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सार गौं जै बगि ग्यो त पुज पाठलै कि हुंछ
संजू पंत /अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट (पिथौरागढ़)।
Updated Mon, 18 Jul 2016 10:38 PM IST
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सार गौं जै बगि ग्यो त पुज पाठलै कि हुंछ
- फोटो : अमर उजाला
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सावन के पहले सोमवार को बस्तड़ी के ब्रह्मदेव मंदिर में कोई दीया-बत्ती के लिए नहीं गया। गांव के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। 30 जून की रात आई आपदा ने मंदिर ध्वस्त किया, पास के पीपल के पेड़ की जड़ें हिला दी।
और लोगों की आस्था को भी फिलहाल तो उखाड़ ही दिया। पेड़ धराशायी तो नहीं हुआ, लेकिन खतरे में आ गया। मंदिर नहीं रहा। वहां तक पहुंचने का रास्ता मलबे में दब गया। आपदा के कारण सांस्कृतिक तानाबाना में छिन्न भिन्न हो गया है। गांव के कई लोग तो जैसे नास्तिक हो गए हैं। वह कहते हैं कि ‘सार गौं जै बगि ग्यो त पुज पाठलै कि हुंछ’ (सारा गांव जो बह गया तो इस पूजा पाठ से क्या होता है)। बता दें कि पहाड़ पर सावन का महीना 16 जुलाई से शुरू हो गया है और 18 जुलाई को यहां पहला सोमवार था, जबकि मैदानी इलाकों में सावन का महीना 20 जुलाई से शुरू होगा।
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सावन के पहले सोमवार को आज कई दशकों बाद ऐसा हुआ है कि ब्रह्मदेव मंदिर में कोई दीया बत्ती के लिए भी नहीं गया। पीपल के पेड़ में एक लोटा जल चढ़ाने की किसी ने जरूरत नहीं समझी। जीआईसी सिंघाली में बने राहत कैंप में रुके किसी भी महिला या पुरुष ने सोमवार का व्रत नहीं किया। बस्तड़ी के 29 परिवारों में से 13 परिवार ऐसे हैं जिन्होंने आपदा में अपने किसी न किसी परिजन को खोया है।
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बस्तड़ी के पंडित शंकर दत्त भट्ट बताते हैं कि सावन में ही ब्रह्मदेव मंदिर के कपाट खोले जाते थे। कुछ महिलाएं पूरे सावन में व्रत रखती थी। सुबह चार बजे से मंदिर में शंख और घंटी बजने लगती। पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाते समय ‘त्र्यंबकम यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनम’ का मंत्रोच्चारण होता था। ब्रह्मदेव के मंदिर का अस्तित्व नहीं है तो वहां पर जाने का सवाल ही नहीं उठता। वह कहते हैं कि हर साल आठूं के दिन ब्रह्मदेव मंदिर में मेला लगता था।
लोग खेल, चांचरी की धुन में नाचते थे। अब नहीं लगता कि वह दिन लौटेंगे। आठूं मनाने के लिए उड़मा, पत्थरकोट और सिंघाली के लोग भी आया करते थे। एक खास किस्म की सांस्कृतिक पहचान इस इलाके की थी। हर परिवार खुशी से जीवनयापन कर रहा था। आपदा से जीवन तो उजड़ा ही है संस्कृति और आस्था भी समाप्त हो गई है। बस्तड़ी में पहले 100 परिवार रहते थे। इनमें से कई परिवार मैदानी शहरों और पिथौरागढ़ में जाकर बस गए। सिर्फ 29 परिवार इस गांव में रहा करते थे। वे अपनी जमीन से जुड़े थे, संस्कृति की रक्षा करते थे और धर्म का पालन करते थे। ऐसा लगता है कि आपदा से उबरने तक यह लोग किसी अन्य विषय के बारे में सोचने वाले नहीं हैं।