आपदा: रातों-रात चले पैदल, 4 दिन बाद मिला खाना
गिरीश रंजन तिवारी
Updated Sat, 22 Jun 2013 08:44 AM IST
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केदारघाटी में जहां छह माह तक कभी रात ही नहीं होती थी और चौबीसों घंटे मेले का सा माहौल रहता था आज वहां श्मशान जैसी खामोशी छाई हुई है।
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गौरीकुंड से केदारनाथ तक यात्रियों को डोली में बैठाकर ले जाने वाले नैनीताल निवासी सात नेपाली मजदूर इस हादसे से बचकर आज नैनीताल पहुंचे तो उन्होंने उस भयावह रात का वाकया सुनाया।
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तस्वीरों में: तबाही के बाद राहत का इंतजार
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ये मजदूर बीते दो माह से गौरीकुंड में रह रहे थे और यात्रियों को डोली व कंडी में बैठाकर 14 किलोमीटर खड़ी चढ़ाई पार कर केदारनाथ पहुंचाते थे। रात्रि में इनका ठिकाना गौरीकुंड का एक होटल था।
हादसा होते ही ये जंगल की ओर भाग निकले और लगातार चार दिन तक भूखे प्यासे जंगलों में रात बिताते किसी तरह रूद्रप्रयाग पहुंच गए।
तस्वीरों में:- कुदरत के कहर के बाद बचाव की कोशिश
प्रेम बहादुर और दिलीप ने बताया कि इन दिनों यात्रा पूरे जोरों पर थी गौरी कुंड से दिन और रात में लगातार यात्री केदारनाथ जाते थे। रास्ते भर लाइटें लगी थीं और यात्रियों की भीड़ इतनी कि वहां कभी रात होती ही नहीं थी रात दिन मेले सा माहौल रहता था।
रविवार की शाम वे गौरीकुंड में थे कि अचानक ऊपर से मलबा आने लगा। लोगों में खलबली मची पर फिर इसका वेग कम हो गया लेकिन साढ़े नौ बजे बहुत भारी मात्रा में मलबा आने लगा और गौरीकुंड के लगभग पांच दर्जन तीन चार मंजिले होटलों में से पचास से ज्यादा लोग जमींदोज हो गए।
तस्वीरों में: आसमान से बरसी आफत
जिस होटल में वे रहते थे उसके मालिक के पास उन्होंने डेढ़ लाख रूपए की अपनी कमाई भी जमा कर रखी थी लेकिन वह होटल भी धराशाई हो गया और उसका मलिक भी मारा गया। इनके डेढ़ लाख भी गए।
उन्होंने बताया कि भागते हुए उन्होंने पचास-साठ शव इधर उधर पड़े देखे। बीते तीन वर्ष से यात्रा के दौरान इस क्षेत्र में जाने और यात्रियों को ढोने के कारण इनमें इतना स्टैमिना था कि वे पैदल जंगल से भागते हुए चार दिन यात्रा करके रूद्रप्रयाग पहुंच गए।
इस दौरान डर के मारे रात को नींद भी नहीं आई। उन्होंने बताया कि चार दिन भूखे प्यासे रहकर पचास रूपए में मुठ्ठी भर भात उन्हें रुद्रप्रयाग में नसीब हुआ। पैसा न होने के कारण उन्होंने नैनीताल पहुंचने के बाद ही खाना गया।
उन्होंने बताया कि वे नेपाल के कालीकाट के रहने वाले हैं उनके परिवार जनों को यह तो मालूम था कि वे गौरीकुंड में थे पर वे सुरक्षित हैं यह खबर अभी तक घर वालों को नहीं दे पाए। गौरीकुंड में जब तूफानी रफ्तार से मलबे का सैलाब सब कुछ निगल रहा था तो उन्हें उमीद नहीं थी कि वे बच पाएंगे। मौत को सामने देखकर किसी ने अपने बच्चे और पत्नी तो किसी ने इष्ट देवता को याद किया। यह सब बताते हुए प्रेम बहादुर और दिलीप की आंखें भर आईं।