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फैसला आने से पहले राष्ट्रपति शासन हटाने को लेकर केंद्र को भी चेताया

Wed, 20 Apr 2016 10:55 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल
अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल Updated Wed, 20 Apr 2016 10:55 PM IST
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Before the decision to remove the center also warned of President's Rule
हाईकोर्ट के अधिवक्ता - फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के मामले पर सुनवाई कर रहे हाईकोर्ट ने बुधवार को तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि असीमित शक्ति किसी को भी भ्रष्ट कर सकती है फिर चाहे वह राष्ट्रपति ही क्यों न हों। राष्ट्रपति के निर्णय की भी समीक्षा हो सकती है, वह कोई राजा नहीं हैं। उनके फैसले भी गलत हो सकते हैं। केंद्र सरकार के वकील एवं असिस्टेंट सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता के उस तर्क पर कोर्ट ने यह टिप्पणी की जिसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के निर्णय की समीक्षा नहीं की जा सकती है। 
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वहीं, हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को भी इशारों में चेता दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि हमें उम्मीद है कि राष्ट्रपति शासन को चुनौती देने वाली याचिका का निपटारा न होने तक केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन हटाकर कोर्ट को उकसाने का काम नहीं करेगी। मामले में बृहस्पतिवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।
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मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ ने बुधवार को राष्ट्रपति के संबंध में यह टिप्पणी तब की जब केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 356 को लागू करने का फैसले अपने विवेक के आधार पर किया है। इस पर पीठ ने कहा कि लोग गलत फैसले भी कर सकते हैं, चाहे वे राष्ट्रपति हों या फिर जज। राष्ट्रपति के समक्ष जो तथ्य पेश किए गए, उन्होंने उसके आधार पर फैसला लिया, लेकिन इसकी समीक्षा हो सकती है।
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सुनवाई के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आशंका जाहिर की कि अदालत का फैसला आने या रिजर्व किए जाने से पहले ही केंद्र सरकार उत्तराखंड से राष्ट्रपति शासन हटा सकती है। इस पर पीठ ने केंद्र को चेताते हुए कहा कि हमें उम्मीद है कि वे ऐसा करके हमें नहीं उकसाएंगे। रावत ने राष्ट्रपति शासन को चुनौती दी है। सिंघवी ने आशंका जाहिर की कि केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि अनुच्छेद 356 पर 17 अप्रैल तक कुछ नहीं किया जाएगा, लेकिन अब यह तिथि बीत चुकी है।

अदालत में पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस बारे में कोई पुष्टि नहीं की कि राष्ट्रपति शासन हटाने को लेकर केंद्र ने कोई फैसला लिया है या नहीं। सिंघवी ने कहा कि कोर्ट का फैसला आने या रिजर्व रहने तक राष्ट्रपति शासन नहीं हटाया जाना चाहिए और न ही विपक्ष को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। अब मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को होगी और रावत की राष्ट्रपति शासन को चुनौती देने वाली याचिका पर भी पीठ फैसला इसी दिन सुरक्षित कर सकती है।

क्या ऐसे काम करती है भारत सरकार
कोर्ट ने स्पीकर पर लगाए आरोप को लेकर भी केंद्र की जमकर खिंचाई की। केंद्र की तरफ से दावा किया गया था कि भाजपा विधायक भीम लाल आर्य को अयोग्य करार दिए जाने की शिकायत को स्पीकर ने लटकाए रखा, जबकि हकीकत में भीम लाल के खिलाफ शिकायत राष्ट्रपति शासन लागू करने के बाद की गई थी। कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद शिकायत 5 अप्रैल को क्यों दी गई। हम सोच रहे थे कि स्पीकर ने दोहरे मापदंड क्यों अपनाए (कि कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को निलंबित कर दिया, लेकिन भीम लाल पर फैसले को लंबित रखा। यह बहुत खतरनाक है। आप स्पीकर पर खतरनाक आरोप लगा रहे हैं। क्या भारत की सरकार इस तरह काम करती है। आपको इस बारे में क्या कहना है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि राष्ट्रपति ने इसे (स्पीकर के आचरण को) भी राष्ट्रपति शासन की मंजूरी के लिए आधार माना है। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बृहस्पतिवार को इस मामले में केंद्र की ओर से अदालत में सफाई पेश करेंगे। 


स्टिंग पर रावत पर उठाए सवाल
स्टिंग ऑपरेशन को लेकर कोर्ट ने हरीश रावत पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि रावत के आचरण के देखते हुए अनुच्छेद 356 लागू करना क्यों गलत है। इस पर सिंघवी ने रावत के स्टिंग ऑपरेशन को ब्लैकमेलिंग का तरीका बताते हुए हरियाणा के बूटा सिंह गवर्नमेंट का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि वहां 6 हफ्ते तक स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर ब्लैकमेलिंग का कार्य चलता रहा। उन्होंने न्यायालय से कर्नाटक के एसआर बोम्मई केस का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद फ्लोर टेस्ट का मौका दिया गया था।
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