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संस्कृत के प्रचार और प्रसार पर दिए सुझाव
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केंद्रीय संस्कृत विवि के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर की पांचवीं वर्षगांठ पर उत्तराखंड विद्या वैभवम कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें देश व विदेश के मूर्धन्य विद्वानों ने ऑनलाइन प्रतिभाग कर संस्कृत के प्रचार और प्रसार सहित इसके संरक्षण पर अपने सुझाव दिए।
कार्यक्रम का शुभारंभ कर उत्तराखंड संस्कृत विवि की पूर्व कुलपति प्रो. सुधारानी पांडेय, परिसर के निदेशक प्रो. बनमाली बिश्वाल, पूर्व निदेशक प्रो. सर्वनारायण झा, पालिका अध्यक्ष कृष्णकांत कोटियाल एवं श्री रघुनाथ आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. शैलेंद्र नारायण कोटियाल ने संस्कृत भाषा के इतिहास और महत्व के बारे में बताया। प्रो. सुधारानी पांडेय ने कहा कि उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जिसकी द्वितीय भाषा संस्कृत है। यहां प्राचीन काल से ही शास्त्रों का अध्ययन और संरक्षण होता रहा है। कालीदास के ग्रंथ कुमार संभव में हिमालय का वर्णन किया गया है। परिसर के पूर्व निदेशक सर्वनारायण झा ने कहा कि उत्तराखंड एक संस्कृति और सद्भाव से युक्त राज्य है। प्राचीन शास्त्रों की रचना इसी धरती पर हुई। इसी कारण इसे देवभूमि कहा गया है। परिसर के वर्तमान निदेशक प्रो. बनमाली बिश्वाल ने कहा कि यहां इतने तीर्थ और मंदिर हैं कि प्रत्येक घर एक मंदिर के समान प्रतीत होता है। दिल्ली से प्रो. दीक्षित ने कहा कि यहां के लोगों में शास्त्रों के प्रति श्रद्धा भाव बहुत अधिक देखने को मिलता है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रो. वेदप्रकाश उपाध्याय ने परिसर को उत्तराखंड के गौरव का प्रतीक बताया। जर्मन से कार्यक्रम में जुडे़ प्रो. सदानंद दास ने बनमाली बिश्वाल के ग्रंथ की सराहना की। इस मौके पर ज्योतिर्मठ संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य, आचार्य रामदयाल मैदुली, सिद्धदात्री पंचाग के पंडित विनोद बिजल्वाण, डॉ. सभापति शर्मा (मेरठ), वेदाचार्य ज्योति प्रसाद उनियाल, गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार से प्रो. सोमदेव शतांशु, उत्तराखंड संस्कृत अकादमी हरिद्वार से शोध अधिकारी आदि ने भी विचार रखे।
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कार्यक्रम का शुभारंभ कर उत्तराखंड संस्कृत विवि की पूर्व कुलपति प्रो. सुधारानी पांडेय, परिसर के निदेशक प्रो. बनमाली बिश्वाल, पूर्व निदेशक प्रो. सर्वनारायण झा, पालिका अध्यक्ष कृष्णकांत कोटियाल एवं श्री रघुनाथ आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. शैलेंद्र नारायण कोटियाल ने संस्कृत भाषा के इतिहास और महत्व के बारे में बताया। प्रो. सुधारानी पांडेय ने कहा कि उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जिसकी द्वितीय भाषा संस्कृत है। यहां प्राचीन काल से ही शास्त्रों का अध्ययन और संरक्षण होता रहा है। कालीदास के ग्रंथ कुमार संभव में हिमालय का वर्णन किया गया है। परिसर के पूर्व निदेशक सर्वनारायण झा ने कहा कि उत्तराखंड एक संस्कृति और सद्भाव से युक्त राज्य है। प्राचीन शास्त्रों की रचना इसी धरती पर हुई। इसी कारण इसे देवभूमि कहा गया है। परिसर के वर्तमान निदेशक प्रो. बनमाली बिश्वाल ने कहा कि यहां इतने तीर्थ और मंदिर हैं कि प्रत्येक घर एक मंदिर के समान प्रतीत होता है। दिल्ली से प्रो. दीक्षित ने कहा कि यहां के लोगों में शास्त्रों के प्रति श्रद्धा भाव बहुत अधिक देखने को मिलता है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रो. वेदप्रकाश उपाध्याय ने परिसर को उत्तराखंड के गौरव का प्रतीक बताया। जर्मन से कार्यक्रम में जुडे़ प्रो. सदानंद दास ने बनमाली बिश्वाल के ग्रंथ की सराहना की। इस मौके पर ज्योतिर्मठ संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य, आचार्य रामदयाल मैदुली, सिद्धदात्री पंचाग के पंडित विनोद बिजल्वाण, डॉ. सभापति शर्मा (मेरठ), वेदाचार्य ज्योति प्रसाद उनियाल, गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार से प्रो. सोमदेव शतांशु, उत्तराखंड संस्कृत अकादमी हरिद्वार से शोध अधिकारी आदि ने भी विचार रखे।
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