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अंजना ने जज्बा और जुनून से बदली तकदीर

Fri, 24 Jun 2016 01:28 AM IST
मनोज सिंह राणा /अमर उजाला, ऋषिकेश
मनोज सिंह राणा /अमर उजाला, ऋषिकेश Updated Fri, 24 Jun 2016 01:28 AM IST
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Anjana fortunes changed attitude and passion
पैर से कलाकृतियां बनाती दिव्यांग अंजना - फोटो : amar ujala

जज्बा और जुनून हो तो तकदीर के आड़े नहीं आती हाथ की रेखाएं, बुलंदियां को छू सकती है बिना हाथ के भी हौसलों की शाखाएं। कवि हसीन शाह की ये पंक्तियां मायाकुंड की 28 वर्षीय अंजना पर सटीक बैठती है। दोनों हाथ और एक पैर विकलांग होने के बाद भी अंजना दूसरों के लिए प्रेरणा बनी है। उसके पैर से बनाई गई कलाकृतियों को देख हर कोई दंग रह जाता है। अंजना को इन कलाकृतियों के बनाने से जो भी कोई अपनी खुशी से मेहनताना देता है। उसे वह खुशी खुशी स्वीकार कर लेती है। इसी की बदौलत वह अपने बूढ़े मां बाप की देखभाल और दो भतीजों की पढ़ाई का खर्च वहन करती है।

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अंजना बताती है कि बचपन से ही उसके दोनों हाथ और एक पैर विकलांग है। पिता और माता अब बुजुर्ग हो चुके है। छोटे भाई की शादी हुई, लेकिन फिर वह अपने बच्चों के साथ अलग रहने लगा। घर का खर्च वहन करने को उसने विकलांगता को मात देकर दो साल पूर्व एक स्थानीय महिला से कलाकृतियां बनानी सीखी। अब वह पैर से इस तरह की कलाकृतियां बनाती है कि वहां से गुजरने वाला हर शख्स रुकने को मजबूर हो जाता है। महिलाए तो दूर दूर से उससे भगवान जी के पोस्टर बनवाने आती है।  
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विकलांगता का नहीं कोई मलाल, पर सरकार से खफा
अंजना ने बताया कि उन्हें विकलांग होने का कोई मलाल नहीं है। कहा यदि इंसान के पास हुनर और कला है तो वह जिंदगी को आराम से गुजार सकता है। लेकिन वह सरकारी सिस्टम पर तीखा व्यंग करती है। कहती है कि उनका परिवार पंद्रह सालों से किराए के मकान में रहता है। वह अपने परिवार को आर्थिक मदद के लिए कई बार स्थानीय प्रशासन से गुहार लगा चुकी है। लेकिन उसकी फरियाद किसी ने नहीं सुनी।  
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भाई के बच्चों की पढ़ाई का उठाती है खर्च
छोटा भाई शादी के बाद भले ही अपने बच्चों के साथ अलग रहने लगा हो, लेकिन अंजना अपने बड़े होने का फर्ज बखूबी निभा रही है। छोटा भाई मजदूरी करता है और परिवार का खर्च चलाने में असमर्थ है। इसीलिए वह अपने दो भतीजों की पढ़ाई का खर्च स्वयं वहन करती है।

 

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