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हरिपुरा और बौर जलाशय में मछलियों की खुली लूट

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 25 Dec 2019 12:00 AM IST
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Fish hunting in Haripura and Baur reservoir
गूलरभोज। हरिपुरा और बौर जलाशय मछली चोरों के लिए मुफीद साबित हो रहे हैं। रोजाना 15 से 20 नावों के जरिए मछलियों का बड़े पैमाने पर शिकार किया जा रहा है। शिकार पर अंकुश लगाने में मत्स्य विभाग लाचार दिख रहा है। इससे सरकार को लाखों के राजस्व की हानि हो रही है।
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दोनों जलाशयों में मछली का ठेका नहीं होने से बड़े पैमाने पर मछली चोरी हो रही है। रोजाना नावों की मदद से क्विंटलों के हिसाब से रोहू, कतला और सौल मछली का शिकार हो रहा है। मत्स्य अभिकरण की ओर से 2013 में आगरा की एएंडएस कंस्ट्रक्शन कंपनी को पांच साल के लिए मछली शिकार का ठेका दिया था। 2018 में ठेका खत्म होने के बाद जलाशय में फ्लोटिंग सोलर पैनल से बिजली उत्पादन के निर्णय के चलते जलाशय में मछली का ठेका नहीं हो सका था। पहले कांटों से अब ट्यूब की मदद से मछली चोरी हो रही थी। तत्कालीन मत्स्य निरीक्षक वीरेंद्र मोहन ने पुलिस से मदद मांगी और वहां पीएसी तैनात हो गई थी। इससे कुछ दिन तो चोरी कम हुई लेकिन अंकुश नहीं लगा। वीरेंद्र के तबादले के बाद फिर से चोर धड़ल्ले से शिकार कर रहे हैं।
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बौर में सात से आठ और हरिपुरा में तो दस से पंद्रह छोटी नावों की मदद से शिकार हो रहा है। चोर रोजाना शाम पांच बजे से नाव के सहारे पानी में अपना-अपना जाल लगाकर चले जाते हैं। अगले दिन सुबह पांच बजे से छह बजे तक जाल में फंसी मछलियों को जमा करने के बाद बेच देते हैं।
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मत्स्य निरीक्षक राजकुमार शर्मा ने कहा कि जलाशयों में मछली चोरी की सूचना लिखित में कई बार पुलिस और मत्स्य विभाग को दी है। उनके पास पर्याप्त साधन और आदमी नहीं है। मछली चोरी रोकने के प्रयास किए जा रहे हैं।
साइबेरियन पक्षियों का भी हो रहा शिकार
गूलरभोज। मछली चोर एक तीर से दो शिकार कर रहे हैं। जाल में फंसी मछली को निकालते समय साइबेरियन पक्षी भी काफी संख्या में इनके हाथ लग रहे हैं। शिकारी इन पक्षियों को 100-150 रुपये प्रति पीस के हिसाब से बेच रहे है। वन विभाग भी इन पक्षियों के शिकार पर रोक लगाने में नाकाम साबित हो रहा है।

पिछले साल ठेके से मिला था 133 लाख का राजस्व
गूलरभोज। बौर जलाशय में ठेका लेने वाली कंपनी ए एंड एस के एमडी बदउल्लाह खान ने बताया कि उनकी कंपनी ने 2013 में 83 लाख रुपये प्रतिवर्ष की दर से ठेका लिया था, जो प्रतिवर्ष दस प्रतिशत की वृद्धि से 30 जून 2018 में 133 लाख रुपये पर समाप्त हुआ था। करीब 11 लाख रुपये प्रतिमाह का राजस्व सरकार को मिल रहा था। बताया कि तीस जून 2018 से ठेका न होने पर सरकार को डेढ़ साल में इसी दर से लगभग दो करोड़ के राजस्व की हानि हो गई होगी।
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