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नई पीढ़ी को भी सिखा रहे ढोल बजाने की कला
Updated Sat, 02 Sep 2017 10:48 PM IST
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थल (पिथौरागढ़)। कुमालगांव निवासी 57 वर्षीय ढोलवादक इंद्र राम अब अपने बेटे नमन कुमार को भी ढोल बजाने की कला सिखा रहे हैं। उन्होंने अपने दोनों भाइयों पुष्कर राम और जगत राम को भी इस कौशल में माहिर किया। इस पूरे इलाके में इंद्र राम ही ऐसे ढोलवादक हैं, जिनको ढोल बजाने का पूरा कौशल आता है। वह ढोल को ही 22 प्रकार से बजा देते हैं।
मंदिर में किस तरह ढोल बजेगा, बारात में कैसे बजेगा, सामान्य पूजा के समय कैसे बजेगा, नामकरण के समय किस तरह की तान छोड़ी जाएगी, यह सारी कलाएं इंद्र राम को आती हैं। वह कहते हैं कि पहले उनके दादा सोबन राम फिर पिता आन राम ढोल बजाने का काम करते थे। जब इंद्र राम 13 वर्ष के थे तब उनके पिता का निधन हो गया। उन्होंने 15 वर्ष की उम्र में गले में ढोल डालकर बजाना शुरू कर दिया था।
इंद्र राम कहते हैं कि इस पेशे में कोई आमदनी नहीं है। पहले जब पहाड़ पर बैंडवाले नहीं पहुंचे थे तब उनको दूर-दूर से ढोल बजाने का आमंत्रण मिलता था, तब कमाई भी ठीक हो जाती थी, लेकिन अब काम भी कम मिलता है और आमदनी भी ज्यादा नहीं होती। वह कहते हैं कि चाहे कोई व्यक्ति बारात में ढोल न ले जाए, लेकिन उसे मंदिर में पूजा के समय तो ढोलवादक की जरूरत अवश्य पड़ेगी। ऐसे में इस कला का अस्तित्व समाप्त नहीं होगा। यह बात अलग है कि नई पीढ़ी के लोग इस विधा को अपनाना नहीं चाहते।
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इंद्र राम ने बताया कि राज्य सरकार की कलाकार पेंशन के लिए आवेदन किया, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। वह कहते हैं कि पेंशन देने के लिए क्या मानक बनाए गए हैं कहा नहीं जा सकता। इंद्र राम आज भी स्थानीय मेलों में अपनी टीम के साथ पहुंच जाते हैं। जब वह ढोल की तान पर थिरकते हैं तो लोग देखते रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह इस कला को जिंदा रखने के लिए कदम उठाए और कलाकारों को प्रोत्साहन दे।
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मंदिर में किस तरह ढोल बजेगा, बारात में कैसे बजेगा, सामान्य पूजा के समय कैसे बजेगा, नामकरण के समय किस तरह की तान छोड़ी जाएगी, यह सारी कलाएं इंद्र राम को आती हैं। वह कहते हैं कि पहले उनके दादा सोबन राम फिर पिता आन राम ढोल बजाने का काम करते थे। जब इंद्र राम 13 वर्ष के थे तब उनके पिता का निधन हो गया। उन्होंने 15 वर्ष की उम्र में गले में ढोल डालकर बजाना शुरू कर दिया था।
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इंद्र राम कहते हैं कि इस पेशे में कोई आमदनी नहीं है। पहले जब पहाड़ पर बैंडवाले नहीं पहुंचे थे तब उनको दूर-दूर से ढोल बजाने का आमंत्रण मिलता था, तब कमाई भी ठीक हो जाती थी, लेकिन अब काम भी कम मिलता है और आमदनी भी ज्यादा नहीं होती। वह कहते हैं कि चाहे कोई व्यक्ति बारात में ढोल न ले जाए, लेकिन उसे मंदिर में पूजा के समय तो ढोलवादक की जरूरत अवश्य पड़ेगी। ऐसे में इस कला का अस्तित्व समाप्त नहीं होगा। यह बात अलग है कि नई पीढ़ी के लोग इस विधा को अपनाना नहीं चाहते।
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इंद्र राम ने बताया कि राज्य सरकार की कलाकार पेंशन के लिए आवेदन किया, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। वह कहते हैं कि पेंशन देने के लिए क्या मानक बनाए गए हैं कहा नहीं जा सकता। इंद्र राम आज भी स्थानीय मेलों में अपनी टीम के साथ पहुंच जाते हैं। जब वह ढोल की तान पर थिरकते हैं तो लोग देखते रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह इस कला को जिंदा रखने के लिए कदम उठाए और कलाकारों को प्रोत्साहन दे।