{"_id":"4debff2df23310f1bebb861898ad7d2b","slug":"traders-fought-against-the-british-government","type":"story","status":"publish","title_hn":"...दुकानों के बाहर सैनिक, रेडियो पर लग गई पाबंदी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
...दुकानों के बाहर सैनिक, रेडियो पर लग गई पाबंदी
लैंसडॉन/कुलदीप खंडेलवाल
Updated Wed, 14 Aug 2013 07:45 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तराखंड में आज के गढ़वाल राइफल के मुख्यालय लैंसडॉन में कभी अंग्रेजी हुकूमत का दमन और भारतीयों का विरोध परस्पर इस कदर समानांतर चलता रहा कि ब्रिटिश हुकूमत को दुकानों के बाहर सैनिकों का पहरा तक लगाना पड़ा था।
विज्ञापन
अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ हर दिन तेज होते आंदोलन ने अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था। ब्रिटिश अधिकारी हर तरह से दमनात्मक कार्रवाई पर उतारु थे, लेकिन आजादी के मतवालों का हौसला भी बदस्तूर हुकूमत के दमन पर भारी पड़ा।
विज्ञापन
आजादी के दीवानों का ऐसा हश्र ...
विज्ञापन
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ व्यापारी हुए लामबंद
गढ़वाल के इस छोटे से हिल स्टेशन लैंसडॉन में पूरे देश की ही तरह व्यापारियों में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश भरा हुआ था। व्यापारी चूंकि हर गांव के व्यक्तियों तक सीधी पंहुच रखते थे, इसलिए अपनी जिम्मेदारी भी बखूबी जानते थे।
व्यापारियों के लामबंद होने पर अंग्रेजों ने अपने सभी सैनिकों को यह फरमान सुनाया कि कोई भी सैनिक स्थानीय व्यापारियों से सामान नहीं खरीदेगा। यहां तक कि दुकानों के बाहर गोरखा सैनिकों को हुक्म की तामील करवाने के लिए तैनात तक कर दिया गया था।
पुस्तक के प्रचार प्रसार पर लगी रोक
अंग्रेजी हुकूमत की बेड़ियों से मुक्त होने की लिए लोगों में इस कदर छटपटाहट थी कि प्रतिबंध के बावजूद हर रोज कानून तोड़े जाते रहे। इसी दौरान पंडित सुंदरलाल की पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आग में घी डालने का काम किया। इस पुस्तक के प्रचार प्रसार पर अंग्रेजी हुकूमत ने रोक लगा दी थी।
आंदोलनकारियों ने इस पुस्तक के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा को दी जिन्हें उन्होंने बड़ी चालकी से अंग्रेजो की आंखों में धूल झोंककर पूरा भी किया। अंग्रेजों ने लैंसडौन में उनकी दुकान पर छापा मारा, लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी।
पहले ही छिपा दी पुस्तकें
शर्मा को अंग्रेजों के कारनामे की भनक लगते ही उन्होंने सभी पुस्तकों को पहले ही छिपा दिया था। पुस्तक का खूब प्रचार प्रसार हुआ और इससे लोगों में देश प्रेम की भावना तेज हुई।
तिरंगा फहराने पर दंडात्मक कार्रवाई की घोषणा के बाद छह दुकानदारों ने तिरंगा फहरा दिया। अंग्रेजों ने इन दुकानों से सैनिकों को सामान खरीदने पर प्रतिबंध लगा दिया। दुकानों के बाहर सैनिक तैनात कर दिए गए। प्रतिबंधित दुकानों में टेकचंद, लक्ष्मीनारायण शर्मा, नानूमल, रोधबल्लभ जोशी, रूपचंद्र वर्मा, कन्हैयालाल खंडेलवाल शामिल थे।
रेडियो सुनने को लगता था मजमा
ब्रिटिश हुकूमत की हकीकत जानने के लिए रूपचंद्र वर्मा, कन्हैयालाल खंडेलवाल, लक्ष्मीनारायण शर्मा की दुकानों पर ‘रेडियो वर्मा’ सुनने के लिए लोगों का मजमा लगा रहता था। कई बार भीड़ हो हटाने के लिए अंग्रेजों ने लाठियां भी चलाई, लेकिन वे जनता के जज्बे को नहीं तोड़ पाए। लोगों की भीड़ जटती रही।
10 वर्षीय चौथमल भी था आंदोलन में शामिल
इस लड़ाई में बुजुर्ग, युवा और व्यापारी ही शामिल नहीं थे बल्कि तत्कालीन दौर में कमोबेश यही जज्बा बच्चों में भी देखने को मिला। दस वर्षीय चौथमल खंडेलवाल निर्वासित सैनिकों को भोजन पहुंचाने के लिए लगे रहते थे।
चौथमल की सूझबूझ के सभी कायल थे। उनको अंग्रेजों ने 1942 में चौथमल को पकड़कर जेल डाल दिया, लेकिन इस साहसी बच्चे के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई, हां अलबत्ता चौथमल को देश के लिए दिए गए अपने बलिदान पर गर्व जरूर था।