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‘हरदा’ सुलझा नहीं पाए मयूख की पहेली
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
Updated Wed, 01 Jun 2016 11:13 PM IST
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मयूख महर की पहेली मुख्यमंत्री हरीश रावत से सुलझाये नहीं सुलझ रही है। योजना आयोग की कुर्सी मयूख को फिर थमा दी गई है, जबकि मयूख इस कुर्सी को पहले ही ठुकरा चुके हैं। मयूख के लिए राहत की बात यह है कि इस बार उन्हें सीमांत क्षेत्र के विकास के लिए गठित अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष पद का दायित्व दिया गया है। यह तब है जबकि सीमांत क्षेत्र के विकास की विभिन्न योजनाओं पर लगातार कैंची चल रही है।
मयूख महर को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष का जिम्मा सौंपा था। मयूख इससे संतुष्ट नहीं थे। लिहाजा, पूरे दो साल तक मयूख ने इस दायित्व को संभाला नहीं नहीं। अब नीति आयोग के दौर में योजना आयोग की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में मयूख को फिर से योजना आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी थमा दी गई है। मयूख खुद इस पर कुछ नहीं कह रहे हैं पर उनके नजदीकी लोगों का कहना है कि मयूख अब फिर इस पद से दूर ही रहेंगे।
राहत की बात यह कि मयूख को इस बार सीमांत क्षेत्र विकास अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष जरूर बन गए हैं। हालांकि , मयूख ने इस पर भी अभी पत्ते नहीं खोले हैं। हरीश रावत के मरजीवड़े विधायकों में से करीब-करीब सबका यही हाल है। अंदरखाने इन विधायकों की शिकायत है कि अपने नेता के होते हुये भी सबसे कम फायदा अगर किसी को हुआ है तो वे ही इस सूची में शुमार होंगे। संसदीय सचिव बनाकर रावत ने इन विधायकों को मनाने की कोशिश जरूर की थी, पर यह दाव भी पूरी तरह से चल नहीं पाया है।
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इसके उलट, राजेंद्र भंडारी से लेकर बसपा के विधायकों तक को हरीश रावत की मेहरबानी नसीब हुई है। ऐसे में हरीश रावत केकैंप के विधायकों का असंतोष और बढ़ा है। इतना होने पर भी ये विधायक मौके की नजाकत को भांपते हुये मामले को आगे बढ़ाने के पक्ष में नही है।
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मयूख महर को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष का जिम्मा सौंपा था। मयूख इससे संतुष्ट नहीं थे। लिहाजा, पूरे दो साल तक मयूख ने इस दायित्व को संभाला नहीं नहीं। अब नीति आयोग के दौर में योजना आयोग की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में मयूख को फिर से योजना आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी थमा दी गई है। मयूख खुद इस पर कुछ नहीं कह रहे हैं पर उनके नजदीकी लोगों का कहना है कि मयूख अब फिर इस पद से दूर ही रहेंगे।
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राहत की बात यह कि मयूख को इस बार सीमांत क्षेत्र विकास अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष जरूर बन गए हैं। हालांकि , मयूख ने इस पर भी अभी पत्ते नहीं खोले हैं। हरीश रावत के मरजीवड़े विधायकों में से करीब-करीब सबका यही हाल है। अंदरखाने इन विधायकों की शिकायत है कि अपने नेता के होते हुये भी सबसे कम फायदा अगर किसी को हुआ है तो वे ही इस सूची में शुमार होंगे। संसदीय सचिव बनाकर रावत ने इन विधायकों को मनाने की कोशिश जरूर की थी, पर यह दाव भी पूरी तरह से चल नहीं पाया है।
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इसके उलट, राजेंद्र भंडारी से लेकर बसपा के विधायकों तक को हरीश रावत की मेहरबानी नसीब हुई है। ऐसे में हरीश रावत केकैंप के विधायकों का असंतोष और बढ़ा है। इतना होने पर भी ये विधायक मौके की नजाकत को भांपते हुये मामले को आगे बढ़ाने के पक्ष में नही है।