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वो केदारनाथ गया, लेकिन लौट कर नहीं आया
देवेंद्र बर्त्वाल/राजा तिवारी
Updated Fri, 05 Jul 2013 10:39 AM IST
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मां-बाप के बिना अकेले रह रहे चार भाई-बहिनों के परिवार में इन दिनों मातम छाया हुआ है। आंगन किनारे खड़े होकर गांव को आने वाले पैदल रास्ते पर टकटकी लगाए 14 वर्ष का पंकज अपने भाई सूरज के आने का इंतजार कर रहा है। दूसरी ओर, घर की देहरी पर बैठी बहन संगीता और हेमा की आंखें अपने भाई के आने के इंतजार में पथरा गई हैं।
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पोखरी के ताली गांव के सूरज कपाट खुलते ही मजदूरी करने केदारनाथ चल गया था, लेकिन लौटकर नहीं आया। घर पर कई दिनों से चूल्हा नहीं जला। गांव के लोग इन असहाय भाई-बहिनों को ढांढस बंधाकर खाना खिला रहे हैं, लेकिन ये तीनों भाई-बहन अपने भाई के दो सप्ताह बाद भी घर न पहुंचने से बुरी तरह टूट गए हैं।
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कैसे चलेगा जीवन
अब उनकी देखरेख कौन करेगा और कैसे उनका जीवन चलेगा। ये सवाल उनके जहन में कौंध रहे हैं। सूरज के पिता 1998 में दो बहनों और भाई की जिम्मेदारी सूरज पर छोड़ चल बसे थे। जबकि पिता से पहले इन बच्चों के सिर से मां का साया उठ गया था। 21 वर्षीय सूरज पर ही बहिन संगीता, हेमा और भाई पंकज की जिम्मेदारी थी।
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सूरज पिछले तीन सालों से यात्राकाल में केदारनाथ जाकर परिवार का भरण-पोषण करता था, लेकिन बाढ़ में सूरज कहीं खो गया। रोते-रोते 14 साल का पंकज बस यही दोहरा रहा है कि ‘भैजीन ब्वेली छौं घौर ओलू त त्वेतें स्कूला कपड़ा, किताब ल्योलू।
बदहवास है बहन
अब हमरु क्या होलू...’ घर की देखभाल करने वाली बड़ी बहन 19 वर्षीय संगीता बदहवास है, उसे कुछ पूछने का प्रयास किया, तो वो आंसू भरी लाल आंखों से एक नजर पूछने वाले को देखती है और फिर जोर-जोर से रोने बिलखने लगती है।
ग्राम प्रधान रविंद्र सिंह ने बताया कि 16 जून को आखिरी बार सूरज से गौरीकुंड में बात हुई थी। जिसके बाद से सूरज का कोई पता नहीं है।
ग्रामीण उसे खोजने के लिए केदारनाथ तक गए, लेकिन उसका अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है।