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Pithoragarh News: नदी बीमार है... रामगंगा की गोद में कम हो गईं असेला की अठखेलियां

Thu, 12 Feb 2026 10:54 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़ Updated Thu, 12 Feb 2026 10:54 PM IST
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The river is sick... Asela's frolics have reduced in the lap of Ramganga.
खतरे में असेला प्रजाति की मछली। संवाद
थल (पिथौरागढ़)। रामगंगा की धारा अब पहले जैसी नहीं रही। पानी की पारदर्शिता घट रही है। तलहटी में गाद बढ़ रही है। इसके साथ नदी में जलीय जीवन भी सिमटता जा रहा है। असेला (स्नो ट्राउट) मछली का विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाना इस हिमालयी नदी की सेहत बिगड़ने का सीधा संकेत है।
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कभी रामगंगा में धूप के बीच चमकती और चांदनी रात में सतह पर स्नो ट्राउट मछलियाें के झुंड तैरने के दृश्य आम थे। इतिहास में दर्ज वर्ष 1975 की भीषण आपदा रामगंगा के लिए बड़ा झटका साबित हुई थी। भारी मलबा और जंगलों से घुले विषैले तत्व नदी में समा गए थे। परिणामस्वरूप लाखों स्नो ट्राउट की मौत हुई और नदी के किनारे मृत मछलियों से पट गए थे। इसके बाद जब संख्या कुछ संभली, तब वर्ष 2013 और 2016 की आपदाओं ने फिर वही दृश्य दोहरा दिया। नदी में दोबारा गाद भर गई और हजारों मछलियां मारी गईं। जलस्तर घटने पर किनारों की रेत में दबी स्नो ट्राउट के बाहर निकलने से ही संकेत मिल गए कि नदी का तंत्र संकट में है।
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जानकार मानते हैं कि बीते दो दशकों में हालात तेजी से बदले। पारिस्थितिक संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। नदी में असेला की संख्या बेहद कम रह गई है। अब स्थानीय लोगों को महीनों तक यह मछली नजर नहीं आती। संवाद
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इंसान बन गया दुश्मन...
विशेषज्ञों के अनुसार, रामगंगा के प्राकृतिक आवास में बढ़ते हस्तक्षेप ने इस स्थिति को जन्म दिया है। अवैध खनन, तटों पर अनियोजित निर्माण, बढ़ती मानवीय गतिविधियां और जल प्रदूषण ने नदी की संरचना बदल दी है। मानसून के दौरान पहाड़ों से बहकर आने वाली भारी सिल्ट स्नो ट्राउट के गलफड़ों में भर जाती है जिससे उनकी गतिशीलता समाप्त हो जाती है और वे दम तोड़ देती हैं। प्रजनन के लिए जरूरी साफ, ठंडा और पथरीला तल अब पहले जैसा नहीं रहा।

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अनियोजित निर्माण से मानसूनकाल में नदियों में भारी मात्रा में सिल्ट आ रही है। ऐसे में स्नो ट्राउट के गलफड़ों में मलबा भर जाता है। इससे इनकी चपल गतिविधियां क्षीर्ण होने से यह मृत हो जाती है। अवैध तरीके से इसका शिकार करना भी इसके कम होने का कारण है। ठंडे पानी में रहने के कारण इनकी पैदावार धीमी होती है। अप्रैल से सितंबर में प्रजनन के बाद इस मछली को परिपक्व होने में तीन साल का समय लगता है। जागरूकता से ही इसके अस्तित्व को बचाया जा सकता है। - डॉ. रमेश चलाल, जिला मत्स्य अधिकारी, पिथौरागढ़


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असेला मछली रामगंगा की शान मानी जाती है। हम दो से तीन दशक पहले तक इनको बड़ी संख्या में नदी में तैरते हुए देखते रहे। 1975 में बड़ी संख्या में इन मछलियों की मौत हुई। अब इनका नजर आना बंद हो गया है। इस मछली के अस्तित्व को बचाना जरूरी है। यदि यह विलुप्त हुईं तो पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरा असर पड़ेगा। - दान सिंह बिष्ट (80 वर्ष), थल

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