{"_id":"3bfbad47eddd8cbce2afc443674530e3","slug":"temple-valves-are-closed-here-even-navratri","type":"story","status":"publish","title_hn":"यहां नवरात्र में बंद रहते हैं मां के कपाट!","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यहां नवरात्र में बंद रहते हैं मां के कपाट!
संजू पंत/अमर उजाला, डीडीहाट
Updated Fri, 11 Oct 2013 11:35 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा के लिए मंदिरों में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। लेकिन उत्तराखंड के डीडीहाट शहर में एक देवालय ऐसा भी है, जहां नवरात्र में पूजा नहीं होती और न ही मंदिर के द्वार ही खुलते हैं।
विज्ञापन
मंदिर के कपाट पर ताला लटका रहता है। साल में माघ, सावन, बैशाख और कार्तिक की पूर्णमासी के दिन ही मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और बस इन्हीं दिनों में यहां पूजा होती है।
विज्ञापन
पढें, फिर उड़ी निरीह पशुओं की गर्दन, आधी रात में दी बलि
विज्ञापन
डीडीहाट से करीब चार किमी की पैदल दूरी पर स्थित आकोट गांव में मां भगवती का मंदिर है। बताते हैं कि आकोट में देवी सती के सिर का भाग गिरा था।
मंदिर और मूर्ति की जानकारी दी
अल्मोड़ा के चंद राजा नागीमल्ल को मां भगवती ने सपने में दर्शन देकर मंदिर और मूर्ति की जानकारी दी थी। देवी मां ने बांज के पेड़ के खोखले भाग में मूर्ति होने की बात बताई। राजा ने आकोट पहुंचकर पत्थर से निर्मित मूर्ति को निकालकर उसी जगह पर वर्ष 1631 में मंदिर बनवाया।
पढें, केदारनाथ में बर्फबारी के साथ बारिश जारी, बढ़ी मुश्किलें
गंगोलीहाट के पंत समाज के लोगों को मंदिर की पूजा-अर्चना का जिम्मा सौंपा गया। बाद में सिगाली के ओझा परिवार के लोग मुख्य पुजारी हो गए। मौजूदा पुजारी महेश चंद्र जोशी बताते हैं कि यह मंदिर साल में सिर्फ चार दिन (माघ, सावन, बैशाख और कार्तिक की पूर्णमासी को) खुलता है।
नवरात्रों में भी पूजा-अर्चना नहीं
इसी दौरान यहां पूजा-अर्चना होती है। यहां तक कि ग्रीष्म और शरद ऋतु में होने वाले नवरात्रों में भी पूजा-अर्चना तो दूर मंदिर के कपाट भी नहीं खुलते।
पढें, हैवानियतः यज्ञ के बहाने ज्योतिषियों ने किया गैंगरेप
मंदिर के गर्भगृह में भी पर्दा रहता है। भक्तगणों को मूर्ति के भी दर्शन नहीं होते। पूजा गर्भगृह के बाहर से ही होती है। आकोट के पूर्व ग्राम प्रधान डिगर सिंह खड़ायत कहते हैं कि सती के सिर का हिस्सा यहां गिरने से मूर्ति के दर्शन नहीं करने की परंपरा रही है।
सती के सिर का हिस्सा होने के कारण मुख्य पुजारी भी बंद कमरे के भीतर ही पर्दे से बंद मूर्ति की पूजा करते हैं। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष ध्यान सिंह खड़ायत कहते हैं कि नवरात्र में इस मंदिर को नहीं खोलने की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है।
पढें, बदरीनाथ धाम में बढ़ी ठंड, ठिठके यात्री
पुरोहितों के दूर होने से नहीं होती पूजा!
आकोट के भगवती मंदिर में सालभर में सिर्फ चार दिन ही पूजा क्यों होती है? इसकी वजह के बारे में किसी को ठीक-ठीक नहीं पता है। लेकिन पूजा नहीं किया जाना यहां परंपरा में शुमार बताया जाता है।
पुजारी महेश जोशी का कहना है कि गंगोलीहाट के लोगों को गंगोलीहाट के मंदिरों के अलावा आकोट की पूजा-अर्चना का जिम्मा दिए जाने से यह नौबत आई होगी क्योंकि गंगोलीहाट की आकोट से करीब 130 किमी दूरी थी। अधिक फासले के अलावा रामगंगा नदी को लांघने के लिए पुल भी नहीं था।