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है धरा पर कोई भगीरथ, जो इन पितरों को मुक्ति दिलाए

Thu, 14 Sep 2017 02:16 AM IST
राजेंद्र सिंह बिष्ट बबली
राजेंद्र सिंह बिष्ट बबली Updated Thu, 14 Sep 2017 02:16 AM IST
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There is no blaze on the beat, which will liberate these ancestors.
हल्‍द्वानी राजपुरा स्थित शमशान घाट में रखे अस्थि कलश। - फोटो : amar ujala

महर्षि भगीरथ की कथा आपने सुनी होगी। अपने पितरों को मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने कठोर तप किया और गंगा को पृथ्वी पर ले आए। इस कारण गंगा को भागीरथी नाम से भी जाना जाता है। लेकिन समाज ने महर्षि भागीरथ से प्रेरणा नहीं ली। लोगों के पास इतनी फुर्सत भी नहीं कि परिजनों के दाह संस्कार के बाद उनके फूल चुनने जाएं और उन्हें सिराहें।

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हल्द्वानी राजपुरा स्थित श्मशान घाट एवं बरसाती नहर के पास स्थित क्रियाशाला में  कुछ अभागे ऐसे भी हैं जिनकी अस्थियां अभी भी मिट्टी की हांडी में पड़ी हुई हैं। आत्माएं तड़प रही होगी कि अपना कोई आएगा और मुक्ति दिलाएगा लेकिन न अपनों को चिंता है न ही समाज सेवा का दंभ भरने वाले लोगों या संस्थाओं को इससे मतलब। 
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पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का मतलब यही है कि पितरों की आत्मा को शांति मिले। माना जाता है कि श्राद्ध पक्ष में पितर घर के आसपास ही रहते हैं। वे सिर्फ तर्पण की आस रखते हैं। लेकिन अपने शहर में राजपुरा स्थित श्मशान घाट और बरसाती नहर स्थित क्रियाशाला में मिट्टी की हांडी में उन लोगों की अस्थियां रखी गई हैं जो परलोक सिधार गए हैं।
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कुछ तो बदतर स्थिति में हैं। इन अस्थि कलशों को गंगा में प्रवाहित नहीं किया जा सका है। मान्यता है कि जब तक व्यक्ति की अस्थियों को पूरे विधि विधान से गंगा में प्रवाहित न किया जाय, तब तक मरने वाले को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती हैं।

राजपुरा स्थित श्मशान घाट में पिछले 23 सालों से देखरेख कर रहे भृगरासन प्रसाद का कहना हैं कि लोग दाह संस्कार करने के बाद जब फूल चुनने आते तब उन्हें बताया जाता है कि इन अस्थि कलश को जल्द से जल्द ले जाकर गंगा में प्रवाहित कर दें। बावजूद इसके श्मशान घाट में दो दर्जन से अधिक अस्थि कलश रखे पड़े हैं। इनका कई महीनों बाद भी विसर्जन नहीं हुआ है। 

 
दस दिन में प्रवाहित होनी चाहिए अस्थियां

आचार्य नवीन चंद्र जोशी जी का कहना हैं कि  निर्णय सिंधु के तृतीय परिच्छेद में लिखा है कि दशाहस्यान्तरे यस्य गंगातोयेस्थि मज्जति। गंगायां मरणं यादृक तादृक फलमाप्नुयात॥  अर्थात दस दिन के भीतर जिसकी अस्थि गंगा जल में प्रवाहित हो जाती है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

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