...लेकिन तुम संग उस कौतिक में, केवल शायद मैं न रहूंगा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बांह के बंधन कमर झुकाए, लय हुड़का संग कदम बढ़ेगा, लेकिन तुम संग उस कौतिक में, केवल शायद मैं न रहूंगा। ‘मन के उद्गार’ कविता में इन पंक्तियों के रचनाकार जोहार घाटी के प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शेर सिंह पांगती नहीं रहे। मंगलवार सुबह 11 बजे देहरादून में उनका निधन हो गया। वह कुछ समय से देहरादून में भारतीय जीवन बीमा निगम के अधिकारी पद पर तैनात अपने बेटे मनोज पांगती के साथ रह रहे थे। डॉ. पांगती 1995 तक शिक्षक रहे। सेवा में रहते हुए और सेवानिवृत्ति के बाद भी वह निरंतर लेखन से जुड़े रहे। उनके निधन की सूचना मिलते ही संपूर्ण जोहार घाटी में शोक छा गया।
डॉ.पांगती का जन्म 1 फरवरी 1937 को मुनस्यारी तहसील के भैंसखाल गांव में हुआ था। इतिहास से एमए करने के बाद उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज मुनस्यारी में शिक्षण कार्य शुरू किया। वह इसी विद्यालय से सेवानिवृत्त भी हुए। उन्होंने जोहार घाटी और भोटिया जनजाति विषय पर पीएचडी की। उन्होंने वर्ष 2000 में अपने नानासैम (मुनस्यारी) के शांतिकुंज स्थित घर पर जनजाति धरोहर संग्रहालय (ट्राइबल हेरिटेज म्यूजियम) की स्थापना की। यह एक निजी सांस्कृतिक संग्रहालय है। इसमें कुमाऊं और गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहने वाली भोटिया जनजाति की संस्कृति, परंपराएं और रहन-सहन पर आधारित इतिहास, यंत्र, बर्तन, हस्तशिल्प, पहनावा, खाद्यान्न आदि का संग्रह है।
डॉ. पांगती ने सेवानिवृत्ति के बाद न्यूजीलैंड सहित कई देशों का भ्रमण किया और जोहार घाटी एवं पहाड़ के पलायन को देखते हुए कई किताबें लिखीं। पिछले साल डॉ. पांगती के निर्देशन में हल्द्वानी में पहाड़ी होली गायन पर एलबम शूट किया गया। डॉ.पांगती को अपनी संस्कृति के संरक्षण की चिंता थी। उनके लेखन में यही बातें उभरकर सामने आईं। वह मुनस्यारी में रहने के दौरान ऊन कातने, पारंपरिक पकवान बनाने में व्यस्त रहते थे। जोहारी समाज के बारे में गंभीर चिंता रखने वाली इस शख्सियत के निधन से पूरी जोहारी घाटी में दुख की लहर है।
अपनी जड़ों को छोड़ना नहीं चाहिए
इतिहासकार डॉ. शेर सिंह पांगती का मानना था कि जो जड़ों से कट जाता है, उसको आने वाला कल और समाज भी भुला देता है और जो जड़ों को नहीं छोड़ता, उसे सदियों तक लोग याद रखते हैं। कलम के धनी डॉ. पांगती ने देश की चीन सीमा से लगे क्षेत्र से पलायन करने वाले लोगों को यह संदेश ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें उनकी संस्कृति से भी परिचित कराया। लोगों को उनकी बात समझ में आ गई और धीरे-धीरे पलायन में कमी भी आई।
तिब्बत व्यापार बंद होने से दुखी थे
वर्ष 1962 में भारत-तिब्बत व्यापार चीन के साथ युद्ध के कारण बंद हो गया था। मुनस्यारी के लोग ज्ञानिमा मंडी जाकर व्यापार करते थे। व्यापार बंद हुआ तो चीन सीमा से लगे क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ गई। रोजगार के अभाव में सीमा से लगे गांवों के लोग पलायन करने लगे। यह देखकर डॉ. शेर सिंह पांगती का मन विचलित होने लगा। सीमा के गांवों के इस तरह खाली होने पर डॉ. पांगती ने ठान लिया कि वह पलायन को अपने तरीके से रोकेंगे।
शोक में संग्रहालय तीन दिन बंद रहेगा
डॉ. शेर सिंह पांगती द्वारा स्थापित ट्राइबल हेरिटेज म्यूजियम का संचालन करने वाले उनके भतीजे विनोद पांगती ने बताया कि यह संग्रहालय तीन दिन तक शोक में बंद रहेगा। वर्ष 2000 में स्थापित इस संग्रहालय में पुराने बर्तनों से लेकर पारंपरिक वस्तुओं को रखा गया है। चीन सीमा पर रहने वाले बडे़ बुजुर्गों से मिलकर क्षेत्र की मान्यताओं, किस्सों को प्रकाशित कर पुस्तक के रूप में तैयार कर संग्रहालय में रखा गया है। अपने खानपान, वेशभूषा, बोली से अवगत कराने के लिए सीमांत के पुराने जीवन को उकेर कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास इसमें किया गया है। पुराने बर्तनों सहित मकानों की खोली, देली की नक्कासी एकत्रित कर संग्रहालय में रखी गई है। यह संग्रहालय आज पर्यटन विकास में मददगार साबित हो रहा है।
डॉ. पांगती की प्रमुख रचनाएं
जोहार के स्वर, मध्य हिमालय की भोटिया जनजाति, जोहार के शौका, चैती नखराली, जोहार शब्दकोष, कैलाश मानसरोवर यात्रा, जोहार की संस्कृति।
नाटक - श्रवण कुमार, सूतपुत्र कर्ण, एकलब्य, नारद मोह, परशुराम प्रतिज्ञा, लवकुश, राजा परीक्षित, किरातार्जुन, भीष्म प्रतिज्ञा।
कुमाऊंनी नाटक - छुरमल, गोलू देवता, बबुरबान।
कुमाऊंनी गीत नाटक - दादू है बेर भौजी होस्यार, बाल सदेऊ।
यात्रा संस्मरण - मिलम से माणा तक, ट्रेल पास अभियान 1994, मेरी कैलाश मानसरोवर यात्रा, नानासैम से तिकसेंन की पदयात्रा, नामचे बाजार की सैर, पंचाचूली के आर-पार।
कई लोगों ने डॉ. पांगती के निधन पर जताया शोक
डॉ.पांगती के निधन पर क्षेत्र के कई लोगों, शिक्षाविदों, नेताओं ने शोक जताते हुए इसे क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति बताया। शोक जताने वालों में केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद अजय टम्टा, काबीना मंत्री प्रकाश पंत, विधायक डीडीहाट विशन सिंह चुफाल, रुद्र सिंह पंडा, गोकर्ण मर्तोलिया, जगत मर्तोलिया, प्रयाग पालीवाल, पूरन पांडे, देवेंद्र सिंह, मनोहर दरियाल, डॉ. जनार्दन पांगती, लक्ष्मण पांगती, खुशाल धर्मशक्तू, हीरा चिराल, देव सिंह बोरा, तारा पांगती, श्रीराम धर्मशक्तू आदि शामिल थे।
घुघुता बोले कि करूं प्वथी कुर्र...
डॉ.पांगती ने ‘मन के उद्गार’ नाम से एक कविता में हिंदी भाषा और जोहारी बोली का अद्भुत मिश्रण किया था-घुघुता बोले कि करूं प्वथी कुर्र, कफुवा बोले कफू कफू सुन, दूर घने जंगल में सुनते, निहू निहू न्योली की धुन। बांह के बंधन कमर झुकाए, लय हुड़का संग कदम बढ़ेगा, लेकिन तुम संग उस कौतिक में, केवल शायद मैं न रहूंगा। डॉ. पांगती ने कई रचनाएं लिखी, लेकिन उनको कोई बड़ा सम्मान नहीं मिला।