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सरकारी अस्पताल में चार माह में आठ नवजातों की हो चुकी है मौत
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सिविल अस्पताल और आसपास के प्राइवेट अस्पतालों में नवजातों की मौत के मामले सामने आते रहे हैं। रुड़की स्थित सिविल अस्पताल में ही पिछले चार महीने में छह नवजातों की मौत हो चुकी है। वहीं पिछले एक माह में लक्सर और खानपुर में दो नवजात की मौत हो चुकी है। हंगामे के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम दोनों प्राइवेट अस्पतालों को सील कर चुकी है।
रुड़की सिविल अस्पताल में हर दिन औसतन चार से पांच बच्चों का जन्म होता है। अस्पताल प्रबंधन की मानें तो यहां पिछले चार माह में छह नवजातों की मौत हुई है। इनमें पांच नवजात ऐसे हैं, जिनकी गर्भ में ही मृत्यु हो चुकी थी। हालांकि कई मामले ऐसे भी हैं, जिनमें अस्पताल से छुट्टी दिए जाने के बाद या फिर जिला अस्पताल में रेफर किए जाने के बाद नवजातों की मौत हुई है। सिविल अस्पताल में इसका आंकड़ा नहीं है। सीएमएस संजय कंसल ने बताया कि चार माह में छह नवजातों की मौत हुई है। इनमें से पांच मामलों में गर्भ में ही शिशुओं की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने बताया कि नवजात की मौत के पीछे महत्वपूर्ण कारणों में समय से पहले बच्चे का जन्म और मां का अस्वस्थ होना है। वहीं दूसरी ओर देहात क्षेत्रों के प्राइवेट अस्पतालों में भी एक माह में दो नवजात की मौत हो चुकी है। लक्सर में 27 दिसंबर को जच्चा बच्चा दोनों की मौत हो गई थी। इसके बाद परिजनों ने हंगामा किया। मौके पर पहुंची पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अस्पताल को सील कर दिया था। इसके बाद अगले ही दिन खानपुर क्षेत्र में एक अस्पताल में नवजात की मौत हो गई। यहां भी हंगामे के बाद पहुंची पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जांच पड़ताल की। कुछ फाइलें जब्त करने के बाद अस्पताल को सील कर दिया गया। इसके अलावा देहात क्षेत्रों के प्राइवेट अस्पतालों में नवजातों की मौत के मामले सामने आते रहते हैं। ज्यादातर मामले रिकार्ड में दर्ज ही नहीं हो पाते। इन मामलों को या तो अस्पताल प्रबंधन दबा देते हैं या फिर दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है।
नवंबर, 2019 को हुई थी जच्चा बच्चा की मौत
पिछले साल नवंबर माह में लक्सर के एक अस्पताल में जच्चा-बच्चा दोनों की मौत हो गई थी। परिजनों के हंगामे के बाद पुलिस ने किसी तरह मामला शांत कराया था। इस दौरान मौके पर पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जांच भी की थी, लेकिन बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था।
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देहात क्षेत्रों में इन सुविधाओं का है टोटा
नगर के एक अस्पताल को छोड़कर किसी भी अस्पताल में आईसीयू वार्ड नहीं है। सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी दूसरी जांचों की भी सुविधा नहीं है। ऐसे में मरीजों के पास देहरादून, सहारनपुर, मेरठ और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में जाना मजबूरी है। अधिकांश अस्पतालों में बाल रोग विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं हैं। डिलीवरी के बाद नवजात की तबियत बिगड़ने पर तीमारदारों को बीमार महिला को अस्पताल में ही छोड़कर बच्चे को लेकर भागना पड़ता है।
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रुड़की सिविल अस्पताल में हर दिन औसतन चार से पांच बच्चों का जन्म होता है। अस्पताल प्रबंधन की मानें तो यहां पिछले चार माह में छह नवजातों की मौत हुई है। इनमें पांच नवजात ऐसे हैं, जिनकी गर्भ में ही मृत्यु हो चुकी थी। हालांकि कई मामले ऐसे भी हैं, जिनमें अस्पताल से छुट्टी दिए जाने के बाद या फिर जिला अस्पताल में रेफर किए जाने के बाद नवजातों की मौत हुई है। सिविल अस्पताल में इसका आंकड़ा नहीं है। सीएमएस संजय कंसल ने बताया कि चार माह में छह नवजातों की मौत हुई है। इनमें से पांच मामलों में गर्भ में ही शिशुओं की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने बताया कि नवजात की मौत के पीछे महत्वपूर्ण कारणों में समय से पहले बच्चे का जन्म और मां का अस्वस्थ होना है। वहीं दूसरी ओर देहात क्षेत्रों के प्राइवेट अस्पतालों में भी एक माह में दो नवजात की मौत हो चुकी है। लक्सर में 27 दिसंबर को जच्चा बच्चा दोनों की मौत हो गई थी। इसके बाद परिजनों ने हंगामा किया। मौके पर पहुंची पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अस्पताल को सील कर दिया था। इसके बाद अगले ही दिन खानपुर क्षेत्र में एक अस्पताल में नवजात की मौत हो गई। यहां भी हंगामे के बाद पहुंची पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जांच पड़ताल की। कुछ फाइलें जब्त करने के बाद अस्पताल को सील कर दिया गया। इसके अलावा देहात क्षेत्रों के प्राइवेट अस्पतालों में नवजातों की मौत के मामले सामने आते रहते हैं। ज्यादातर मामले रिकार्ड में दर्ज ही नहीं हो पाते। इन मामलों को या तो अस्पताल प्रबंधन दबा देते हैं या फिर दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है।
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नवंबर, 2019 को हुई थी जच्चा बच्चा की मौत
पिछले साल नवंबर माह में लक्सर के एक अस्पताल में जच्चा-बच्चा दोनों की मौत हो गई थी। परिजनों के हंगामे के बाद पुलिस ने किसी तरह मामला शांत कराया था। इस दौरान मौके पर पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जांच भी की थी, लेकिन बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था।
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देहात क्षेत्रों में इन सुविधाओं का है टोटा
नगर के एक अस्पताल को छोड़कर किसी भी अस्पताल में आईसीयू वार्ड नहीं है। सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी दूसरी जांचों की भी सुविधा नहीं है। ऐसे में मरीजों के पास देहरादून, सहारनपुर, मेरठ और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में जाना मजबूरी है। अधिकांश अस्पतालों में बाल रोग विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं हैं। डिलीवरी के बाद नवजात की तबियत बिगड़ने पर तीमारदारों को बीमार महिला को अस्पताल में ही छोड़कर बच्चे को लेकर भागना पड़ता है।