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यात्रियों से लूटपाट, ठगी से आहत हैं उत्तराखंडी

Wed, 26 Jun 2013 12:43 AM IST
देहरादून/नई दिल्ली/ब्यूरो
देहरादून/नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Wed, 26 Jun 2013 12:43 AM IST
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uttarakhand floods travelers looting hurt uttrakhandi

उत्तराखंड की आपदा के बीच मुसीबत में घिरे यात्रियों के साथ हो रही लूटपाट और ठगी से दिल्ली समेत एनसीआर में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडी बेहद आहत हैं।

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इनका मानना है कि यदि इन घटनाओं में पहाड़ी लोगों का हाथ है तो यह निंदनीय है, लेकिन वे यह भी दलील देते हैं कि पहाड़ के लोग मुसीबत में फंसे लोगों के साथ दुर्व्यवहार नहीं कर सकते हैं।
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इधर, इस त्रासदी को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग पर प्रवासी संगठनों ने बुधवार को जंतर-मंतर पर धरना देने का ऐलान किया है। प्रवासियों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं में बांग्लादेशी और नेपालियों का हाथ हो सकता है।
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वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल कहते हैं कि देश के किसी भी क्षेत्र में जब भी विपत्ति आती है तो खाद्य सामग्री महंगी होना आम बात है, लेकिन उत्तराखंड में ज्यादातर व्यापार तो बाहरी लोगों के हाथ में है। इसलिए जो 500 रुपये में बिस्कुट बेचने की खबरें आ रही हैं, उसमें इन्हीं बाहरी लोगों का हाथ हो सकता है।

नौटियाल कहते हैं उत्तराखंडी जीवन दर्शन लूटपाट का नहीं है। वहां बसे नेपाली और घुसपैठी बांग्लादेशियों को बाहर निकालने की जरूरत है।

पढ़ें: मैं ‘पहाड़’ हूं, पीड़ा में हूं...

केदार घाटी की त्रासदी पर प्रवासी उत्तराखंडी हाल ही में गढ़वाल भवन में सभा करके इस तरह की घटनाओं की पहले ही निंदा कर चुके हैं।

उत्तराखंड महासभा के संरक्षक हरिपाल रावत कहते हैं कि यह उत्तराखंड को बदनाम करने की साजिश है। गांवों के लोग जो मदद कर रहे हैं, उनसे अखबारों के पन्ने रंगे हैं।

अब बदरीनाथ धाम के पैसे को ले जाते हुए जो साधु पकड़े गए हैं वे पहाड़ी नहीं हैं। तीर्थ यात्रियों के नाम पर वहां असामाजिक तत्व भी जाते रहे हैं। प्रदेश सरकार को दोषी लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।


प्रवासी मानते हैं कि बदलते समाज के साथ उत्तराखंडी समाज भी बदला है, लेकिन वे इतने भी नहीं बदल गए हैं कि मृतकों के जेवर लूटने लगें। इसलिए मीडिया को भी सुनी-सुनाई बातों को प्रचारित करने की बजाए जांच के बाद इस तरह की संवेदनशील कोई खबर दिखानी चाहिए।

उत्तराखंड जनमोर्चा के संरक्षक जगदीश नेगी तो यहां तक कहते हैं कि चार धाम यात्रा में बुजुर्ग लोगों के जाने का प्रावधान है, लेकिन मैदानों से लोक हनीमून बनाने तक चले जा रहे हैं, कम से कम तीर्थयात्रा की पवित्रता तो बनाई रखी जानी चाहिए।

प्रदेश सरकार को अब वहां जाने वाले सभी यात्रियों का पंजीकरण कराना चाहिए।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय में मीडिया सलाहकार सुरेश रावत कहते हैं कि एक-दो घटनाओं को आधार बनाकर पूरे समाज को बदनाम करना ठीक नहीं हैं।

वहां गांवों के लोगों ने तीर्थयात्रियों की मदद ही की है, जबकि व्यापार में तो बाहरी लोग हैं। वे उत्तराखंड मूल के नहीं हैं। यहां तक कि केदारनाथ क्षेत्र में घोड़े वाले भी सहारनपुर और बिजनौर के हैं।

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