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Nainital News: कोविड में अपनों को खोकर भी मरीजों की सेवा में जुटी रहीं नर्सें
Mon, 12 May 2025 02:30 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Mon, 12 May 2025 02:30 AM IST
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हल्द्वानी। नर्से किसी भी अस्पताल, क्लीनिक, नर्सिंग होम की प्रमुख रीढ़ हैं। मरीजों की देखभाल, दवाएं देने और मरीज की निगरानी में प्रमुख हाथ नर्सों का ही होता है। कई नर्से ऐसी भी हैं जिन्हें विपरीत परिस्थितियों में काम करने का अनुभव है। कई तो अपनों को खोकर भी समाजसेवा के काम में मिसाल बनी हैं।
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फोटो-
कोविड के समय इमरजेंसी डील करने वाली बेस अस्पताल की नर्स दया सिजवाली के व्यवहार के लोग कायल हैं। अल्मोड़ा, रानीखेत के बाद वर्ष 2013 से बेस अस्पताल में कार्यरत हैं। 2020 में कोविड के समय दया की इमरजेंसी डयूटी थी। इसी दौरान उन्हें और उनके पति को कोविड हो गया था। दिल्ली में इलाज के दौरान पति की तो मौत हो गई थी, उसके बाद भी दया ने डयूटी को महत्ता दी। वह बताती हैं कि 12-12 घंटे डयूटी रहती थी। उस दौरान घर में दो बच्चों की व्यवस्था करके डयूटी देती थीं। वर्तमान में वह मैटर्न बन गई हैं और स्टाफ को मरीजों के साथ अच्छा व्यवहार करने की सलाह देने के साथ, सभी की डयूटी और अस्पताल का मैनेजमेंट भी संभाल रहीं हैं।
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फोटो-
पुष्पा राजवंश 1998 से सुशीला तिवारी अस्पताल में कार्यरत हैं। उस समय छोटा अस्पताल था और मरीज कम थे तो दबाव भी कम था। वह बताती हैं कि मेडिकल कॉलेज बनने के बाद अब मरीजों की संख्या दबाव रहता है। कोविड के समय पुष्पा को ट्रॉमा आईसीयू का इंचार्ज बनाया गया था। यह वह समय था जब लोग अपनों के पास भी जाना नहीं चाहते थे। ऐसी जगह हर समय डेड बॉडी आने का क्रम लगा रहता था, वहां कोई नहीं रुकता था। तब पुष्पा ने न केवल कोविड मरीजों की देखभाल की, बल्कि कुछ मरीज जिनके घर के लोग खुद नहीं आ सकते थे, अपने घर से भोजन बनाकर दिया। वर्तमान में पुष्पा एसटीएच के टीबी चेस्ट वार्ड की इंचार्ज हैं और गंभीर मरीजों की देखभाल का जिम्मा बखूबी संभाल रही हैं।
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फोटो-
कोविड के समय इमरजेंसी डील करने वाली बेस अस्पताल की नर्स दया सिजवाली के व्यवहार के लोग कायल हैं। अल्मोड़ा, रानीखेत के बाद वर्ष 2013 से बेस अस्पताल में कार्यरत हैं। 2020 में कोविड के समय दया की इमरजेंसी डयूटी थी। इसी दौरान उन्हें और उनके पति को कोविड हो गया था। दिल्ली में इलाज के दौरान पति की तो मौत हो गई थी, उसके बाद भी दया ने डयूटी को महत्ता दी। वह बताती हैं कि 12-12 घंटे डयूटी रहती थी। उस दौरान घर में दो बच्चों की व्यवस्था करके डयूटी देती थीं। वर्तमान में वह मैटर्न बन गई हैं और स्टाफ को मरीजों के साथ अच्छा व्यवहार करने की सलाह देने के साथ, सभी की डयूटी और अस्पताल का मैनेजमेंट भी संभाल रहीं हैं।
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पुष्पा राजवंश 1998 से सुशीला तिवारी अस्पताल में कार्यरत हैं। उस समय छोटा अस्पताल था और मरीज कम थे तो दबाव भी कम था। वह बताती हैं कि मेडिकल कॉलेज बनने के बाद अब मरीजों की संख्या दबाव रहता है। कोविड के समय पुष्पा को ट्रॉमा आईसीयू का इंचार्ज बनाया गया था। यह वह समय था जब लोग अपनों के पास भी जाना नहीं चाहते थे। ऐसी जगह हर समय डेड बॉडी आने का क्रम लगा रहता था, वहां कोई नहीं रुकता था। तब पुष्पा ने न केवल कोविड मरीजों की देखभाल की, बल्कि कुछ मरीज जिनके घर के लोग खुद नहीं आ सकते थे, अपने घर से भोजन बनाकर दिया। वर्तमान में पुष्पा एसटीएच के टीबी चेस्ट वार्ड की इंचार्ज हैं और गंभीर मरीजों की देखभाल का जिम्मा बखूबी संभाल रही हैं।
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