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Pithoragarh News: नेपाल से कल्यूं मंगवाकर निभा रहे परंपरा
Sun, 20 Aug 2023 11:49 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sun, 20 Aug 2023 11:49 PM IST
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पंचधान्य में शामिल कल्यूं (छोटी मटर)।
अस्कोट (पिथौरागढ़)। बिरुड़ पंचमी पर्व पर गौरा-महेश्वर की पूजा में चढ़ाए जाने वाले पंच अनाज कल्यूं, गेहूं, उड़द, गहत और गुरुस भिगोए जाते हैं। इन्हें अष्टमी के दिन गौरा-महेश्वर को अर्पित कर उनका प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
वर्तमान में पंचधान्य में शामिल कल्यूं (छोटी-मटर) क्षेत्र में न के बराबर उत्पादित हो रही है। इसे लोग नेपाल से मंगवाकर गांव में बांट रहे हैं। इसमें अन्य अनाज मिलाकर बिरुड़े भिगोए जा रहे हैं। 75 वर्षीय तुलसी देवी बताती हैं कि पहले काफी मात्रा में कल्यूं की फसल होती थी जो वर्ष भर दाल के काम आती थी। कुछ साल से कल्यूं की फसल में फली लगते ही बंदर और लंगूर पौधे ही उखाड़कर ले जा रहे हैं।
उनका कहना है कि अब तो बीज के भी लाले पड़ गए हैं तो कल्यूं खाने को कहां से मिलेगा। इसी तरह प्रकाश पाल, बीरजंग पाल व गोविंद सिंह ने बताया कि पूजा के लिए नेपाल से दो किलो कल्यूं मंगाया गया है जिसे थोड़ा-थोड़ा प्रत्येक परिवार को बांट दिया गया है। विमला देवी, कमला, माया, कलावती, निर्मला व ममता का कहना है कि जंगली जानवरों ने खेतीबाड़ी बर्बाद कर दी है। पहले पूजा के बाद दो-तीन दिन तक पंच अनाजों को खाते थे। अब एक दिन के लिए भी पूरे नहीं होते हैं। क्षेत्र के देवल, खोलिया गांव, रसगाड़ी, गदाली, मोचोरा, बड़ीगांव, तल्ला-मल्ला बगड़, हिनकोट, दारती आदि गांवों में जंगली जानवरों के चलते लोग खेतीबाड़ी से विमुख हो रहे हैं।
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वर्तमान में पंचधान्य में शामिल कल्यूं (छोटी-मटर) क्षेत्र में न के बराबर उत्पादित हो रही है। इसे लोग नेपाल से मंगवाकर गांव में बांट रहे हैं। इसमें अन्य अनाज मिलाकर बिरुड़े भिगोए जा रहे हैं। 75 वर्षीय तुलसी देवी बताती हैं कि पहले काफी मात्रा में कल्यूं की फसल होती थी जो वर्ष भर दाल के काम आती थी। कुछ साल से कल्यूं की फसल में फली लगते ही बंदर और लंगूर पौधे ही उखाड़कर ले जा रहे हैं।
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उनका कहना है कि अब तो बीज के भी लाले पड़ गए हैं तो कल्यूं खाने को कहां से मिलेगा। इसी तरह प्रकाश पाल, बीरजंग पाल व गोविंद सिंह ने बताया कि पूजा के लिए नेपाल से दो किलो कल्यूं मंगाया गया है जिसे थोड़ा-थोड़ा प्रत्येक परिवार को बांट दिया गया है। विमला देवी, कमला, माया, कलावती, निर्मला व ममता का कहना है कि जंगली जानवरों ने खेतीबाड़ी बर्बाद कर दी है। पहले पूजा के बाद दो-तीन दिन तक पंच अनाजों को खाते थे। अब एक दिन के लिए भी पूरे नहीं होते हैं। क्षेत्र के देवल, खोलिया गांव, रसगाड़ी, गदाली, मोचोरा, बड़ीगांव, तल्ला-मल्ला बगड़, हिनकोट, दारती आदि गांवों में जंगली जानवरों के चलते लोग खेतीबाड़ी से विमुख हो रहे हैं।
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