पहाड़ वालों की जिंदगी में खुशहाली ला सकता है बुरांश
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राज्य पुष्प बुरांश लोगों की जिंदगी में खुशहाली ला सकता है, रोजगार का बेहतर जरिया बन सकता है, यहां तक कि पहाड़ से हो रहे पलायन को रोकने में भी मददगार साबित हो सकता है। उच्च हिमालयी क्षेत्र के साथ ही ऊंचाई वाले इलाकों में खिलने वाले बुरांश का कोई उपयोग नहीं हो पाता है। बुरांश फारेस्ट अथवा वन पंचायत के जंगलों में ही अधिक होता है। बुरांश का वन संपदा होना व्यावसायिक उपयोग में बाधक है। सरकार चाहे तो बुरांश आमदनी का जरिया बनने के साथ ही लोगों की सेहत के लिए भी मुफीद साबित होगा। बुरांश को नेपाल में राष्ट्रीय पुष्प का दर्जा प्राप्त है।
समुद्र तल से 1500 से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले बुरांश का वैज्ञानिक नाम रोडोडेंड्रॉन है। बुरांश के पेड़ों पर मार्च, अप्रैल के महीने में लाल, गुलाबी खिलने लगते है तो जंगलों में जैसे बहार आ जाती है। बुरांश को कई बीमारियों की दवा कहा जाए तो गलत नहीं होगा। बुरांश के फूलों का प्रयोग दवा बनाने में किया जाता है। बुरांश का जूस हृदयरोग में लाभकारी होता है। बुरांश के फूलों की चटनी भी बनती है। बुरांश के सूखे पेड़ों से कृषि यंत्र बनते हैं। ग्रामीण सीमित मात्रा में बुरांश के फूलों का उपयोग कर पाते हैं।
वन संपदा होने के कारण उद्यान विभाग बुरांश को रोजगार का जरिया बनाने की दिशा में कदम नहीं बढ़ा पा रहा है। वन विभाग भी बुरांश का उपयोग नहीं करता। बुरांश के उपयोग से रोजगार की तलाश में बाहर निकलने का सिलसिला भी कुछ हद तक थमेगा। बुरांश के उपयोग का तरीका ढूंढकर इस दिशा में काम होना चाहिए।
दोहन का अधिकार और सुविधा दे सरकार
नामिक की ग्राम प्रधान तुलसी जेम्याल कहती हैं कि सरकार नामिक समेत अन्य ऊंचाई हिमालयी क्षेत्रों में बुरांश को रोजगार से जोड़े तो सीमांत के इलाकों में खुशहाली आ सकती है। जंगलों से बुरांश दोहन का अधिकार दिलाने के साथ ही बुरांश से जूस, जैली आदि बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर सुविधाएं सरकार को उपलब्ध करानी चाहिए।
बुरांश हृदयरोग में बेहद लाभकारी है। बुरांश के जूस का सेवन हृदय रोगियों को करना चाहिए। बुरांश की लगभग 300 प्रजातियां उत्तरी गोलार्ध की ठंडी जगहों पर पाई जाती हैं। बुरांश झाड़ीनुमा भी होता है। पूर्वी हिमालय पर बुरांश बहुतायत मिलता है। पश्चिमी हिमालय में इसकी चार-पांच प्रजातियां ही काफी ऊंचाई में पाई जाती हैं। दक्षिण भारत में केवल एक जाति रोडोडेंड्रॉन निलगिरिकम पाई जाती है। इसकी कुछ प्रजातियां दक्षिणी और दक्षिण पूर्व एशिया में भी मिलती हैं। -डा. नवीन जोशी एमडी आयुर्वेद।
वन संपदा होने के कारण इंडस्ट्रियल रूप में बुरांश का उपयोग नहीं हो पा रहा है। राज्य सरकार को बुरांश के विपणन की नीति तैयार करने के लिए प्रस्ताव भेजा जाएगा। वह मानती हैं कि बुरांश रोजगार का जरिया बन सकता है। -डा. मीनाक्षी जोशी, जिला उद्यान अधिकारी, पिथौरागढ़।