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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Rishikesh News ›   Heritage is not confined to the pages of history

इतिहास के पन्नों में न सिमट जाए धरोहर

Wed, 20 Jul 2016 01:43 AM IST
गंगादत्त थपलियाल/अमर उजाला, ऋषिकेश
गंगादत्त थपलियाल/अमर उजाला, ऋषिकेश Updated Wed, 20 Jul 2016 01:43 AM IST
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दुनियाभर में भारतीय संस्कृति की पताका फहराने वाले स्वामी रामतीर्थ को हमारे तंत्र ने भुला दिया है। यदि ऐसा न होता तो शायद उनके जीवन से जुड़ी ऐतिहासिक चीजों का संरक्षण कर धरोहर के रूप में सहेजा जा चुका होता। यह कड़वी सच्चाई है कि यदि रामतीर्थ जी की तपस्थली का अब भी संरक्षण न किया गया तो उनकी यादों से बचा यह एकमात्र स्थान भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा।

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यह मां गंगा और देवभूमि की खूबसूरत वादियों का आकर्षण ही तो है कि संत-महात्मा यहां अनादि काल से खिंचे चले आते रहे हैं। स्वामी रामतीर्थ ने भी देवभूमि में साधना कर मानव जीवन के लक्ष्य को प्राप्त किया था। संन्यास लेने से पूर्व स्वामी रामतीर्थ ने लक्ष्मणझूला के निकट गंगा के पावन तट पर ब्रह्मपुरी में स्थित एक गुफा को अपनी तपस्थली बनाया। तपस्या करने के बाद स्वामी रामतीर्थ को 1898 को भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को इसी गुफा में आत्म साक्षात्कार हुआ था। यह ऐतिहासिक गुफा तब से लेकर आज तक संरक्षण की बाट जोह रही है। गुफा से लौटने के बाद स्वामी रामतीर्थ ने टिहरी बांध की विशालकाय झील में समा चुकी पुरानी टिहरी को अपनी कर्म स्थली बनाया था।
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इसके बाद उन्होंने 1901 ई को टिहरी के पडिय़ार गांव में भागीरथी के तट पर सेठ मुरलीधर की कुटिया में संन्यास लिया था। जो अब टिहरी बांध की विशालकाय झील में दफन हो चुकी है। साथ ही टिहरी के अठूर स्थित लाला बनवारी लाल के मकान में जहां स्वामी अक्सर ठहरा करते थे। वह भी झील में डूब चुका है। इसके अलावा ब्रहलीन होने से पूर्व स्वामी का पुरानी टिहरी के सिमलासु बाग वाला निवास स्थल भी झील में समा चुका है।

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