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अपनी बोली, भाषा और संस्कृति को बढ़ावा दें 

Mon, 30 May 2016 12:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल
अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल Updated Mon, 30 May 2016 12:00 AM IST
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Its bid, to promote the language and culture
संस्कृति - फोटो : अमर उजाला
कुमाऊं विवि के हिंदी विभाग एवं पहाड़ संस्था द्वारा उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र देहरादून के सहयोग से हरमिटेज भवन मेें चल रही उत्तराखंड की भाषाओं के व्यावहारिक शब्दों विषयक कार्यशाला रविवार को संपन्न हो गयी। वक्ताओं ने कहा कि जो समाज अपनी बोली, भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने में संकोच महसूस करता है, उस समाज की परंपरा व संस्कृति लुप्त हो जाती है। एक बोली-भाषा का लुप्त होने का मतलब हजारों साल पुरानी परंपरा और संस्कृति का समाप्त होना है। 
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वक्ताओं ने कहा कि हर माह दुनिया भर में दो बोलियां लुप्त हो रही हैं। उत्तराखंड की कुछ बोलियों को बोलने वालों की संख्या एक हजार से भी कम रह गई है, जिसमें माच्छी, राजी, रंगल्यू आदि मुख्य हैं। वक्ताओं ने कहा कि समाज ने अंग्रेजी को श्रेष्ठता का दर्जा दे दिया है, जबकि हिंदी व कुमाऊंनी को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है। अंग्रेजी अच्छा रोजगार प्राप्त करने की भाषा हो सकती हैै, लेकिन वह हमारी भावनाओं, परंपराओं व संस्कृति में शामिल नहीं हो सकती है।
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भाषाविद् तारा चंद्र त्रिपाठी ने वैश्विक संदर्भ में भाषाओं की वर्तमान स्थिति, तोबदन ने हिमालयी भाषाओं, प्रो. शेर सिंह बिष्ट ने उत्तराखंड के वर्तमान भाषायी परिदृश्य, प्रो. उमा भट्ट ने शब्द कोष के उद्देश्य के बारे में बताया। अंबरीष चमोली ने गढ़वाली शब्दकोष, डॉ. जगदीश पंत ने बुक्सा शब्दावली, राजेश प्रसाद ने कुमाऊंनी शब्दावली, रिंकी राणा ने थारु शब्दावली, कैलाश लोहनी, रमाकांत बेंजवाल व कल्पना पंत ने शब्दकोष निर्माण पर महत्वपूर्ण टिप्स दिए। 
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इसके अलावा प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही, डीआईजी पीएस सैलाल, प्रो. ओंकारनाथ कौल, प्रो. शेखर पाठक, प्रो. उमा भट्ट, प्रो. चंद्रकला रावत, डॉ. हयात सिंह रावत, शांति नबियाल व डॉ. प्रयाग जोशी ने सामूहिक रुप से उत्तराखंड की भाषाओं की विशिष्ट ध्वनियों पर चर्चा की। संचालन प्रो. चंद्रकला रावत ने किया। कुलपति प्रो. होशियार सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कार्यशाला को संपन्न कराने में हिंदी विभाग तथा पहाड़ संस्था के प्रतिनिधियों ने सहयोग दिया। 
 
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