बड़ा सवालः आखिर कौन लगा रहा उत्तराखंड के जंगलों में आग?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वैसे तो उत्तराखंड के जंगल हर साल गर्मियों में आग से धधक उठते हैं, लेकिन इस साल यह आग पहाड़ के लोगों और वन्यजीवों पर कहर बरपा रही है। यह आग लगातार बढ़ रही है।
सेना, वायुसेना, एनडीआरएफ व एसडीआरएफ आग बुझाने में लगी है। लेकिन इस सबके के पीछे यह जानना जरूरी है कि हमारी वन संपदा को कौन खाक कर रहा है। कहीं इसके लिए मानव को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है तो कहीं प्राकृतिक घटनाओं को।
सोशल मीडिया पर जंगलों में दहक रही इस आग के लिए लकड़ी माफियाओं को जिम्मेदार बताया जा रहा है। क्योंकि हर साल वन विभाग द्वारा गिरे या सूखे पेड़ की नीलामी की जाती है। आग लगाने से बड़ी संख्या में वन संपदा को नुकसान पहुंचता है और वन माफिया को इससे फायदा होता है। वहीं समाजशास्त्री और पर्यावरणविदों का कहना है कि शीतकालीन बर्षा न होने से जमीन में नमी नहीं है इस कारण जंगलों में आग लग रही है।
इस बारे में पहाड़ से हो रहे पलायन पर काम कर रहे पर्यावरणविद् अनिल जोशी का कहना है कि उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने का कारण इंसानों का मानना गलत है। वह सालों से जंगलों के बीच रह रहे हैं। उन्हें पता है कि जंगलों की कैसे नुकसान होगा और कैसे नहीं।
यह सही है कि पहाड़ी इलाकों में जंगलों में गिरी पत्तियों को जलाने के लिए आग लगाई जाती है, लेकिन यह आग लोग नियंत्रित रूप से लगाते हैं। उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग के लिए वहां रह रहे लोगों की जिम्मेदार मानना गलत है। वन विभाग को पहले से ही ऐसी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए था। अब जब स्थिति विभाग के हाथ से बाहर है तो वह वहां रह रहे लोगों पर आरोप लगा रहे हैं।
विंटर रेन न होने से जमीन में नहीं है नमी
अनिल जोशी के मुताबिक, राज्य के जंगलों में लगी आग के मुख्य कारण इस साल विंटर रेन न होना है। जिस कारण जमीन में बिल्कुल नमी नहीं है और आग लगातर बढ़ रही है। वहीं इस साल मार्च से गर्मी तेज पड़ रही है। जिससे जंगलों में पतझड़ ज्यादा हो गया है। यह जल्दी आग पकड़ता है।
पर्यावरणविद् अनिल जोशी के मुताबिक वन संपदा को आग से बचाने के लिए पुराने तरीकों को ढ़ूंढना होगा, जिसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी अहम है। पहले जंगलों में फायर लाइन बनाई जाती थी, जिससे आग जंगल में नहीं फैलती थी। स्थानीय लोगों द्वारा सूखी लड़की और पत्तों को हटा दिया जाता था।
इससे गर्मी के मौसम में जंगलों में आग फैलने का डर नहीं रहता था। इसके साथ ही वन कानून को भी चुनौती देने की जरूरत है। वन विभाग द्वारा वन कानून पर समीक्षा की जानी चाहिए ताकि भविष्य में फिर ऐसी स्थिति न हो। जंगल की पत्तियां हाटाकर उनसे रोजगार उत्पन्न करना चाहिए। इनको एकत्र करवा कर खाद बनानी चाहिए।
उत्तराखंड के जंगल आग से धधक रहे हैं। आग से हजारों हैक्टेयर वन क्षेत्र खाक हो गया। जंगलों में आग दो तरह से लगती है। एक तो प्राकृतिक रूप से और दूसरा इंसानों के द्वारा। जंगल में ज्यादातर आग की घटनाएं गर्मी के मौसम में सामने आती हैं। प्राकृतिक रूप से जंगलों में आग लगने का एक बड़ा कारण आसमानी बिजली है, जिसके कारण आग सूखे पत्तों और झाड़ियों से होती हुई पूरे जंगल को चपेट में ले लेती है।
सूखे पत्ते और सूखी लकड़ियां खुद पकड़ लेती हैं आग
एक आंकड़े के मुताबिक धरती पर हर सेकेंड में औसतन सौ बार आसमानी बिजली गिरती है। और पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका में जंगलों में आग लगने का सबसे बड़ा कारण है। इसके साथ ही ज्यादातर आसमानी बिजली गिरने की घटनाएं उत्तरी अमेरिका के दक्षिण पूर्व और दक्षिण-पश्चिम में होते हैं।
इसके साथ गर्मी बढ़ जाने से जंगल में पड़े सूखे पत्ते और जमीन पड़ी सूखी लकड़ियां खुद ही आग पकड़ लेती हैं। यह घरों में ईंधन के रूप में प्रयोग में लाई जाती है, जिससे इनमें आसानी से आग लग जाती है। जंगलों में अधिकतर आग मौसम और हवा के बहाव की गति से लगती है। हवा में ऑक्सिजन होती है जो आग लगने के सबसे बड़ा कारण है।
जंगलों में लगने वाली आग के पीछे ज्यादातर इंसान ही होते हैं। जंगल में आग लगने के मानवीय कारण बहुत से हैं। जैसे- जंगल से गुजर रहे लोगों ने खाना पकाने के लिए आग जलाई और उसे सही से बुझाना भूल गए तो वह आग हवा के कारण पूरे जंगल में फैल जाती है।
मानवों द्वारा जंगलों में आग लगने की घटना ज्यादातर सावधानी न बरतने के कारण होती हैं। जंगल से गुजरते लोगों बीड़ी सिगरेट पीकर वहीं फेंक देते हैं जो बाद में पूरे जंगल को खाक कर देती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जान बूझकर जंगलों में आग लगाते हैं।