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पांच दशक से चल रही मजबूत इरादों की पनचक्की
manoj singh rana
Updated Wed, 05 Oct 2016 01:22 AM IST
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पनचक्की
- फोटो : amar ujala
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वक्त बदला। हालात बदले। लेकिन, इन सबके बीच नहीं बदले तो सोहनलाल के इरादे। यह इरादे ही तो हैं, जो वह बीते पांच दशक से अपने पूर्वजों के पनचक्की के कारोबार को जीवंत रखे हुए हैं। वरना आज के आधुनिक युग में जहां लोग इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं पर निर्भर हो गए हैं। ऐसे में घराट (पनचक्की) के कारोबार को धीमा न पड़ने देना, बड़ी बात है।
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यमकेश्वर ब्लॉक के विंध्यवासिनी निवासी सोहनलाल बताते हैं कि वह पूर्वजों का कारोबार ही आगे बढ़ा रहे हैं। पांच दशक पहले उनके दादाजी ने यह पनचक्की बनाई थी। बकौल सोहनलाल, इस पनचक्की में आसपास करीब 30 गांवों के ग्रामीण गेहूं पिसवाने आते थे। दादा के बाद यह कारोबार उनके पिता ने संभाल लिया। पिता के बाद अब वह खुद इस कारोबार को संभाल रहे हैं। बताया कि प्रतिदिन पनचक्की में दो कुंतल गेंहू और मंडुवा की पिसाई करते हैं। जिससे उन्हें प्रति माह करीब सात से आठ हजार रुपये की आय अर्जित हो जाती है।
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क्या है पनचक्की
ऋषिकेश। यह कृत्रिम आटा पीसने की मशीन होती है। यह पनचक्की, लाइट, डीजल और पेट्रोल से न चलकर पानी की धारा से चलती है। पुराने समय में गांव के लोग इन्हीं पन चक्कियों पर निर्भर रहते थे। इस चक्की में गेेंहू पिसने से आटा बहुत पौष्टिक माना जाता है। इस चक्की में एक किग्रा गेंहूं की पिसाई 1 एक रुपया 50 पैसा है। जबकि इलेक्ट्रॉनिक चक्की में एक किग्रा गेहूं की पिसाई तीन रुपये है।
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इन गांवों के लोग उठाते हैं लाभ
विंध्यवासीनी में संचालित पनचक्की में आज भी देशबाड़ी, आमकाटल, ससपुरी, गुजराड़ी, बांदणी, तलाई आसपास के करीब 20 गांवों के लोग इसका लाभ उठाते हैं।