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Uttarakhand: कागज की कॉपी नहीं बनी ढाल, कोर्ट ने ठुकराई अपील; निचली अदालत का फैसला बरकरार

Tue, 28 Jul 2026 12:03 PM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, रुद्रपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रुद्रपुर Published by: Heera Updated Tue, 28 Jul 2026 12:03 PM IST
सार

जसपुर के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं निवेश स्कीम विवाद में तृतीय अपर जिला न्यायाधीश मुकेश चंद्र आर्य की अदालत ने सिविल अपील खारिज कर दी। 

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Court dismisses appeal in Jaspur electronics dispute
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

 

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जसपुर के चर्चित इलेक्ट्रॉनिक्स एवं निवेश स्कीम विवाद में तृतीय अपर जिला न्यायाधीश मुकेश चंद्र आर्य की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सिविल अपील खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल समझौतेनामे की फोटोकॉपी के आधार पर किसी व्यक्ति को देनदारी से मुक्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस आधार पर निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

मामले में जसपुर निवासी नईम खान ने दावा किया था कि वर्ष 2013-14 में उसने शहजाद खान और मोहम्मद हासिम के साथ मिलकर शाइन स्टार इलेक्ट्रो वर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड और स्टार इलेक्ट्रॉनिक्स के नाम से इलेक्ट्रॉनिक्स निवेश योजनाएं संचालित की थीं। इन योजनाओं के तहत लोगों से दैनिक और मासिक किस्तें जमा कराकर घरेलू सामान उपलब्ध कराया जाता था तथा प्रत्येक माह ड्रॉ भी निकाला जाता था। वादी के अनुसार तीनों की कारोबार में बराबर की हिस्सेदारी थी।

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अदालत ने कहा कि जिस समझौतेनामे के आधार पर वादी स्वयं को देनदारी से मुक्त बता रहा था उसका मूल दस्तावेज पेश नहीं किया गया। अदालत के समक्ष केवल उसकी फोटोकॉपी दाखिल की गई और मूल दस्तावेज प्रस्तुत न करने का कोई संतोषजनक कारण भी नहीं बताया गया। इसके अलावा कथित हिसाब-किताब का भी कोई विश्वसनीय रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) जसपुर द्वारा 31 मई 2024 को दिए गए निर्णय को सही ठहराते हुए अपील निरस्त कर दी। साथ ही आदेश दिया कि मुकदमे का खर्च दोनों पक्ष स्वयं वहन करेंगे।

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लिखित समझौते का तर्क काम नहीं आया
निचली अदालत के फैसले को चुनाैती देते हुए अपीलकर्ता नईम खान का कहना था कि 30 जून 2015 को तीनों के बीच पूरा हिसाब-किताब हो गया था। लिखित समझौते के तहत आगे की सभी देनदारियां शहजाद खान ने अपने जिम्मे ले ली थीं। बाद में जमाकर्ताओं द्वारा धन वापसी का दबाव बनाए जाने पर उसने अदालत से यह घोषणा कराने की मांग की कि उक्त तिथि के बाद उसका स्कीम से कोई संबंध नहीं है और भुगतान की जिम्मेदारी प्रतिवादियों की है।

साझेदारी का दावा भी नहीं टिका
सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने अदालत को बताया कि वे फर्म के साझेदार नहीं बल्कि कर्मचारी थे और उनसे सादे स्टांप पेपरों पर हस्ताक्षर कराए गए थे। रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए अदालत ने पाया कि वादी स्वयं साझेदारी का दावा कर रहा है जबकि संबंधित फर्म पंजीकृत नहीं थी। ऐसे में भारतीय भागीदारी अधिनियम 1932 की धारा-69 के तहत इस प्रकार का वाद विधिसम्मत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि गैर-पंजीकृत साझेदारी फर्म से जुड़े विवाद में किया गया दावा कानून के तहत स्वीकार्य नहीं है।

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