{"_id":"56f632e84f1c1b610cf14d5c","slug":"vegetation-will-rise-again","type":"story","status":"publish","title_hn":"गंगा की गोद में फिर खिलेंगी गायब वनस्पतियां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गंगा की गोद में फिर खिलेंगी गायब वनस्पतियां
रजा शास्त्री/अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 26 Mar 2016 03:25 PM IST
विज्ञापन
गंगा
- फोटो : file photo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सैकड़ों साल पहले जिन वनस्पतियों से अठखेलियां कर गंगा जल अपने अंदर औषधीय तत्व समाहित कर लेता था, बेसिन से पलायन कर चुकीं ऐसी कई वनस्पतियां एक बार फिर गंगा की गोद में पुष्पित और पल्लवित होंगी।
नमामि गंगे परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में वनीकरण के सबसे अधिक 10 मॉडल उत्तराखंड के लिए बनाए गए हैं। परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण केदारनाथ मॉडल में 10 वनस्पतियों को रखा गया है। गंगा बेसिन से तकरीबन 35 किमी दूर पलायन कर गईं इन वनस्पतियों को फिर यहां लाया जा रहा है।
नमामि गंगे परियोजना के केदारनाथ मॉडल के तहत वनीकरण की शुरुआत गोमुख से होनी है। सबसे अधिक जोर यहां घास और छोटी वनस्पतियों को संरक्षित करने पर दिया गया है। गोमुख में इन वनस्पतियों के बीजों को ऐसे ही बिखेर दिया जाएगा।
विज्ञापन
उत्तराखंड में देवदार और बांस के पौधरोपण पर जोर
इससे थोड़े नीचे एकोनिकम, इफेडरा, बाल फोराई आदि वनस्पतियों की पौध लगाई जाएगी। केदारनाथ के माहौल के मद्देनजर यहां डेढ़ से दो साल उम्र के पौधे ही रोपे जाएंगे। नई पौध के तैयार होने तक नर्सरियों के पुराने स्टॉक का इस्तेमाल किया जाएगा।
गंगा बेसिन में जड़ी-बूटियों के बहुत से पौधे पलायन कर गए हैं। ये वनस्पतियां गंगा बेसिन से 25-30 किमी पीछे खिसकी हैं। वनस्पतियों के पलायन के पीछे वन अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. ओमवीर सिंह गंगा में कचरा डाला जाना और ‘सेडीमेंटेशन’ को कारण बता रहे हैं। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में इसे रोकने के लिए भी कहा गया है।
उत्तराखंड के अन्य मॉडलों में देवदार और बांस के पौधरोपण पर जोर दिया गया है। उत्तराखंड के 10 मॉडलों में जड़ी-बूटियों की अधिकता है। इनमें अधिकतर जड़ी बूटी शिव आराधना से जुड़ी हुई हैं। यूपी गंगा बेसिन में वनीकरण के लिए चार मॉडल बनाए गए हैं।
-उत्तराखंड के 54856 हेक्टेयर भूमि पर वनीकरण के लिए कहा गया है। इसकी शुरुआत उत्तराखंड से होनी है। उत्तराखंड के अलावा यूपी, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल मिलाकर कुल एक लाख, 34 हजार, 106 हेक्टेयर भूमि पर वनीकरण किया जाएगा।
-डा. सविता, निदेशक वन अनुसंधान संस्थान
विज्ञापन
नमामि गंगे परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में वनीकरण के सबसे अधिक 10 मॉडल उत्तराखंड के लिए बनाए गए हैं। परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण केदारनाथ मॉडल में 10 वनस्पतियों को रखा गया है। गंगा बेसिन से तकरीबन 35 किमी दूर पलायन कर गईं इन वनस्पतियों को फिर यहां लाया जा रहा है।
विज्ञापन
नमामि गंगे परियोजना के केदारनाथ मॉडल के तहत वनीकरण की शुरुआत गोमुख से होनी है। सबसे अधिक जोर यहां घास और छोटी वनस्पतियों को संरक्षित करने पर दिया गया है। गोमुख में इन वनस्पतियों के बीजों को ऐसे ही बिखेर दिया जाएगा।
विज्ञापन
उत्तराखंड में देवदार और बांस के पौधरोपण पर जोर
इससे थोड़े नीचे एकोनिकम, इफेडरा, बाल फोराई आदि वनस्पतियों की पौध लगाई जाएगी। केदारनाथ के माहौल के मद्देनजर यहां डेढ़ से दो साल उम्र के पौधे ही रोपे जाएंगे। नई पौध के तैयार होने तक नर्सरियों के पुराने स्टॉक का इस्तेमाल किया जाएगा।
गंगा बेसिन में जड़ी-बूटियों के बहुत से पौधे पलायन कर गए हैं। ये वनस्पतियां गंगा बेसिन से 25-30 किमी पीछे खिसकी हैं। वनस्पतियों के पलायन के पीछे वन अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. ओमवीर सिंह गंगा में कचरा डाला जाना और ‘सेडीमेंटेशन’ को कारण बता रहे हैं। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में इसे रोकने के लिए भी कहा गया है।
उत्तराखंड के अन्य मॉडलों में देवदार और बांस के पौधरोपण पर जोर दिया गया है। उत्तराखंड के 10 मॉडलों में जड़ी-बूटियों की अधिकता है। इनमें अधिकतर जड़ी बूटी शिव आराधना से जुड़ी हुई हैं। यूपी गंगा बेसिन में वनीकरण के लिए चार मॉडल बनाए गए हैं।
-उत्तराखंड के 54856 हेक्टेयर भूमि पर वनीकरण के लिए कहा गया है। इसकी शुरुआत उत्तराखंड से होनी है। उत्तराखंड के अलावा यूपी, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल मिलाकर कुल एक लाख, 34 हजार, 106 हेक्टेयर भूमि पर वनीकरण किया जाएगा।
-डा. सविता, निदेशक वन अनुसंधान संस्थान