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भयानक मंजर: लोगों ने खुद बहा दी अपनों की लाशें
प्रवेश कुमारी
Updated Wed, 26 Jun 2013 12:43 AM IST
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वो भयानक मंजर आंखों से ओझल नहीं होता। जिंदगी बचाने के लिए गणेशचट्टी में बारिश के बीच एक टी स्टाल में शरण ली थी। चारों तरफ रूदन-ही-रूदन, लाशें ही लाशें थीं।
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आंसुओं के सैलाब के बीच कुछ परिजन अपने जिगर के टुकड़ों की लाशें नदी में धकेलने लगे थे, मानो अपनी जिंदगी पर उन्हें ऐतबार न हो। दिल के टुकड़ों को मोक्षदायिनी के सुपुर्द कर शायद मुक्ति दिलाना चाहते थे।
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यह हृदयविदारक यादें हैं यशोदा चंदोला की, जो सात दिन गणेश चट्टी में फंसे रहने के बाद सेना की मदद से पहले ऊखीमठ और फिर दून पहुंचीं।
बकौल यशोदा केदार घाटी में हुए तबाही के मंजर देख रूह कांप रही थी। अचानक जगह-जगह फूट गए झरनों ने सांस अटका दीं। एक तरफ भयानक बारिश और दूसरी तरफ झरनों की लगातार बढ़ रही संख्या।
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ऊपर से चलने से बेहद मजबूर ननद और 70 साल की सास का साथ। सभी तरफ से संपर्क कट चुका था। यह भी नहीं पता था कि वापस आएंगे भी कि नहीं। लेकिन 22 जून को पहुंची सेना की सहायता ने जिंदगी बचा ली।
यशोदा 13 जून को केदारनाथ धाम के रवाना हुई थीं। 14 जून को तिलवाड़ा में विश्राम कर आगे बढ़ी थीं। 15 जून को पूजा का समय निकलने की वजह से सायंकालीन आरती में हिस्सा लिया था। 16 जून को सुबह सात बजे मंदिर में जाकर वापस लौटना शुरू किया था। आपदा की खबर मिली तो पालकी वाले भी छोड़ भागे।
जहां ज्यादातर नेपालियों के लूट-पाट करने की खबर आ रही थी, वहीं गणेशचट्टी में चाय की दुकान चलाने वाले लगभग 55 वर्षीय राम बहादुर ने घोड़ों के चने के सहारे कई जान बचाईं।
बकौल यशोदा हमारे पास बिस्कुट, ब्रेड खत्म हो चुके थे। इन चनों का ही सहारा था। राम बहादुर ने दो कट्टे खोल दिए थे, लेकिन सख्त हिदायत भी दी कि एक मुट्ठी से ज्यादा न लें।