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दो वक्त की रोटी के लिए मजदूरों की जद्दोजहद

Mon, 02 May 2016 12:42 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी। Updated Mon, 02 May 2016 12:42 AM IST
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Workers' struggle for two square meals
मजदूर ‌दिवस - फोटो : अमर उजाला
मई दिवस पर मजदूरों के हितों की रक्षा और अधिकारों की लड़ाई के लिए देशभर में तमाम मंचों से भले ही बड़ी बड़ी बातें हुई हों, लेकिन मजदूर दबका असली में दो वक्त की रोटी के के लिए जद्दोजहद कर रहा है। हल्द्वानी एवं आसपास में हजारों हुनरमंद मजदूर सड़कों पर आ गए हैं। प्रशासन के भवन निर्माण पर रोक लगाने, गौला में खनन कार्य बंद होने और गेहूं कटाई में मशीनों का इस्तेमाल होने से हजारों हुनरमंद मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। काम की तलाश में मजदूरों का पलायन शुरू होने लगा है।
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गौला नदी में करीब 30 हजार मजदूर खनन कार्य से जुड़े हैं। रायल्टी विवाद में क्रशरों ने 30 अप्रैल से उप खनिजों की खरीद फरोख्त बंद कर दी है। जिससे गौला खनन बंद हो गया है। मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। अधिकांश मजदूर बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश से रोजगार की तलाश में यहां तक पहुंचे हैं। अधिकांश मजदूरों का परिवार साथ है और गौला नदी के किनारे झोपड़ियां डालकर रहते हैं। गर्मी में पानी के संकट को देखते हुए प्रशासन ने निर्माण कार्यों पर भी रोक लगा दी है। निर्माण कार्यों में हजारों हुनरमंद मजदूर और मिस्त्री जुड़े हैं। निर्माण बंद होने से सभी सड़क पर आ गए हैं। 
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मजदूरों के मुताबिक इस बार गेहूं की कटाई में भी काम नहीं मिला। सूखा पड़ने से फसल अच्छी नहीं हुई। भाबर में गेहूं की कटाई के लिए मजदूरों की जगह मशीनों ने ले ली है। काम नहीं मिलने से मजदूर तबका हताश है। अधिकांश मजदूरों ने पलायन भी शुरू कर दिया है। 
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वीरान होने लगे मजदूरों के अड्डे
हल्द्वानी। बरेली रोड अब्दुल्ला बिल्डिंग और ऊंचापुल के पास मजदूरों की मंडी लगती है। यहां रोजाना हजारों मजदूर काम की तलाश में सुबह सात बजे से एकत्र होने शुरू हो जाते हैं। सभी मजदूर और मिस्त्री अपने-अपने काम में माहिर होते हैं। लेकिन आजकल मंडी में सुनसानी है। गिनती के मजदूर पहुंचे रहे हैं और उन्हें भी काम नहीं मिल रहा है। दोपहर तक बैठने के बाद वापस लौट रहे हैं। बरेली रोड अब्दुल्ला बिल्डिंग के पास औसतन एक हजार मजदूर रोजाना आते हैं। लेकिन पिछले एक सप्ताह से इनकी संख्या पांच सौ से कम हो गई है। आमतौर पर मिस्त्री की दिहाड़ी छह सौ रुपये और मजदूर की चार सौ रुपये होती है। लेकिन आजकल मिस्त्री पांच सौ रुपये और मजदूरों को तीन सौ रुपये में भी काम नहीं मिल रहा है। 

कभी नहीं देखी ऐसी बेरोजगारी
मंगल पड़ाव में रहने वाला गुड्डू बताता है ऐसी बेरोजगारी पहले कभी नहीं देखी। आठ साल से अड्डे पर काम के लिए आता है। बरसात में काम कम हो जाता है, लेकिन आजकल तो बरसात से बुरे दिन हो गए हैं। प्रशासन के निर्माण में रोक लगाने से सबसे अधिक बेरोजगारी हो गई है। 


बस सोशल मीडिया तक सीमित रहा मई दिवस
मई दिवस पर एक्टू और कुछ ट्रेड यूनियनें ने कार्यक्रम किए। बाकी लोग सोशल मीडिया पर मजदूरों के प्रति सहानुभूति के साथ मई दिवस की बधाई देते नजर आए। बधाईयां देने वालों में अधिकांश वो लोग दिखे जो कभी एसी घरों, आफिस और गाड़ियों से बाहर नहीं निकलते। मजदूर के सामने दिखने पर ही अपना रास्ता बदल लेते हैं। सोशल मीडिया पर मजदूर दिवस की बधाइयां देने वालों की होड़ मची रही।
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