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जानिए, उत्तराखंड में क्यों मची इतनी बड़ी तबाही?

Sat, 22 Jun 2013 10:28 AM IST
विजय गुप्ता
विजय गुप्ता Updated Sat, 22 Jun 2013 10:28 AM IST
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uttarakhand disaster due to silt in rivers

आजादी के छह दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी नदियों की सफाई और उसकी तलहटी में जमी गाद की निकासी का कोई तंत्र विकसित न होना ही बाढ़ की विनाश लीला का बड़ा कारण बन गया है।

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वैज्ञानिकों का मानना है कि पहाड़ से लेकर मैदान में बहने वाली नदियों में भरी गाद ने उनकी गहरायी को समाप्त कर दिया है।

तस्वीरों में: तबाही के बाद राहत का इंतजार
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इसके चलते जैसे ही इन नदियों में मानसून या दूसरे कारणों से पानी बढ़ता है, ये उफनाने लगती हैं और आस पास के क्षेत्रों में तबाही का कारण बन जाती है।

उत्तराखंड तबाही की संपूर्ण कवरेज देखने के लिए क्लिक करें
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केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक नदियों की सफाई के नाम पर सिर्फ उसमें आकर मिलने वाले नालों के पानी का ट्रीटमेंट और दूसरे कार्यों तक सीमित रहता है। जबकि जरूरत नदियों में बरसों से जमा हो रही गाद को निकालने की है।

इसके लिए अभी तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं की गई है। अगर नदियों की गाद निकालने की योजना बनायी भी जाए तो उसका निस्तारण कहां किया जाए, इसकी व्यवस्था भी नहीं है।

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समस्या यही है कि गाद को कहां फेंका जाए। नदियों के किनारे उस गाद को इकट्ठा नहीं किया जा सकता क्योंकि अगली बरसात में वह फिर से नदी की तलहटी में आ जाएगा।


तस्वीरों में: आसमान से बरसी आफत

मंत्रालय का कहना है कि समुद्र की तलहटी में जमे गाद को निकालने के लिए तंत्र पहले से ही विकसित है क्योंकि उससे निकलने वाले मलबे को दूर-दराज समुद्र में फिर से डाला जा सकता है। मगर नदियों के मामले में ऐसा संभव नहीं है। इस गंदगी का कहीं पर भी उपयोग नहीं किया जा सकता है।

माना जा रहा है कि शहरों की गंदगी को नदियों में डालने के कारण यदि सफाई की जाएगी तो उसमें मिट्टी की जगह कीचड़ ही निकलेगा। उस कीचड़ को जमीन की भराई के काम में भी नहीं लाया जा सकता।

देखें, उत्तराखंड तबाही की दुर्लभ तस्वीरें

मंत्रालय के अनुसार राज्य स्तर पर नदियों की साफ-सफाई का जो कार्यक्रम चलाया जाता है। वह सिर्फ पानी की शुद्धता तक ही सीमित है। उसकी तलहटी में जमी मिट्टी या कीचड़ निकालने की कोई योजना नहीं बनायी जाती।

चूंकि पानी राज्यों का विषय है, इसलिए इसकी पहल भी राज्यों को ही करनी होगी। राज्य अगर इस तरह की किसी योजना का प्रारूप बनाते हैं तो केंद्र उस पर विचार अवश्य करेगा।

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