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स्टिंग ऑपरेशन से CM हरीश रावत की छवि को नुकसान

Sun, 27 Mar 2016 02:01 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 27 Mar 2016 02:01 PM IST
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sting operation harmfull for cm harish rawat
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत - फोटो : file photo

शनिवार तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री चमकदार आइना थे। उनकी प्रतिबिंबित छवि में आत्मविश्वास था। अपनों के विरोध को झेलते और विरोधियों से शह-मात के खेल में मशगूल थे।

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अचानक स्टिंग आपरेशन के सामने आते ही इस शीशे में एक खरोंच दिखने लगी। यह तो वक्त बताएगा कि यह खरोंच आने वाले समय में एक दरार बनेगी या शीशा ही चटक जाएगा। इतना साफ है कि स्टिंग का यह डंक प्रदेश की शह और मात की सियासत को नया मोड़ दे चुका है।
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18 मार्च को सदन में कांग्रेस के नौ विधायकों की बगावत के बाद से प्रदेश में जो सियासी ड्रामा शुरू हुआ था, उसमें मुख्यमंत्री हरीश रावत फायदा लेते दिख रहे थे। बागी विधायकों के खिलाफ दल बदल कानून के तहत कार्यवाही की उनकी चाल सटीक बैठ रही थी। इसी चाल का नतीजा था कि भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।
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उधर, राजभवन से 28 मार्च तक सदन में बहुमत साबित करने को कहा गया और इस बीच दल बदल कानून के तहत सात दिन का समय संबंधित पक्ष को देने की अनिवार्यता का कानूनी पेच भी सुलझने जा रहा था। रावत बागी विधायकों और भाजपा को निशाने पर लेने का कोई मौका नहीं चूक रहे थे।

यह लग रहा था कि कुछ अघट न घटा तो सरकार सदन में बहुमत साबित कर ले जाएगी। रावत लगातार आम आदमी से जुड़े होने का दावा कर रहे थे। राजनीति में पाला बदल के खिलाफ ही दल बदल कानून लाया गया था। मतदाता भी इस पाला बदल की राजनीति के पक्ष में नहीं है। ऐसे में सहानुभूति का पूरा दाव हरीश रावत के पक्ष में जाता दिख रहा था।

18 मार्च को विधानसभा में कांग्रेस विधायक राजेंद्र भंडारी और गणेश गोदियाल ने भाजपा पर विधायकों की खरीद फरोख्त में लिप्त होने का आरोप लगाया था। कांग्रेस इसी मामले को लेकर भाजपा पर हमलावर रही। शनिवार को सामने आये स्टिंग ने इस हॉर्स ट्रेडिंग का मुंह खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत की ओर मोड़ दिया।


अब अंदरखाने रावत के कट्टर समर्थक भी मान रहे हैं कि इससे मुख्यमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचा है। सामान्य स्थिति में चुनाव होने में अभी आठ माह का वक्त बाकी है। ऐसे में चुनाव में सारा गणित इस सहानुभूति और छवि पर ही निर्भर कर रहा था। जाहिर है कि यह मामला सिर्फ हरीश रावत तक ही सीमित नहीं रह गया है। आगे के सियासी हालात जो भी बने, कांग्रेस के लिए इस शीशे में दिख रही दरार को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।

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