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बिना परीक्षा दिए हुए पास, अब नए साल से आस
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बदहाल सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए बीते वर्ष में कई महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं। गरीब होनहारों के भविष्य सुधारने के लिए शुरू की गई यह योजनाएं आने वाले वर्षों में परिणाम देंगी। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा के लिए कुछ ठोस फैसले हुए हैं। सरकारी इंटर कॉलेजों में पठन पाठन सुधारने के लिए 11 का चयन राजकीय अटल उत्कृष्ट विद्यालयों के लिए किया गया। इसके साथ शहर में एक राजकीय महाविद्यालय भी शुरू हो चुका है।
शिक्षा विभाग की ओर से सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का शैक्षिक स्तर सुधारने के लिए अनेक योजनाओं का तोहफा दिया गया। इनमें सबसे बड़ी सौगात धर्मनगरी में राजकीय डिग्री कॉलेज के रूप में दी गई है। मालूम हो कि शहर में अब तक एक भी सरकारी महाविद्यालय नहीं था। महाविद्यालय के भवन का निर्माण चल रहा है और फिलहाल एक आश्रम में अस्थायी रूप से उसका संचालन शुरू हो चुका है।
इसके अलावा जनपद में 11 इंटर कॉलेजों का चयन अटल उत्कृष्ट विद्यालय के लिए किया गया है। इसका मकसद इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को सीबीएसई बोर्ड के पैटर्न पर पढ़ाना है। इसके अलावा जिले के पांच इंटर कॉलेजों में गणित और विज्ञान की बारीकियों को सिखाने और उसको आसन तरीके से पढ़ाने के लिए स्टेम लैब की स्थापना होनी है। राजकीय इंटर कॉलेज जमालपुर कलां में यह लैब शुरू हो चुकी है। जनपद के 54 स्कूलों में स्मार्ट क्लास शुरू करने के लिए कसरत शुरू कर दी गई है। जो नए साल में शुरू हो जाएंगी। शिक्षा विभाग की यह योजनाएं बच्चों के भविष्य को संवारने में मील का पत्थर साबित होंगी।
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गरीब होनहार पढ़ रहे बोर्डिंग स्कूल में
नीति आयोग की श्रेष्ठा योजना के तहत अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति के 8 छात्र ऊधमसिंह नगर के एक निजी बोर्डिंग स्कूल में कक्षा नौ में पढ़ाई कर रहे हैं। योजना के तहत कक्षा नौ और बारह के लिए सरकारी स्कूलों से 31 छात्रों का चयन किया गया था। इसका सारा खर्चा सरकार उठाती है। बाकी चयनीत छात्रों ने अब तक प्रवेश नहीं लिया है।
जनपद में पौने दो सौ शिक्षकों का टोटा
सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए तमाम प्रयास के बाद भी कुछ कमियां बनी हैं। सबसे बड़ी दिक्कत स्कूलों में मानकों के अनुसार शिक्षकों की तैनाती नहीं होना है। पिछले दिनों सरकारी स्कूलों में 45 नए शिक्षकों की तैनाती के बाद भी प्राथमिक से लेकर इंटर कॉलेजों तक पौने दो सौ शिक्षकों का टोटा है। हाल यह है एक-एक अध्यापक प्रभारी प्रधानाध्यापक का कार्यभार के साथ मिड-डे मील आदि का प्रशासनिक कार्य करने के साथ ही बच्चों को पढ़ा भी रहे हैं।
अभिभावकों और स्कूल संचालकों में होते रहे विवाद
वर्ष 2020 में कोरोना महामारी आई तो किसी को नहीं मालूम था कि ये सिलसिला लंबा चलने वाला है। स्कूल-कॉलेज अनिश्चितकालीन के लिए बंद किए जाने के सरकार के आदेश के बाद शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिला। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प सामने आया। इस विकल्प को छात्रों ने हाथोंहाथ लिया, लेकिन गरीब वर्ग और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र स्मार्टफोन नहीं होने की स्थिति में इस नए विकल्प से महरूम हो गए। वहीं, ऑनलाइन कक्षाएं चलने पर भी पूरी फीस लेने को लेकर और ट्यूशन फीस नहीं देने पर स्कूल से बच्चों के नाम काटने जैसे मामले सामने आए। इसमें अभिभावकों और स्कूल संचालकों के बीच विवाद भी पैदा हुए। लोगों ने स्कूलों पर पहुंचकर धरना-प्रदर्शन किया। ऑनलाइन कक्षाएं चलाने से भले ही छात्रों को नया विकल्प मिला हो, लेकिन इसमें स्कूल संचालकों के साथ ही अभिभावक दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ा।
अब ऑफलाइन कक्षाओं की तरफ रुझान
एक साल से ज्यादा समय तक ऑनलाइन पढ़ने के नकारात्मक परिणाम भी सामने आए। बहुत से बच्चों की आंखों पर असर पड़ा तो बहुत से बच्चे फोन के आदी हो गए। छोटे बच्चों को ऑनलाइन कक्षा में पढ़ाना जहां शिक्षकों के लिए टेढ़ी खीर था तो वहीं अभिभावक भी ऑनलाइन कक्षा से आजिज आ चुके हैं। इसलिए वर्ष 2022 में अभिभावक ऑफलाइन कक्षाएं चलाने के पक्ष में आ गए हैं। वहीं, बच्चे भी घर की चाहरदीवारी से निकलकर खुले मैदान में और दोस्तों के साथ खेलने-कूदने के लिए आतुर हैं।
पहली बार बिना परीक्षा दिए पास हुए छात्र
शिक्षा के क्षेत्र में ये नया अनुभव पहली बार देखने को मिला कि छात्र बिना परीक्षा के पास हो गए। कोरोनाकाल में स्कूल नहीं खोले जाने की स्थिति में सरकार ने पिछले वर्षों के परीक्षा परिणाम को आधार मानकर रिजल्ट घोषित किया। कुछ छात्रों ने इसे हाथोंहाथ लिया तो कुछ ने इसे प्रतिभा के साथ खिलवाड़ बताया। बहुत से बच्चों ने पास होने के बावजूद परीक्षा दी और बेहतर अंक हासिल किए। वहीं, सीबीएसई बोर्ड ने पहली बार परीक्षा को दो टर्म में बांट दिया है।
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शिक्षा विभाग की ओर से सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का शैक्षिक स्तर सुधारने के लिए अनेक योजनाओं का तोहफा दिया गया। इनमें सबसे बड़ी सौगात धर्मनगरी में राजकीय डिग्री कॉलेज के रूप में दी गई है। मालूम हो कि शहर में अब तक एक भी सरकारी महाविद्यालय नहीं था। महाविद्यालय के भवन का निर्माण चल रहा है और फिलहाल एक आश्रम में अस्थायी रूप से उसका संचालन शुरू हो चुका है।
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इसके अलावा जनपद में 11 इंटर कॉलेजों का चयन अटल उत्कृष्ट विद्यालय के लिए किया गया है। इसका मकसद इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को सीबीएसई बोर्ड के पैटर्न पर पढ़ाना है। इसके अलावा जिले के पांच इंटर कॉलेजों में गणित और विज्ञान की बारीकियों को सिखाने और उसको आसन तरीके से पढ़ाने के लिए स्टेम लैब की स्थापना होनी है। राजकीय इंटर कॉलेज जमालपुर कलां में यह लैब शुरू हो चुकी है। जनपद के 54 स्कूलों में स्मार्ट क्लास शुरू करने के लिए कसरत शुरू कर दी गई है। जो नए साल में शुरू हो जाएंगी। शिक्षा विभाग की यह योजनाएं बच्चों के भविष्य को संवारने में मील का पत्थर साबित होंगी।
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गरीब होनहार पढ़ रहे बोर्डिंग स्कूल में
नीति आयोग की श्रेष्ठा योजना के तहत अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति के 8 छात्र ऊधमसिंह नगर के एक निजी बोर्डिंग स्कूल में कक्षा नौ में पढ़ाई कर रहे हैं। योजना के तहत कक्षा नौ और बारह के लिए सरकारी स्कूलों से 31 छात्रों का चयन किया गया था। इसका सारा खर्चा सरकार उठाती है। बाकी चयनीत छात्रों ने अब तक प्रवेश नहीं लिया है।
जनपद में पौने दो सौ शिक्षकों का टोटा
सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए तमाम प्रयास के बाद भी कुछ कमियां बनी हैं। सबसे बड़ी दिक्कत स्कूलों में मानकों के अनुसार शिक्षकों की तैनाती नहीं होना है। पिछले दिनों सरकारी स्कूलों में 45 नए शिक्षकों की तैनाती के बाद भी प्राथमिक से लेकर इंटर कॉलेजों तक पौने दो सौ शिक्षकों का टोटा है। हाल यह है एक-एक अध्यापक प्रभारी प्रधानाध्यापक का कार्यभार के साथ मिड-डे मील आदि का प्रशासनिक कार्य करने के साथ ही बच्चों को पढ़ा भी रहे हैं।
अभिभावकों और स्कूल संचालकों में होते रहे विवाद
वर्ष 2020 में कोरोना महामारी आई तो किसी को नहीं मालूम था कि ये सिलसिला लंबा चलने वाला है। स्कूल-कॉलेज अनिश्चितकालीन के लिए बंद किए जाने के सरकार के आदेश के बाद शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिला। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प सामने आया। इस विकल्प को छात्रों ने हाथोंहाथ लिया, लेकिन गरीब वर्ग और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र स्मार्टफोन नहीं होने की स्थिति में इस नए विकल्प से महरूम हो गए। वहीं, ऑनलाइन कक्षाएं चलने पर भी पूरी फीस लेने को लेकर और ट्यूशन फीस नहीं देने पर स्कूल से बच्चों के नाम काटने जैसे मामले सामने आए। इसमें अभिभावकों और स्कूल संचालकों के बीच विवाद भी पैदा हुए। लोगों ने स्कूलों पर पहुंचकर धरना-प्रदर्शन किया। ऑनलाइन कक्षाएं चलाने से भले ही छात्रों को नया विकल्प मिला हो, लेकिन इसमें स्कूल संचालकों के साथ ही अभिभावक दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ा।
अब ऑफलाइन कक्षाओं की तरफ रुझान
एक साल से ज्यादा समय तक ऑनलाइन पढ़ने के नकारात्मक परिणाम भी सामने आए। बहुत से बच्चों की आंखों पर असर पड़ा तो बहुत से बच्चे फोन के आदी हो गए। छोटे बच्चों को ऑनलाइन कक्षा में पढ़ाना जहां शिक्षकों के लिए टेढ़ी खीर था तो वहीं अभिभावक भी ऑनलाइन कक्षा से आजिज आ चुके हैं। इसलिए वर्ष 2022 में अभिभावक ऑफलाइन कक्षाएं चलाने के पक्ष में आ गए हैं। वहीं, बच्चे भी घर की चाहरदीवारी से निकलकर खुले मैदान में और दोस्तों के साथ खेलने-कूदने के लिए आतुर हैं।
पहली बार बिना परीक्षा दिए पास हुए छात्र
शिक्षा के क्षेत्र में ये नया अनुभव पहली बार देखने को मिला कि छात्र बिना परीक्षा के पास हो गए। कोरोनाकाल में स्कूल नहीं खोले जाने की स्थिति में सरकार ने पिछले वर्षों के परीक्षा परिणाम को आधार मानकर रिजल्ट घोषित किया। कुछ छात्रों ने इसे हाथोंहाथ लिया तो कुछ ने इसे प्रतिभा के साथ खिलवाड़ बताया। बहुत से बच्चों ने पास होने के बावजूद परीक्षा दी और बेहतर अंक हासिल किए। वहीं, सीबीएसई बोर्ड ने पहली बार परीक्षा को दो टर्म में बांट दिया है।