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Pithoragarh News: जंगल कटे, शहर बसे... लेकिन तेंदुए नहीं भूलते पुरखों के चुने रास्ते
Fri, 14 Aug 2026 12:37 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Fri, 14 Aug 2026 12:37 AM IST
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पिथौरागढ़। जहां कभी जंगल और झाड़ियां हुआ करती थीं, आज मकान, सड़कें और संकरी गलियां हैं। तेंदुओं के लिए ये रास्ते अब भी अनजाने नहीं हैं। आबादी के बीच तेंदुओं का बार-बार आने के पीछे उनके पारंपरिक रास्तों और पुराने आवासों की ओर लौटने की प्रवृत्ति को कारण माना जा रहा है।
नगर क्षेत्र में तेंदुओं की बढ़ती चहलकदमी के बीच वन विभाग ने उनके व्यवहार और आवाजाही के पैटर्न पर मंथन किया। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक कई वन्यजीव पीढ़ियों से इस्तेमाल होते रहे मार्गों और आवासों की ओर दोबारा रुख करते हैं। तेंदुओं का नगर की गलियों और मोहल्लों में पहुंचना भी इसी व्यवहार का हिस्सा है।
वन विभाग का कहना है कि वन्यजीवों के अपने पारंपरिक मार्गों और आवासों की ओर लौटने की प्रवृत्ति को लेकर पूर्व में शोध भी सामने आ चुके हैं। हाथी और तेंदुए समेत कई वन्यजीव पीढ़ियों पुराने रास्तों का इस्तेमाल दोबारा करते हैं। सामान्य तौर पर एक तेंदुआ करीब 24 किलोमीटर के दायरे में विचरण कर सकता है लेकिन वर्तमान में नगरीय क्षेत्र में उनकी मौजूदगी महज एक से तीन किलोमीटर के दायरे में दर्ज हो रही है। आबादी के बीच लगातार तेंदुओं की मौजूदगी उनके पुराने आवास और आवाजाही के मार्गों से जुड़ाव की ओर भी इशारा कर रही है।
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कभी जंगल और झाड़ियों के बीच से गुजरते थे ये रास्ते
पिथौरागढ़ का नगरीय क्षेत्र पहले जंगल और झाड़ियों से घिरा था। यही क्षेत्र तेंदुओं का प्राकृतिक आवास हुआ करता था और जंगल के भीतर उनके आने-जाने के तय रास्ते भी थे। समय के साथ जंगल सिमटते गए और उनकी जगह कंक्रीट के भवन, सड़कें और गलियां बन गईं। इसके बावजूद तेंदुओं की पीढ़ियां उन पुराने मार्गों को पूरी तरह नहीं भूलीं। अब इन्हीं इलाकों में तेंदुओं की आवाजाही देखी जा रही है, जहां कभी उनका प्राकृतिक आवास हुआ करता था।
आबादी के करीब रहना भी तेंदुओं की प्रवृत्ति
तेंदुओं के नगर की ओर आने की वजह सिर्फ पुराने रास्ते नहीं हैं। आबादी के आसपास उन्हें भोजन और अन्य अनुकूल परिस्थितियां भी मिलती हैं। यही वजह है कि कई बार तेंदुए जंगल की अपेक्षा बस्तियों के करीब रहना पसंद करते हैं।
तेंदुओं के आबादी के नजदीक आने के कई कारण हैं। ये आबादी के नजदीक रहना पसंद करते हैं। यह भी सच है कि कई वन्यजीव अपने पारंपरिक रास्तों और आवासों का रुख करते हैं। तेंदुए भी ऐसे वन्यजीवों में शामिल हैं। -किशोर गोस्वामी, इंचार्ज, तेंदुआ रेस्क्यू सेंटर, अल्मोड़ा
तेंदुए, हाथी सहित अन्य कई वन्यजीव अपने पारंपरिक यानी पुश्तैनी रास्तों पर लौटते हैं। यही कारण है कि नगर की गलियों में तेंदुए अधिक संख्या में नजर आ रहे हैं। तेंदुओं का यह पारंपरिक व्यवहार है। -दिनेश जोशी, रेंजर, पिथौरागढ़
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नगर क्षेत्र में तेंदुओं की बढ़ती चहलकदमी के बीच वन विभाग ने उनके व्यवहार और आवाजाही के पैटर्न पर मंथन किया। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक कई वन्यजीव पीढ़ियों से इस्तेमाल होते रहे मार्गों और आवासों की ओर दोबारा रुख करते हैं। तेंदुओं का नगर की गलियों और मोहल्लों में पहुंचना भी इसी व्यवहार का हिस्सा है।
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वन विभाग का कहना है कि वन्यजीवों के अपने पारंपरिक मार्गों और आवासों की ओर लौटने की प्रवृत्ति को लेकर पूर्व में शोध भी सामने आ चुके हैं। हाथी और तेंदुए समेत कई वन्यजीव पीढ़ियों पुराने रास्तों का इस्तेमाल दोबारा करते हैं। सामान्य तौर पर एक तेंदुआ करीब 24 किलोमीटर के दायरे में विचरण कर सकता है लेकिन वर्तमान में नगरीय क्षेत्र में उनकी मौजूदगी महज एक से तीन किलोमीटर के दायरे में दर्ज हो रही है। आबादी के बीच लगातार तेंदुओं की मौजूदगी उनके पुराने आवास और आवाजाही के मार्गों से जुड़ाव की ओर भी इशारा कर रही है।
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कभी जंगल और झाड़ियों के बीच से गुजरते थे ये रास्ते
पिथौरागढ़ का नगरीय क्षेत्र पहले जंगल और झाड़ियों से घिरा था। यही क्षेत्र तेंदुओं का प्राकृतिक आवास हुआ करता था और जंगल के भीतर उनके आने-जाने के तय रास्ते भी थे। समय के साथ जंगल सिमटते गए और उनकी जगह कंक्रीट के भवन, सड़कें और गलियां बन गईं। इसके बावजूद तेंदुओं की पीढ़ियां उन पुराने मार्गों को पूरी तरह नहीं भूलीं। अब इन्हीं इलाकों में तेंदुओं की आवाजाही देखी जा रही है, जहां कभी उनका प्राकृतिक आवास हुआ करता था।
आबादी के करीब रहना भी तेंदुओं की प्रवृत्ति
तेंदुओं के नगर की ओर आने की वजह सिर्फ पुराने रास्ते नहीं हैं। आबादी के आसपास उन्हें भोजन और अन्य अनुकूल परिस्थितियां भी मिलती हैं। यही वजह है कि कई बार तेंदुए जंगल की अपेक्षा बस्तियों के करीब रहना पसंद करते हैं।
तेंदुओं के आबादी के नजदीक आने के कई कारण हैं। ये आबादी के नजदीक रहना पसंद करते हैं। यह भी सच है कि कई वन्यजीव अपने पारंपरिक रास्तों और आवासों का रुख करते हैं। तेंदुए भी ऐसे वन्यजीवों में शामिल हैं। -किशोर गोस्वामी, इंचार्ज, तेंदुआ रेस्क्यू सेंटर, अल्मोड़ा
तेंदुए, हाथी सहित अन्य कई वन्यजीव अपने पारंपरिक यानी पुश्तैनी रास्तों पर लौटते हैं। यही कारण है कि नगर की गलियों में तेंदुए अधिक संख्या में नजर आ रहे हैं। तेंदुओं का यह पारंपरिक व्यवहार है। -दिनेश जोशी, रेंजर, पिथौरागढ़