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कैलाश यात्रियों को अब नहीं चलना पड़ेगा पैदल
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पिथौरागढ़। कोरोना के कारण बंद हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा वर्ष 2022 में भी शुरू होने की उम्मीद नहीं है। अगर इस वर्ष यात्रा शुरू होती तो यात्रियों को पैदल नहीं चलना पड़ता।
बीआरओ ने चीन सीमा से लगे नाभीढांग तक सड़क पहुंचा दी है। तवाघाट से गुंजी तक सड़क को ठीक करने के लिए डामरीकरण, नाली निर्माण और सुरक्षा दीवार का कार्य चल रहा है। गुंजी से नाभीढांग तक सड़क में भले ही डामरीकरण नहीं हुआ हो, लेकिन सड़क ठीक है। कालापानी से पठारी हिस्से के शुरू होने के बाद नाभीढांग तक सड़क बहुत अच्छी है। सड़क बनने के बाद सीमांत के ग्रामीणों और सुरक्षा एजेंसियों को काफी लाभ पहुंचा है।
लिपुलेख दर्रे से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को प्रशासन, कुमाऊं मंडल विकास निगम, पुलिस, आईटीबीपी ने अत्यधिक दुर्गम और चुनौतीपूर्ण की श्रेणी में रखा था, लेकिन सड़क बनने के बाद यात्रा अब पहले की दुर्गम नहीं है। दिल्ली से लिपुलेख तक 696 किमी दूरी की इस यात्रा में कई प्रकार के अवरोध आते रहते हैं। यात्रा ठीक मानसून सीजन में होती है, इस कारण सड़क मार्ग और पैदल मार्गों पर हर समय खतरा बना रहता है।
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तभी इस यात्रा के संचालन में एजेंसियों को ताकत झोंकनी पड़ती है। यात्रियों को 16730 फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रे को पार कर तिब्बत में प्रवेश करना पड़ता है। सीमा सड़क संगठन ने दो वर्ष पहले ही तवाघाट से नाभीढांग तक सड़क पहुंचा दी है। सड़क बनने के बाद सुरक्षा एजेंसियों और सीमांत के ग्रामीणों को काफी राहत मिली है। इस बार सीमांत के लोगों को कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू होने की उम्मीद थी, लेकिन इस बार भी यात्रा शुरू होने पर संशय बना हुआ है।
कैलाश मानसरोवर तक ऐसे पहुंचते हैं यात्री
पिथौरागढ़। यात्री पहले दिन दिल्ली से 340 किमी का सफर तय कर अल्मोड़ा पहुंचते हैं। अगले दिन अल्मोड़ा से धारचूला तक 220 किमी का सफर भी वाहनों से होता है। तीसरे दिन यात्रियों को 60 किमी की यात्रा करनी होती है। इसमें धारचूला से नारायण आश्रम तक 54 किमी वाहन से और वहां से छह किमी सिर्खा तक पैदल जाना होता है। सिर्खा यात्रियों का पहला पैदल पड़ाव है। चौथे दिन यात्री सिर्खा से गाला तक 14 किमी का पैदल सफर करते हैं। पांचवें दिन गाला से 18 किमी पैदल चलकर यात्रियों को बूंदी पड़ाव ले जाया जाता है। छठे दिन यात्री बूंदी से 17 किमी पैदल चलकर गुंजी पहुंचते हैं।
सातवें दिन का सफर ज्यादा कष्टदायक होता है। उस दिन यात्री गुंजी से 17 किमी चलकर नाभीढांग पहुंचते हैं। अगले दिन तड़के करीब तीन बजे लिपुलेख दर्रे के लिए रवाना होते हैं। नाभीढांग से लिपुलेख की दूरी 10 किमी है। दर्रे को सुबह सात बजे से पहले पार करना पड़ता है। उसके बाद वहां पर तेज हवा चलने लगती है। बूंदी से गाला तक का पैदल रास्ता सबसे कठिन है। इसमें यात्रियों को 4000 सीढ़ियां पार करनी पड़ेंगी। रास्ते के एक ओर कठोर चट्टान है तो दूसरी तरफ तेज गति से बहने वाली महाकाली है। नारायण आश्रम से लिपुलेख दर्रे तक बरसाती नाले, झरने, बर्फ, खतरनाक रास्ते हैं। सड़क मार्गों के भी बारिश के सीजन में मलबा आने के कारण बंद होने का खतरा रहता है। अब सड़क बनने के बाद यात्री सीधे धारचूला से करीब 95 किमी की दूरी पर स्थित नाभीढांग तक वाहन से पहुंच सकते हैं।
कैलाश यात्रा और भारत चीन व्यापार के दौरान गुंजी में खुलता है अस्थायी थाना
पिथौरागढ़। कैलाश यात्रा और भारत-चीन व्यापार को शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए प्रत्येक वर्ष गुंजी में अस्थायी थाना खोला जाता है। गर्ब्यांग, बूंदी, गाला, सिर्खा, मिर्थी में अस्थायी चौकी खोली जाती हैं। हर दल के साथ एक पुलिसकर्मी सबसे आगे और एक पुलिसकर्मी सबसे पीछे वायरलेस सेट के साथ चलता है। यात्रा संचालन के लिए चार उपनिरीक्षक, 24 कांस्टेबल, दो एलआईयू कर्मी, सात संचार कर्मी, हर दल के साथ एसडीआरएफ के पांच-पांच जवान, होमगार्ड के 50 जवान तैनात किए जाते हैं। गुंजी में कैलाश यात्रा, व्यापार के दौरान बैंक, अस्पताल भी खोला जाता है।
भारत-चीन व्यापार बंद होने से तकलाकोट में फंसा है भारतीय व्यापारियों का सामान
पिथौरागढ़। कैलाश मानसरोवर यात्रा के साथ शुरू होने वाला भारत-चीन व्यापार भी पिछले तीन सालों से बंद है। लिपुलेख दर्रे से होने वाले भारत-चीन व्यापार के लिए भारतीय व्यापारी चीन की तकलाकोट मंडी जाते हैं। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद 30 वर्ष तक व्यापार बंद रहा था। वर्ष 1992 में फिर से शुरू हुआ व्यापार कोरोना के कारण वर्ष 2020 से बंद है। तीन वर्ष पूर्व 2019 में तकलाकोट मंडी में सामान छोड़कर आए भारतीय व्यापारियों को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ा है। व्यापार बंद होने से करीब 400 व्यापारियों का कारोबार प्रभावित हुआ है। भारत-चीन व्यापार समिति के उपाध्यक्ष दिनेश गुंज्याल ने बताया कि भारत-चीन व्यापार शुरू होने की इस साल भी उम्मीद नहीं है। तकलाकोट मंडी में तीन साल से रखा उनका करोड़ों का सामान अब खराब हो चुका होगा।
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बीआरओ ने चीन सीमा से लगे नाभीढांग तक सड़क पहुंचा दी है। तवाघाट से गुंजी तक सड़क को ठीक करने के लिए डामरीकरण, नाली निर्माण और सुरक्षा दीवार का कार्य चल रहा है। गुंजी से नाभीढांग तक सड़क में भले ही डामरीकरण नहीं हुआ हो, लेकिन सड़क ठीक है। कालापानी से पठारी हिस्से के शुरू होने के बाद नाभीढांग तक सड़क बहुत अच्छी है। सड़क बनने के बाद सीमांत के ग्रामीणों और सुरक्षा एजेंसियों को काफी लाभ पहुंचा है।
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लिपुलेख दर्रे से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को प्रशासन, कुमाऊं मंडल विकास निगम, पुलिस, आईटीबीपी ने अत्यधिक दुर्गम और चुनौतीपूर्ण की श्रेणी में रखा था, लेकिन सड़क बनने के बाद यात्रा अब पहले की दुर्गम नहीं है। दिल्ली से लिपुलेख तक 696 किमी दूरी की इस यात्रा में कई प्रकार के अवरोध आते रहते हैं। यात्रा ठीक मानसून सीजन में होती है, इस कारण सड़क मार्ग और पैदल मार्गों पर हर समय खतरा बना रहता है।
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तभी इस यात्रा के संचालन में एजेंसियों को ताकत झोंकनी पड़ती है। यात्रियों को 16730 फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रे को पार कर तिब्बत में प्रवेश करना पड़ता है। सीमा सड़क संगठन ने दो वर्ष पहले ही तवाघाट से नाभीढांग तक सड़क पहुंचा दी है। सड़क बनने के बाद सुरक्षा एजेंसियों और सीमांत के ग्रामीणों को काफी राहत मिली है। इस बार सीमांत के लोगों को कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू होने की उम्मीद थी, लेकिन इस बार भी यात्रा शुरू होने पर संशय बना हुआ है।
कैलाश मानसरोवर तक ऐसे पहुंचते हैं यात्री
पिथौरागढ़। यात्री पहले दिन दिल्ली से 340 किमी का सफर तय कर अल्मोड़ा पहुंचते हैं। अगले दिन अल्मोड़ा से धारचूला तक 220 किमी का सफर भी वाहनों से होता है। तीसरे दिन यात्रियों को 60 किमी की यात्रा करनी होती है। इसमें धारचूला से नारायण आश्रम तक 54 किमी वाहन से और वहां से छह किमी सिर्खा तक पैदल जाना होता है। सिर्खा यात्रियों का पहला पैदल पड़ाव है। चौथे दिन यात्री सिर्खा से गाला तक 14 किमी का पैदल सफर करते हैं। पांचवें दिन गाला से 18 किमी पैदल चलकर यात्रियों को बूंदी पड़ाव ले जाया जाता है। छठे दिन यात्री बूंदी से 17 किमी पैदल चलकर गुंजी पहुंचते हैं।
सातवें दिन का सफर ज्यादा कष्टदायक होता है। उस दिन यात्री गुंजी से 17 किमी चलकर नाभीढांग पहुंचते हैं। अगले दिन तड़के करीब तीन बजे लिपुलेख दर्रे के लिए रवाना होते हैं। नाभीढांग से लिपुलेख की दूरी 10 किमी है। दर्रे को सुबह सात बजे से पहले पार करना पड़ता है। उसके बाद वहां पर तेज हवा चलने लगती है। बूंदी से गाला तक का पैदल रास्ता सबसे कठिन है। इसमें यात्रियों को 4000 सीढ़ियां पार करनी पड़ेंगी। रास्ते के एक ओर कठोर चट्टान है तो दूसरी तरफ तेज गति से बहने वाली महाकाली है। नारायण आश्रम से लिपुलेख दर्रे तक बरसाती नाले, झरने, बर्फ, खतरनाक रास्ते हैं। सड़क मार्गों के भी बारिश के सीजन में मलबा आने के कारण बंद होने का खतरा रहता है। अब सड़क बनने के बाद यात्री सीधे धारचूला से करीब 95 किमी की दूरी पर स्थित नाभीढांग तक वाहन से पहुंच सकते हैं।
कैलाश यात्रा और भारत चीन व्यापार के दौरान गुंजी में खुलता है अस्थायी थाना
पिथौरागढ़। कैलाश यात्रा और भारत-चीन व्यापार को शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए प्रत्येक वर्ष गुंजी में अस्थायी थाना खोला जाता है। गर्ब्यांग, बूंदी, गाला, सिर्खा, मिर्थी में अस्थायी चौकी खोली जाती हैं। हर दल के साथ एक पुलिसकर्मी सबसे आगे और एक पुलिसकर्मी सबसे पीछे वायरलेस सेट के साथ चलता है। यात्रा संचालन के लिए चार उपनिरीक्षक, 24 कांस्टेबल, दो एलआईयू कर्मी, सात संचार कर्मी, हर दल के साथ एसडीआरएफ के पांच-पांच जवान, होमगार्ड के 50 जवान तैनात किए जाते हैं। गुंजी में कैलाश यात्रा, व्यापार के दौरान बैंक, अस्पताल भी खोला जाता है।
भारत-चीन व्यापार बंद होने से तकलाकोट में फंसा है भारतीय व्यापारियों का सामान
पिथौरागढ़। कैलाश मानसरोवर यात्रा के साथ शुरू होने वाला भारत-चीन व्यापार भी पिछले तीन सालों से बंद है। लिपुलेख दर्रे से होने वाले भारत-चीन व्यापार के लिए भारतीय व्यापारी चीन की तकलाकोट मंडी जाते हैं। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद 30 वर्ष तक व्यापार बंद रहा था। वर्ष 1992 में फिर से शुरू हुआ व्यापार कोरोना के कारण वर्ष 2020 से बंद है। तीन वर्ष पूर्व 2019 में तकलाकोट मंडी में सामान छोड़कर आए भारतीय व्यापारियों को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ा है। व्यापार बंद होने से करीब 400 व्यापारियों का कारोबार प्रभावित हुआ है। भारत-चीन व्यापार समिति के उपाध्यक्ष दिनेश गुंज्याल ने बताया कि भारत-चीन व्यापार शुरू होने की इस साल भी उम्मीद नहीं है। तकलाकोट मंडी में तीन साल से रखा उनका करोड़ों का सामान अब खराब हो चुका होगा।