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शहीद सैनिकों का भावपूर्ण स्मरण
Pauri
Updated Wed, 02 Oct 2013 05:39 AM IST
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लैंसडौन। गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट केंद्र ने मंगलवार को धूमधाम से 93वां स्थापना दिवस मनाया। सेंटर कमांडेंट ब्रिगेडियर विनोद रायजादा ने युद्ध स्मारक पर पुष्पचक्र अर्पित कर शहीदों का भावपूर्ण स्मरण किया। इस मौके पर कई प्रतियोगिताओं का आयोजन कर विजेताओं को ट्राफी और नकद पुरस्कार प्रदान किए गए।
उन्होंने कहा कि रेजीमेंट का शानदार इतिहास रहा है। कई स्तरों पर नए कीर्तिमान स्थापित किए गए हैं। रेजीमेेंट ने उच्च स्तरीय प्रशिक्षण में भी अपनी श्रेष्ठता की छाप छोड़ी है। कहा कि पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों से संवाद की स्थिति को बेहतर बनाकर पेंशन शिविरों के जरिए समस्याओं का समाधान किया गया है। रेजीमेंट का उद्देश्य बेहतर रिक्रूट को तराश कर एक कुशल सैनिक देश को देना है। खेल के क्षेत्र में भी रेजीमेंट ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। राष्ट्रीय तीरंदाजी में गढ़वाली सैनिकों ने स्वर्ण और रजत पदक जीते हैं। यूपी एरिया बाक्सिंग चैंपियनशिप में भी गढ़वाल राइफल के मुक्केबाजों ने सफलता कायम की है।
स्थापना दिवस पर आयोजित प्रतियोगिताओं में सर्वश्रेेष्ठ कंपनी एल्फा रही। उसे ट्राफी और पांच हजार का नकद पुरस्कार प्रदान किया गया। द्वितीय स्थान पर चार्ली कंपनी रही। जिसे तीन हजार का पुरस्कार मिला। प्रतियोगिताओं में डिप्टी कमांडेंट कर्नल अर्पित थापा, सेंटर एसएम पूरण सिंह आदि उपस्थित रहे।
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रेजीमेंट का इतिहास
अल्मोड़ा में 05 मई 1887 को गढ़वाल राइफल्स की स्थापना हुई। छह महीने अल्मोड़ा में रहने के बाद चार नवंबर 1887 को प्रथम गढ़वाली बटालियन कालौंडांडा पहुंची। वर्ष 1888 से 1894 तक दसवें वायसराय लार्ड लैंसडौन के नाम से 21 सितंबर 1890 को कालौंडांडा छावनी का नाम लैंसडौन कर दिया गया। 1901 में इसको 39वीं गढ़वाल राइफल्स और बंगाल इंफेंट्री नाम दिया गया। वर्ष 1921 में इसे रायल सेना का खिताब दिया गया। सेना की बहादुरी को देखते हुए डयूक आफ कैनाट ने इंडिया गेट की नींव रखते हुए दिल्ली में रेजीमेंट को रायल सेना की पदवी दी। तब से गढ़वाल रेजीमेंट का हर सैनिक दाहिने कंधे पर लाल डोरी पहनता है। एक अक्तूबर 1921 को लैंसडौन में गढ़वाल रेजीमेंट सेंटर की स्थापना की गई। ले. कर्नल के. हेंडरसन इसके प्रथम कमांडेंट बनेे।
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उन्होंने कहा कि रेजीमेंट का शानदार इतिहास रहा है। कई स्तरों पर नए कीर्तिमान स्थापित किए गए हैं। रेजीमेेंट ने उच्च स्तरीय प्रशिक्षण में भी अपनी श्रेष्ठता की छाप छोड़ी है। कहा कि पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों से संवाद की स्थिति को बेहतर बनाकर पेंशन शिविरों के जरिए समस्याओं का समाधान किया गया है। रेजीमेंट का उद्देश्य बेहतर रिक्रूट को तराश कर एक कुशल सैनिक देश को देना है। खेल के क्षेत्र में भी रेजीमेंट ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। राष्ट्रीय तीरंदाजी में गढ़वाली सैनिकों ने स्वर्ण और रजत पदक जीते हैं। यूपी एरिया बाक्सिंग चैंपियनशिप में भी गढ़वाल राइफल के मुक्केबाजों ने सफलता कायम की है।
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स्थापना दिवस पर आयोजित प्रतियोगिताओं में सर्वश्रेेष्ठ कंपनी एल्फा रही। उसे ट्राफी और पांच हजार का नकद पुरस्कार प्रदान किया गया। द्वितीय स्थान पर चार्ली कंपनी रही। जिसे तीन हजार का पुरस्कार मिला। प्रतियोगिताओं में डिप्टी कमांडेंट कर्नल अर्पित थापा, सेंटर एसएम पूरण सिंह आदि उपस्थित रहे।
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रेजीमेंट का इतिहास
अल्मोड़ा में 05 मई 1887 को गढ़वाल राइफल्स की स्थापना हुई। छह महीने अल्मोड़ा में रहने के बाद चार नवंबर 1887 को प्रथम गढ़वाली बटालियन कालौंडांडा पहुंची। वर्ष 1888 से 1894 तक दसवें वायसराय लार्ड लैंसडौन के नाम से 21 सितंबर 1890 को कालौंडांडा छावनी का नाम लैंसडौन कर दिया गया। 1901 में इसको 39वीं गढ़वाल राइफल्स और बंगाल इंफेंट्री नाम दिया गया। वर्ष 1921 में इसे रायल सेना का खिताब दिया गया। सेना की बहादुरी को देखते हुए डयूक आफ कैनाट ने इंडिया गेट की नींव रखते हुए दिल्ली में रेजीमेंट को रायल सेना की पदवी दी। तब से गढ़वाल रेजीमेंट का हर सैनिक दाहिने कंधे पर लाल डोरी पहनता है। एक अक्तूबर 1921 को लैंसडौन में गढ़वाल रेजीमेंट सेंटर की स्थापना की गई। ले. कर्नल के. हेंडरसन इसके प्रथम कमांडेंट बनेे।