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पूर्वजों के बसाए गांव में नहीं रहना चाहते लोग
वेद विलास उनियाल
Updated Tue, 09 Jul 2013 03:07 PM IST
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उत्तराखंड की पहाड़ियों में जो लोग अब तक अपने घर गांव का मोह पाले हुए थे, वो भी अब पलायन करना चाहते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में टिहरी और पौड़ी से तो पहले भी पलायन होता रहा, लेकिन सीमांत क्षेत्र चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी से भी लोगों ने भी अब अपने और पूर्वजों के बसाए गांव को आखिरी प्रणाम करने का मन बना लिया है।
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1971 में विरही ताल टूटने और समय-समय पर युद्ध की विभीषिकाओं से भी जिन लोगों का हौसला नहीं टूटा था, वो अब पूरी तरह टूट गए हैं। अब गांवों में असुरक्षा और जीवन यापन के गहरे संकट को देखते हुए वह किसी भी तरह पहाड़ों से निकलना चाहते हैं। वह यही चाहते हैं कि पहले किसी भी तरह मैदानी इलाकों में जाकर बस जाएं।
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बड़े पैमाने पर पलायन कभी नहीं हुआ
उत्तराखंड में लोग रह-रह कर तो पलायन करते रहे हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर एक साथ पलायन कभी नहीं हुआ। इनमें भी सीमांत चमोली, रुद्रप्रयाग के लोगों ने पलायन में बहुत रुचि नहीं दिखाई। लेकिन इन दोनों जिलों के करीब दो हजार गांवों में अब यही सवाल खड़ा हुआ है कि आखिर इन गांवों में हम रहकर क्या करेंगे।
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इन गांवों में भी लगभग पांच सौ गांव तो बेहद संवेदनशील हैं। उनके विस्थापन को लेकर बार बार बात होती रही है, फि र सब फाइलों में ही दब कर रह गई है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता जगत सिंह चौधरी जंगली का कहना है कि अब गांवों में रहने के बारे में कोई नहीं सोच रहा है।
उत्तराखंड राज्य का निर्माण बिना किसी योजना के हुआ है। लोगों ने बहुत संयम के साथ अपने को गांव में बनाए रखा। लेकिन अब उनका गांव में बने रहना बहुत मुश्किल हैं। नीचे नदी बह रही है और ऊपर वन विभाग की नीतियां लोगों के लिए अड़चन पैदा कर रही है। साथ में बार-बार आती प्राकृतिक आपदाओं ने लोगों को बुरी तरह डरा दिया है। अब कोई गांवों में बसने के बारे में नहीं सोच रहा।
खतरनाक स्थितियों से जूझते रहे
उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाएं आती रही हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाएं बड़े पैमाने पर पलायन का कारण नहीं बनी। रोजगार की कमी पलायन की बड़ी वजह बनी। जबकि पहाड़ों की प्राकृतिक आपदाओं की चुनौती का सामना वे अपने ढंग से करते रहे। आज की तरह तमाम साधन न होने पर भी वह खतरनाक स्थितियों में भी जूझते रहे।
विरही बाढ़, उत्तरकाशी का भूकंप और वरुणावत जैसी आपदाओं के वाबजूद लोगों ने घर-गांव नहीं छोड़े। यहां तक कि भूकंप में उत्तरकाशी के डिडसारी में कई लोगों के मारे जाने पर गांव के लोग एक विस्थापित गांव में तो रहने लगे। लेकिन बाद में फिर अपने गांव लौट गए और उजडे़ घरों को फिर से बनाकर रहने लगे। लेकिन डिडसारी के लोग अब हमेशा के लिए गांव छोड़ना चाहते हैं।
अब पलायन की जरूरत है
इसी तरह केदारघाटी में गौरीगांव, सेमी, विजय नगर, सुमाड़ी बाजार, चाका और सिल्ली के लोग अब गांव छोड़ना चाहते हैं। सेमी और गौरीगांव में तो जमीन धंस रही है। कई गांवों को मंदाकिनी ने उजाड़ बना दिया है। पर्यावरणविद महावीर सिंह का कहना है कि पहले पहाड़ों में पलायन को बुरा मानते थे। कोई मजबूरी में ही पलायन करता था। लेकिन अब तो इसकी जरूरत है।
बिना पलायन किए लोगों का जीना मुश्किल हो जाएगा। पलायन आसान नहीं है, लेकिन इसके सिवा कोई चारा भी नहीं है।
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