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Pauri News: शिक्षक ने आपदा को अवसर में बदला, लहलहाने लगी बागवानी
Sat, 01 Aug 2026 05:59 PM IST
देहरादून ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी
Updated Sat, 01 Aug 2026 05:59 PM IST
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हर साल कर रहे है तीन से चार लाख की आमदनी
पौड़ी/थलीसैंण। पलायन और सीमित रोजगार की चुनौतियों के बीच जनपद में बागवानी मॉडल आजीविका का नया विकल्प बनता जा रहा है। विकासखंड थलीसैंण के सुकई (बंज्वाड़) गांव के दीनदयाल बिष्ट ने इसकी मिसाल पेश की है।
राइंका बैजरो में रसायन विज्ञान के प्रवक्ता दीनदयाल बिष्ट ने कोविड काल में अपने गांव की बंजर भूमि पर बागवानी का संकल्प लिया और वैज्ञानिक तरीके से सेब व कीवी की बागवानी शुरू की। शिक्षक के छोटे प्रयास से आज उनकी बागवानी दूसरों के लिए भी मिसाल बन गई है।
बिष्ट बताते हैं कि मनरेगा, उद्यान व कृषि विभाग की योजनाओं के जरिए बगीचे की शुरूआत घेरबाड़, जियोटैंक व हाइड्रो प्रोजेक्ट पाइपलाइन के जरिए की। बागवानी से हर सीजन में करीब तीन से चार लाख की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।
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डीएचओ मनोरंजन भंडारी ने बताया कि जनपद में सेब, कीवी समेत उच्च मूल्य वाली फल बागवानी के लिए काश्तकारों को जानकारी व सहायता मुहैया कराई जा रही है। पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु इन फसलों के लिए अत्यंत अनुकूल है। किसान वैज्ञानिक तकनीकों से कम जगह पर भी बेहतर उत्पादन कर सकते हैं।
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पौड़ी/थलीसैंण। पलायन और सीमित रोजगार की चुनौतियों के बीच जनपद में बागवानी मॉडल आजीविका का नया विकल्प बनता जा रहा है। विकासखंड थलीसैंण के सुकई (बंज्वाड़) गांव के दीनदयाल बिष्ट ने इसकी मिसाल पेश की है।
राइंका बैजरो में रसायन विज्ञान के प्रवक्ता दीनदयाल बिष्ट ने कोविड काल में अपने गांव की बंजर भूमि पर बागवानी का संकल्प लिया और वैज्ञानिक तरीके से सेब व कीवी की बागवानी शुरू की। शिक्षक के छोटे प्रयास से आज उनकी बागवानी दूसरों के लिए भी मिसाल बन गई है।
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बिष्ट बताते हैं कि मनरेगा, उद्यान व कृषि विभाग की योजनाओं के जरिए बगीचे की शुरूआत घेरबाड़, जियोटैंक व हाइड्रो प्रोजेक्ट पाइपलाइन के जरिए की। बागवानी से हर सीजन में करीब तीन से चार लाख की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।
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डीएचओ मनोरंजन भंडारी ने बताया कि जनपद में सेब, कीवी समेत उच्च मूल्य वाली फल बागवानी के लिए काश्तकारों को जानकारी व सहायता मुहैया कराई जा रही है। पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु इन फसलों के लिए अत्यंत अनुकूल है। किसान वैज्ञानिक तकनीकों से कम जगह पर भी बेहतर उत्पादन कर सकते हैं।