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प्रलय का साक्षी... 'मैं रामबाड़ा हूं'
धीरेंद्र नाथ पांडेय
Updated Tue, 02 Jul 2013 03:16 PM IST
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जब मैं केदार घाटी पहुंचा तो वह बर्बाद हो चुका था। जिधर नजर जाए उधर मलबा और लाशें। मंदिर परिक्षेत्र के साथ ही मलबे की ढेर से लेकर पेड़ों की टहनियों तक लाशें ही लाशें। किससे पूछूं और किसकि सुनूं। न लाशें बोलती हैं न बोलता है मलबा। पेड़ भी खामोश थे।
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तभी एहसास हुआ कि यह धरती जहां चंद रोज पहले रामबाड़ा था, सिसक रही है। लगा कोई कह रहा है इस प्रलय का साक्षी मैं रामबाड़ा हूं। मुझे अपनों ने न सिर्फ तबाह कर दिया बल्कि मेरे बच्चों को भी हमेशा के लिए मौत की आगोश में सुला दिया। इस मौत के सैलाब का मैं इकलौता साक्षी हूं। मैं रामबाड़ा हूं।
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बचपन में सुनी हुई काल्पनिक कथाओं से जहां मन भयभीत हुआ वहां भ्रमित भी। बावजूद एहसास हुआ कि इस सन्नाटे में कोई है जो मुझसे कुछ कहना चाहता है। रास्ते में हुई बातें अब सामने आने लगी। जेहन में सवाल उठने लगा जब शनिवार से ही बारिश शुरू हो गई थी तो लोग सतर्क क्यों नहीं हुए?
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सवाल यह भी उठा आखिर यहां इतने लोग फंसे कैसे? यह सोच ही रहा था कि मास्ता गांव की याद आ गई। मास्ता गांव रामबाड़ा से कुछ पहले पड़ता है। यहां एक हेलीकाप्टर कंपनी के लिए टिकट बुकिंग करने वाले ट्रेवल एजेंट विजित झावर से मुलाकात हुई थी।
उसने बताया था कि कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए तीर्थ यात्रियों की यात्रा रुकवा दी। घोड़े खच्चर वालों को हड़ताल करवा कर हेलीपैड पर कब्जा कर लिया। उसकी बातें याद आते ही रामबाड़ा की सिसकियां भी समझ में आने लगी। लगा जैसे रामबाड़ा कह रहा हो नेतागिरी नहीं हुई होती तो न ये यात्री मरते और न ही हमारे वे बेटे जैसे मेरी ही गोद में खेलते कूदते जवान हुए थे।
यही नहीं मेरे तन पर उगे घास को खाकर तंदरुस्त नजर आने वाले घोड़े खच्चर भी हमें आज तन्हा छोड़कर मंदाकिनी में डूबने को बाध्य नहीं होते। मुझे एहसास हुआ कोई कहा रहा है 'मैं अभागा रामबाड़ा हूं'। किससे कहें अपनी विपदा... सब नेतागिरी में लगे हैं।
बरसों से यात्री यहां आते हैं हेलीकाप्टर भी आकाश में गर्जन करते हुए गुजर जाते हैं, लेकिन आज तक किसी को दिक्कत नहीं हुई और जब दिक्कत हुई तो देखा मेरे ही गोद में मेरे ही अपने बेजान होकर हमेशा हमेशा के लिए सो गए। आखिर क्यों हुई यह नेतागिरी?
कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए भोले भाले घोड़े खच्चर वालों को बरगला कर हड़ताल कर दिया। क्योंकि वह चाहते थे ठीक उसी तरह हेलीपैड पर कब्जा जमाना जैसे उन्होंने घोड़े खच्चर वालों पर कब्जा जमा रखा है।
मैं वही रामबाड़ा हूं जिसके आंखों के सामने यह तबाही मची। घोड़े खच्चर वालों की हड़ताल की वजह से जगह जगह यात्री फंस गए। जहां हर दो-तीन मिनट के अंतराल में उड़ने वाले
हेलीकाप्टरों से एक दिन में हजार से ज्यादा श्रद्धालु आ-जा रहे थे।
वहीं चार दिन तक हेलीकाप्टर नहीं उड़े और शारीरिक रूप से अशक्त और वृद्ध सैकड़ों इधर उधर फंसे रहे। इस बीच
बारिश और बाढ़ का कहर बरपा। लोग जान बचाने को पहाड़ों पर भागे। लेकिन बारिश के साथ आ रहा मलबा कहां उनको छोड़ने वाला था। लोग ऊपर भागते रहे और मलबा अपने चपेट में उन्हें लेता रहा।
कुछ ने समझदारी दिखाने की कोशिश की और पेड़ों पर चढ़ गए। पहाड़ों से चटक कर टूट रहे चट्टान जब पेड़ों से टकराया तो ये वहीं लाशों में तबदील हो गए। जो नीचे फंसे रहे उन्हें नदी अपने आगोश में लेती गई। यह सब मुझे भले ही एक एहसास लग रहा था बावजूद इसकी पीड़ा को मैं समझने की कोशिश कर रहा था।
(मुख्य संवाददाता शेषमणि शुक्ल से बातचीत पर आधारित)