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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Udham Singh Nagar News ›   Regarding giving respect to Misa prisoners in the state government

मीसा बंदियों को सम्मान देने को लेकर पसोपेश में प्रदेश सरकार

Sun, 13 Aug 2017 10:42 PM IST
आरडी खान काशीपुर।
आरडी खान काशीपुर। Updated Sun, 13 Aug 2017 10:42 PM IST
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आपातकाल में लोकतंत्र बहाली की मांग को लेकर मीसा और डीआईआर के तहत जेलों में रहे आंदोलनकारियों को सम्मानित करने के मुद्दे पर उत्तराखंड सरकार पसोपेश में है। मीसा में जेल गए जनसंघ के स्वयंसेवियों को सम्मानित करने और यूपी व राजस्थान की तर्ज पर मासिक अनुग्रह राशि दिए जाने का प्रस्ताव कैबिनेट में पारित हो चुका है, लेकिन डीआरआई आंदोलनकारियों की मांग के चलते सरकार शासनादेश जारी नहीं कर पा रही है।

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26 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी, जिसका भारतीय जनसंघ और आरएसएस स्वयंसेवकों ने विरोध किया था। आपातकाल का विरोध करने पर जनपद नैनीताल से 200 से अधिक स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी हुई। इनमें से कुछ को आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) और शेष को भारत सुरक्षा अधिनियम (डीआईआर) के तहत गिरफ्तार किया गया। मीसा में गिरफ्तार हुए आंदोलनकारियों को आपातकाल खत्म होने के बाद ही रिहा किया जा सका, जबकि डीआईआर के तहत गिरफ्तार स्वयंसेवकों को तीन से छह माह की अवधि में जमानत मिली।
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राजस्थान, मध्य प्रदेश और यूपी की सरकारें मीसा बंदियों को लोकतंत्र प्रहरी का सम्मान देते हुए 16 हजार रुपये मासिक अनुग्रह राशि दे रही हैं। उत्तराखंड में 2010 में तत्कालीन सीएम डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने इस बारे में पहल की थी, परंतु यह संभव नहीं हो सका। एक जून 2017 को उत्तराखंड कैबिनेट की बैठक में मीसा बंदियों को यूपी, एमपी और राजस्थान की तर्ज पर सम्मानित किए जाने का प्रस्ताव पारित हो चुका है, लेकिन इसी के साथ डीआईआर के तहत जेलों की यातनाएं काट चुके आंदोलनकारियों ने सरकार के समक्ष आपातकाल के सभी बंदियों को सम्मानित किए जाने की मांग उठा दी। उत्तराखंड में मीसा के तहत बंद हुए 22 आंदोलनकारी जीवित हैं।
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ऊधमसिंह नगर में एकमात्र मीसा बंदी बाजपुर के योगराज पासी हैं, जबकि डीआईआर के तहत जेल गए बंदियों की संख्या सैकड़ों में है। उनके प्रत्यावेदन पर भी सरकार विचार कर रही है। डीआईआर में पंजीकृतक केशव कुमार अग्रवाल का कहना है कि उनके द्वारा समान रूप से आपातकाल का विरोध किया गया। आंदोलनकारियों को मीसा अथवा डीआईआर में जेल भेजने का निर्णय सरकार का था। दोनों ही तरह के बंदियों को समान यातनाएं दी गई। ऐसे में आंदोलनकारियों का विभाजन करना न्यायसंगत नहीं है।

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