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जीते जी पुण्य कमाया, मरने पर भी याद रखोगे
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डॉ. संतोष मिश्र , पत्नी, माता पिता, देहदान
विकास यादव
हल्द्वानी। ‘मंजिल तो तेरी यहीं थी, इतनी देर लगा दी आते-आते, क्या मिला तुझे जिंदगी से, अपनों ने ही जला दिया जाते-जाते।’ श्मशान घाट के बाहर यह वाक्य लिखा मिल जाता है। लेकिन अपने शहर के कुछ ऐसे दानवीर भी हैं जिन्होंने अपने जीते जी अपना शरीर ही दूसरों के लिए दान कर दिया। इनमें 11 ऐसे लोग हैं जो मरणोपरांत देह दान कर चुके हैं जबकि 171 लोग ऐसी घोषणा कर चुके हैं।
मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी में 2010 से देहदान की सुविधा शुरू हुई थी। मेडिकल कॉलेज को मिलने वाली देह का जूनियर, पीजी और रिसर्च छात्र पूरा आदर सम्मान करते हैं। यह देह उनके लिए शिक्षक के समान होता है। उन्हें शपथ दिलाई जाती है कि वह इस देह के ऋणी रहेंगे। छात्र अपने इस शिक्षक की ओर पीठ करके नहीं खड़े हो सकते।
ये हैं देह दानवीर
मैंने, पत्नी गीता मिश्र, पिता श्रीनिवास मिश्र और मां कमला मिश्र ने 2013 में देहदान की घोषणा की। मैं तब से ही लोगों को देहदान के लिए जागरूक कर रहा हूं। करीब 100 लोगों ने इससे प्रेरणा लेकर देहदान की घोषणा की है। - डॉ. संतोष मिश्र, एसोसिएट प्रोफेसर हिंदी, एमबीपीजी कॉलेज
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मैंने 2012 में अंगदान और देहदान की घोषणा की। मरणोपरांत शरीर का हमारे लिए कोई प्रयोग नहीं होता है। हमारे शरीर के अंग किसी के काम आ जाएं, यही हमारे लिए पुण्य है।
- विजेंद्र सिंह, शिक्षक, रुद्रपुर
मैंने 2017 में देहदान की घोषणा की। इंसान को जीने के लिए सब कुछ न्यौछावर करना पड़ता है। मरणोपरांत जला या दफना दिया जाता है। अंगदान और देहदान से किसी का भला हो जाए इससे बढ़कर और क्या है।
- उमेश बिनवाल, अनुदेशक, आईटीआई, हल्द्वानी
मैंने 2015 में अंगदान और देहदान की घोषणा की। इससे मेडिकल के छात्र शरीर का अच्छा अध्ययन कर सकेंगे। - विजय शर्मा, हल्द्वानी
इनकी देह मिल चुकी है मेडिकल कॉलेज को
चंदन सिंह चुफाल, बृजेंद्र सिंह रावत, होतीलाल, बनारसी लाल, जकाउल हक, गिरीश चंद्र चंदोला, जानकी प्रसाद जोशी, विष्णु दत्त उपाध्याय, राधेश्याम, हेमलता सामंत, रजनी जोशी
कोट
योग्य डॉक्टर तैयार करने में देहदान का महत्व है। यह मरणोपरांत भी समाजसेवा करने के समान है। छात्रों के लिए मृत शरीर एक शिक्षक के समान होता है।
- डॉ. एके सिंह, विभागाध्यक्ष, एनाटॉमी, मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी
देहदान की प्रक्रिया
देहदान करने के लिए 10 रुपये का स्टांप लेकर नोटरी से शपथ पत्र पर घोषणा करानी होती है। इसके बाद प्रमाणित कराना होगा। शपथ पत्र पर परिवार के दो सदस्यों के हस्ताक्षर कराने होंगे। शपथ पत्र प्राचार्य मेडिकल कॉलेज या एनाटॉमी विभागाध्यक्ष मेडिकल कॉलेज और एक कॉपी जिलाधिकारी को प्रेषित करनी होती है। कॉलेज के एनाटॉमी विभाग में शरीर के अंगों को कई सालों तक सुरक्षित रखा जाता है। खास तरह के लिक्विड में शरीर को सैकड़ों साल तक भी सुरक्षित रख सकते हैं।
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हल्द्वानी। ‘मंजिल तो तेरी यहीं थी, इतनी देर लगा दी आते-आते, क्या मिला तुझे जिंदगी से, अपनों ने ही जला दिया जाते-जाते।’ श्मशान घाट के बाहर यह वाक्य लिखा मिल जाता है। लेकिन अपने शहर के कुछ ऐसे दानवीर भी हैं जिन्होंने अपने जीते जी अपना शरीर ही दूसरों के लिए दान कर दिया। इनमें 11 ऐसे लोग हैं जो मरणोपरांत देह दान कर चुके हैं जबकि 171 लोग ऐसी घोषणा कर चुके हैं।
मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी में 2010 से देहदान की सुविधा शुरू हुई थी। मेडिकल कॉलेज को मिलने वाली देह का जूनियर, पीजी और रिसर्च छात्र पूरा आदर सम्मान करते हैं। यह देह उनके लिए शिक्षक के समान होता है। उन्हें शपथ दिलाई जाती है कि वह इस देह के ऋणी रहेंगे। छात्र अपने इस शिक्षक की ओर पीठ करके नहीं खड़े हो सकते।
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ये हैं देह दानवीर
मैंने, पत्नी गीता मिश्र, पिता श्रीनिवास मिश्र और मां कमला मिश्र ने 2013 में देहदान की घोषणा की। मैं तब से ही लोगों को देहदान के लिए जागरूक कर रहा हूं। करीब 100 लोगों ने इससे प्रेरणा लेकर देहदान की घोषणा की है। - डॉ. संतोष मिश्र, एसोसिएट प्रोफेसर हिंदी, एमबीपीजी कॉलेज
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मैंने 2012 में अंगदान और देहदान की घोषणा की। मरणोपरांत शरीर का हमारे लिए कोई प्रयोग नहीं होता है। हमारे शरीर के अंग किसी के काम आ जाएं, यही हमारे लिए पुण्य है।
- विजेंद्र सिंह, शिक्षक, रुद्रपुर
मैंने 2017 में देहदान की घोषणा की। इंसान को जीने के लिए सब कुछ न्यौछावर करना पड़ता है। मरणोपरांत जला या दफना दिया जाता है। अंगदान और देहदान से किसी का भला हो जाए इससे बढ़कर और क्या है।
- उमेश बिनवाल, अनुदेशक, आईटीआई, हल्द्वानी
मैंने 2015 में अंगदान और देहदान की घोषणा की। इससे मेडिकल के छात्र शरीर का अच्छा अध्ययन कर सकेंगे। - विजय शर्मा, हल्द्वानी
इनकी देह मिल चुकी है मेडिकल कॉलेज को
चंदन सिंह चुफाल, बृजेंद्र सिंह रावत, होतीलाल, बनारसी लाल, जकाउल हक, गिरीश चंद्र चंदोला, जानकी प्रसाद जोशी, विष्णु दत्त उपाध्याय, राधेश्याम, हेमलता सामंत, रजनी जोशी
कोट
योग्य डॉक्टर तैयार करने में देहदान का महत्व है। यह मरणोपरांत भी समाजसेवा करने के समान है। छात्रों के लिए मृत शरीर एक शिक्षक के समान होता है।
- डॉ. एके सिंह, विभागाध्यक्ष, एनाटॉमी, मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी
देहदान की प्रक्रिया
देहदान करने के लिए 10 रुपये का स्टांप लेकर नोटरी से शपथ पत्र पर घोषणा करानी होती है। इसके बाद प्रमाणित कराना होगा। शपथ पत्र पर परिवार के दो सदस्यों के हस्ताक्षर कराने होंगे। शपथ पत्र प्राचार्य मेडिकल कॉलेज या एनाटॉमी विभागाध्यक्ष मेडिकल कॉलेज और एक कॉपी जिलाधिकारी को प्रेषित करनी होती है। कॉलेज के एनाटॉमी विभाग में शरीर के अंगों को कई सालों तक सुरक्षित रखा जाता है। खास तरह के लिक्विड में शरीर को सैकड़ों साल तक भी सुरक्षित रख सकते हैं।