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देवीसौड़-नगुण में अब नहीं लगते बैसाखी के मेले

Sat, 13 Apr 2019 09:18 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sat, 13 Apr 2019 09:18 PM IST
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देवीसौड़-नगुण में अब नहीं लगते बैसाखी के मेले
चिन्यालीसौड़ (उत्तरकाशी)। बैसाखी पर्व पर जहां पहाड़ के विभिन्न गांवों में पारंपरिक मेलों को लेकर ग्रामीणों में खासा उत्साह है, वहीं टिहरी बांध झील में मेला स्थल डूबने के बाद से अब चिन्यालीसौड़ प्रखंड के देवीसौड़, नगुण आदि गांवों में बैसाखी के मेलों की रौनक खो गई है। झील में डूबे मेला स्थल एवं पौराणिक मंदिरों की पुनर्स्थापना की सुध नहीं लिए जाने से ग्रामीणों में टीएचडीसी के प्रति रोष है।
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बैसाखी पर्व का विशेष महत्व है। खेतों में फसलें तैयार होने के दौरान मेलों में ग्रामीण बड़े उत्साह के साथ प्रतिभाग करते हैं। अपने आराध्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर अच्छी फसल की कामना करते हैं। कभी चिन्यालीसौड़ प्रखंड के देवीसौड़, नगुण आदि स्थानों पर बैसाखी के भव्य मेलों का आयोजन किया जाता था। क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति की पहचान और परंपराओं के संवाहक होने के साथ ही यह मेले ग्रामीणों की वर्ष भर की जरूरत के सामान की खरीद का प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। बैसाखी अब भी हर साल आती है, लेकिन अब यहां मेले नहीं लग पाते।
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वर्ष 2006 में टिहरी बांध परियोजना की झील का विस्तार चिन्यालीसौड़ तक होने से छाम तरासौड़, नगुण, देवीसौड़ एवं बड़ेथी हिटारा के मेला स्थल झील में समा गए। इनके साथ ही मणी छाम से लेकर हिटारा बड़ेथी तक के नागराजा, भैरव एवं कृष्ण भगवान के करीब एक दर्जन छोटे-बड़े मंदिर भी झील में डूब गए। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि परियोजना की विस्थापन नीति के तहत पारंपरिक मेला स्थल एवं मंदिरों की भी अन्यत्र व्यवस्था की जाएगी, लेकिन निर्माण के बाद 13 साल में करोड़ों का मुनाफा कमाने के बावजूद परियोजना प्रबंधन ने इसकी सुध नहीं ली।
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मेलों के लिए गांव लौटते थे प्रवासी
देवीसौड़ बैसाखी मेले के आयोजक घनश्याम नौटियाल, प्रधान नत्थी नौटियाल, भाग्यानदास, नगुण मेले के आयोजक बलवीर बिष्ट, कुलवीर बिष्ट, पूर्ण सिंह आदि का कहना है कि बैसाखी के मेले हमारी समृद्ध संस्कृति की पहचान और परंपराओं के संवाहक थे। बाहरी क्षेत्रों में गए गांवों के लोग भी इन मेलों के लिए गांव लौटते थे। टिहरी बांध ने हमारी संस्कृति और परंपराओं को दफन करने का काम किया है, जबकि करोड़ों का मुनाफा कमा रही परियोजना के लाभांश से मेला स्थल एवं प्राचीन मंदिरों का पुनर्निर्माण कराकर हमारी परंपराओं को पुनर्जीवित एवं संरक्षित किया जा सकता है।
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